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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

जीवन जीने की कला…

Jan 17, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…




दोस्तों, हमारा जीवन चिंता से नहीं अपितु चिंतन से बेहतर बनता है। लेकिन अक्सर लोग चिंतन छोड़, चिंता में लीन हो जाते हैं और ख़ुद को एक ऐसे विचारों के चक्र में उलझा लेते हैं, जिसका कोई अंत ही नहीं होता है। इस बात का अनुभव मुझे इस रविवार एक ट्रेनिंग के दौरान उस वक़्त हुआ जब एक युवा मेरे पास आया और बोला, ‘सर, पिछले तीन-चार वर्षों से सरकारी नौकरी के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे यूपीएससी, एमपी पीएससी आदि को दे रहा हूँ। लेकिन किसी ना किसी कारण से अटक जाता हूँ। कभी मेन्स में, तो कभी इंटरव्यू में, तो कभी किसी और कारण से। एक बार तो सिलेक्शन होने के बाद भी सरकारी तंत्र के कारण जॉइन नहीं कर पाया। हर बार किनारे तक पहुँच कर चीजें हाथ से छूट रही हैं। सर, अब तो ख़ुद के भविष्य के बारे में सोच कर इतना परेशान हो चुका हूँ कि रात-रात भर सो नहीं पाता हूँ। ना मेहनत में कमी है, ना दिमाग़ कमजोर है और ना ही किसी भी रूप में ख़ुद की क्षमताओं पर संदेह।’


उस युवा की बातों को सुन ऐसा लग रहा था मानो वह एक ही साँस में सब कुछ बोल देना चाहता था। चूँकि ट्रेनिंग के कारण वह पिछले दो दिनों से मेरे साथ था, इसलिए मुझे उसकी क्षमता और बुद्धिमत्ता का एहसास हो चुका था। मेरी नज़र उसके और उसके उज्ज्वल भविष्य के बीच में कोई रोड़ा था तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुद की सोच को सीमित दायरे तक सीमित रखना था। वह ऐसे-ऐसे विषयों पर सोच रहा था जो उसके हाथ में थे ही नहीं। इसके कारण वह विचारों के कुचक्र में फँसता ही चला जा रहा था। उदाहरण के लिए उसकी चिंता का विषय परीक्षा क्यों कैंसिल हो गई; इस बार भी अगर मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ तो मैं क्या करूँगा; कहीं मेरी क़िस्मत ही तो ख़राब नहीं है आदि जैसी बातें थी।


मैंने उसे एक ही बात समझाने का प्रयास किया, ‘क्यों नहीं हुआ’ इसकी चिंता छोड़ो और चिंतन शुरू करो कि ‘अब मैं और क्या कर सकता हूँ?’, जिससे मेरा भविष्य सुरक्षित और ज़्यादा बेहतर बन सके। उस युवा को यह सुझाव देने की दो मुख्य वजह थी, पहली, उन विषयों पर से ध्यान हटाना जिसका परिणाम हाथ में ना हो और दूसरी, भविष्य बनाने के अन्य मौक़ों या अवसरों को पहचानने लायक़ सोच विकसित करना।


सही मायने में साथियों मेरा प्रयास चिंता के कुचक्र को तोड़ने का था, जो मेरी नज़र में उस वक़्त किसी भी अन्य समस्या या विचार से बड़ा था। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि चिंता करने से हम सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी शांति, ख़ुशी या संतुष्टि का ख़ात्मा ही कर सकते हैं। जो मेरी नज़र में ज़िंदा रहते हुए भी मरने समान है। जी हाँ साथियों, चिंता से किसी भी परेशानी या समस्या के समाधान की अपेक्षा रखना बेमानी है।


रिसर्च का एक आँकड़ा बताता है कि मात्र २ घंटे चिंता करने में हम जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, उतनी ही ऊर्जा में १० घंटे तक कठोर शारीरिक श्रम किया जा सकता है। अब आप ख़ुद सोच कर देखिए अगर कोई व्यक्ति पूरे समय याने चौबीसों घंटे चिंता में डूबा रहता है तो वह प्रतिदिन कितनी ऊर्जा बर्बाद करता होगा और कैसा जीवन जीता होगा। इसलिए साथियों चिंता को चिता समान बताया गया है।


अगर आपका लक्ष्य पूर्णता के साथ जीवन जीना है तो चिंता करने के बजाय सदैव चिंतन, मनन एवं ध्यान करे। अर्थात् जब भी कभी आपका सामना किसी परेशानी, दिक़्क़त या समस्या से होता है तो उसपर चिंता करने के स्थान पर उस विषय में गहराई से सोचें और उस समस्या का जड़ से समाधान खोज कर ख़ुशी से रहें। याद रखियेगा साथियों, सुखी जीवन और अनुकूल समय के लिए चिंता करने के स्थान पर ग़लत का विरोध करना और चिंतन कर सही हल खोजकर, समय को अनुकूल बनाते हुए जीवन को सुखी बनाना ही जीवन जीने की कला है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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