जीवन में एक ही चीज स्थाई है - बदलाव!
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 19, 2025
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Aug 19, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन में एक ही चीज स्थाई है, बदलाव। मनुष्य का जीवन कभी भी एक जैसा नहीं रहता है। प्रकृति के माफिक ही जीवन में कभी दिन होता है, तो कभी रात, कभी वसंत होता है, तो कभी पतझड़। याने प्रकृति के नियम ही हमारे जीवन का सत्य भी है। यदि हम जीवन के इस सत्य को गहराई से समझ लें तो न तो सुख हमें घमंडी बना पाएगा और न ही दुख हमें तोड़ पाएगा।
जी हाँ, सुख और दुख ज़िंदगी रूपी एक सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन इस दुनिया में ज्यादातर लोग सुख को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान कर चलते हैं और दुख को दुर्भाग्य। इसीलिए वे ज्यादातर समय चिंताग्रस्त जीवन जीते हैं। हकीकत में तो सुख और दुख दोनों ही हमारे जीवन को बेहतर और संतुलित बनाने के लिए होते हैं। सोच कर देखियेगा, अगर जीवन में कभी दुख ही ना आए तो क्या हम सुख का असली स्वाद चख पायेंगे? इसी तरह यदि जीवन में हमेशा सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार होने लगे, तो “खुशी” का अनुभव साधारण नहीं हो जाएगा? मेरी नजर में तो दुख के बिना सुख और ख़ुशी के महत्व को समझ पाना असंभव है।
इसलिए परिवर्तन को जीवन का सबसे बड़ा नियम मान कर जीना ही हमें शांति के साथ जीवन में आगे बढ़ा सकता है। जैसे रात के बाद सुबह आती है, वैसे ही बुरे दिनों के बाद अच्छे दिन भी आते हैं। कोई भी परिस्थिति इस जीवन में स्थायी नहीं होती। जिस तरह जीवन में अच्छे दिन टिककर नहीं रहेंगे, तो यकीनन बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो इस बदलाव को स्वीकार कर लेता है, वही जीवन में स्थिर और संतुलित रह सकता है।
यही बात भारतीय दर्शन हमें समत्व याने इक्वेनिमिटी के रूप में सिखाता है। याने इस जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान समभाव के साथ जीना सीखना है। इसके लिए हमें तीन मुख्य बातें सीखना होगी -
1) सुख आए तो विनम्र रहना।
2) दुख आए तो धैर्य रखना।
3) किसी भी परिस्थिति में खुद को असंतुलित न होने देना।
दोस्तों, जिसने यह कला सीख ली, उसका जीवन उस चट्टान जैसा बन जाता है जो आँधी, वर्षा और धूप में भी अडिग रहती है। अगर आप इस बात को स्वीकार लें कि “जीवन में न तो अच्छे दिन सदा रहते हैं और न ही बुरे दिन। याने यहाँ समय के साथ सब बदलता है।”, तब आप आत्म ज्ञान और आत्म बल को जानने की दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।
आत्म-ज्ञान और आत्म-बल का ज्ञान होना ही हमें विश्वास दिलाता है कि इंसान की असली ताक़त उसके भीतर होती है, बाहरी परिस्थितियों में नहीं। याने मनुष्य जीवन में संपत्ति, सम्मान, पद आदि सब आते-जाते रहते हैं। लेकिन आत्म-बल और आत्म-ज्ञान स्थायी हैं। बाहरी संपत्ति खो सकती है, लेकिन भीतर की ताक़त कभी नहीं। जब इंसान भीतर की इस ताक़त याने “स्वयं” को पहचान लेता है, तो कोई भी दुख उसे हिला नहीं सकता।
दोस्तों, आज के इस बदलाव भरे युग में जहाँ हमें अपने आस-पास कई लोग छोटी-सी असफलता या नुकसान से टूटते, हताशा और निराशा से घिरते नजर आते हैं, वहाँ इसका महत्व और ज़्यादा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए हमें ख़ुद को अच्छे और बुरे दोनों ही समय में बार-बार याद दिलाना होगा, “यह स्थिति स्थायी नहीं है, समय के साथ सब बदलता ही है, और हर रात के बाद सुबह होती है।” अगर हमने ऐसा कर लिया तो यकीनन हमारे जीवन में निराशा कभी भी स्थायी नहीं होगी।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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