top of page
  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

जो होता है, अच्छे के लिये होता है…

Mar 25, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, मनमाफिक परिणाम मिलने पर श्रेय लेना और जताना कि ‘यह सब मेरी मेहनत का परिणाम है’ और ना मिलने पर क़िस्मत, परिस्थिति और लोगों पर दोष मढ़ना, मेरी नज़र में जीवन के प्रति नकारात्मक नज़रिए का परिणाम है। उक्त बात मुझे हाल ही में एक काउन्सलिंग के दौरान याद आई, जिसमें एक युवा व्यवसायिक जीवन में मिली असफलता के लिए अपने माता-पिता को दोष देते हुए कह रहा था कि अगर उन्होंने सही पेरेंटिंग की होती, तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता। जब मैंने उसका सामना उसके द्वारा लिए गये ग़लत व्यवसायिक निर्णयों से करवाया, तो वह थोड़ा खीजता हुआ बोला, ‘सर, मैंने बताया ना, मेरी असफलता का कारण मेरे माता-पिता है। उन्होंने मुझे कभी निर्णय लेने की प्रक्रिया और व्यापार करना सिखाया ही नहीं था. इतना कह कर वह एक पल के लिए रुका फिर बोला, ‘सर, जब वे अपना जीवन ही सुरक्षित और अच्छा नहीं बना पाये तो मेरा जीवन क्या बनायेंगे। अगर वे मेरी थोड़ी और मदद कर देते तो परिणाम और कुछ होता।’


बच्चे की बात सुन मैं हैरान था क्योंकि जन्म, शिक्षा, सुरक्षा, अच्छा ख़ान-पान आदि सब मिलने के बाद भी वह उनका मोल नहीं समझ रहा था और अपने माता-पिता पर आरोप लगाते हुए उन्हें दोष दे रहा था। वैसे दोस्तों, यह सिर्फ़ उस बच्चे की समस्या नहीं थी। सामान्यतः हम में से बहुत सारे लोग कोसने की इस बीमारी से ग्रसित रहते हैं और अपने जीवन को नकारात्मक भाव के साथ जीते हैं। आइये दोस्तों, एक कहानी के माध्यम से इस स्थिति को समझने का प्रयास करते हैं-


बात कई साल पुरानी है, गाँव के ज़मीदार के यहाँ रामू नाम का एक नौकर काम किया करता था। वैसे तो सेठ रामू के काम से बहुत खुश रहता था और उसकी तारीफ़ किया करता था लेकिन जरा सा ग़लत होने पर उसके पूरे ख़ानदान को कोसा करता था। ऐसा ही कुछ वह भगवान के लिए भी करा करता था। जीवन में जरा सा कुछ आशा के विपरीत घटा या कोई कटु अनुभव हुआ नहीं कि भगवान को कोसना चालू।


एक दिन अमीर सेठ अपने बाग में बैठ कर ककड़ी खा रहा था। अचानक ही बीच में एक ककड़ी कच्ची और कड़वी निकली। सेठ ने नाक-भौंह सिकोड़ते हुए वह ककड़ी अपने नौकर रामू को दे दी। रामू ने ककड़ी देने के लिए पहले तो सेठ को धन्यवाद दिया, फिर उसे बड़े चाव से खाने लगा। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कोई बहुत ही स्वादिष्ट चीज खा रहा हो। रामू को इस तरह कड़वी ककड़ी खाता देख सेठ आश्चर्यचकित था। उसने रामू से कहा, “रामू, यह ककड़ी तो बहुत कड़वी थी। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम इसे इतना चाव से कैसे खा रहे हो?’


प्रश्न सुनते ही रामू हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘मालिक, आप ही मेरे अन्नदाता हो। आप ही की वजह से मेरा यह जीवन चल रहा है। आप रोज़ मुझे स्वादिष्ट भोजन देते हो अगर एक दिन भोजन कुछ बेस्वाद या कड़वा भी दे दिया तो उसे स्वीकार करने में भला क्या हर्ज है?’


रामू की बात सुनते ही अमीर सेठ को अपनी भूल; अपनी गलती समझ आ गई। वह सोचने लगा ईश्वर ने मुझे अकूट संपत्ति और सुख-सुविधा दी है। ऐसे में ईश्वर कभी कोई कटु अनुभव, अनुदान या समस्या अथवा मुसीबत दे भी दे तो उसकी सद्भावना पर संदेह करना ठीक नहीं है। दोस्तों, यह नौकर और कोई नहीं, प्रसिद्ध चिकित्सक हकीम लुकमान थे। उनके एक व्यवहार ने सेठ के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया था।


इसीलिए दोस्तों, मैं हमेशा कहता हूँ, मनमाफिक परिणाम पर मेरा-मेरा करने और विपरीत स्थिति में दोष देने के स्थान पर जो भी मिला है उसके लिये आभारी रहना ज़्यादा लाभप्रद है। दोस्तों, जीवन में आनंद और प्रसन्नता से रहने का एकमात्र सूत्र यही स्वीकारना है कि जीवन में जो कुछ भी होता है, सब परमात्मा की दया ही है और परमात्मा जो करता है, अच्छे के लिए ही करता है !!!


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

13 views0 comments

Kommentit


bottom of page