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ठोकर खाने के बाद, जो उठ खड़े होते हैं वे इतिहास लिखते हैं !!!

Writer: Nirmal Bhatnagar
Nirmal Bhatnagar
Aug 4
3 min read

Aug 4, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इतिहास उन्हीं लोगों ने बदला है जिन्हें असफलता रोक नहीं पाई। जीवन की कुछ घटनाएँ; उस समय हमें हार जैसी लगती हैं, लेकिन यदि हम हार मानने के बजाय आगे बढ़ते रहें, तो वही घटनाएँ एक दिन हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं। आइए, इसे एक सच्ची घटना से समझते हैं।


वर्ष 1980 की गर्मियों में मायलापुर में क्रिकेट खेलते समय सातवीं कक्षा के एक बालक का चश्मा तेज़ बाउंसर लगने से टूट गया। यह देखकर उसके पिता, जो संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान थे, इतने चिंतित हुए कि उन्होंने उसका प्रिय क्रिकेट बैट उठाकर गहरे कुएँ में फेंक दिया और उसके हाथ में एक वायलिन थमाते हुए कहा, “यदि जीवन में सटीकता याने प्रिसिशन चाहिए, तो इसे सीखो।”


पिता का निर्णय सुन बालक ने न शिकायत की, न विरोध। उसने परिस्थितियों को स्वीकार किया और पूरी निष्ठा से संगीत की साधना में जुट गया। कुछ ही वर्षों में वह भारत रत्न एम. एस. सुब्बालक्ष्मी के साथ मंच साझा करने लगा और उसे उनसे सीधे मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य भी मिला। लेकिन जीवन की परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी। वर्ष 1985 में वह IIT-JEE परीक्षा में असफल हो गया। अधिकांश लोग इसे अपने सपनों का अंत मान लेते है, लेकिन उसने इसे अपनी मंज़िल का नहीं, केवल एक रास्ते का अंत माना। उसने एक क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लिया, कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की और शोध की दुनिया में अपना मार्ग बनाया। समय के साथ वह आईआईटी मद्रास में शोधार्थी बना, पीएचडी पूरी की, वहीं प्रोफेसर नियुक्त हुआ और एक दिन उसी संस्थान का डायरेक्टर बना, जिसने कभी उसे प्रवेश नहीं दिया था।


यहीं से उसकी यात्रा व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण की यात्रा बन गई। वर्ष 2011 में, जब दुनिया मोबाइल एप्लिकेशन बनाने में व्यस्त थी, तब उनके मन में एक प्रश्न उठा, ‘यदि भारत के रडार, लड़ाकू विमान, बैंकिंग सर्वर और रक्षा प्रणालियाँ विदेशी माइक्रोप्रोसेसर पर निर्भर हैं, तो युद्ध की स्थिति में हमारी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?’ यही प्रश्न उनका संकल्प बन गया। उन्होंने पूरी तरह स्वदेशी इंडस्ट्रियल ग्रेड माइक्रोप्रोसेसर विकसित करने का लक्ष्य रखा। उस वक्त, दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों ने इसे असंभव बताया। उनका कहना था कि अरबों डॉलर और विदेशी पेटेंट के बिना इसे विकसित करना संभव नहीं है। लेकिन इतिहास संसाधनों से नहीं, संकल्प से लिखा जाता है।


इन सज्जन ने वर्षों तक अपनी टीम और सीमित संसाधनों के साथ अथक परिश्रम किया। ओपन सोर्स RISC-V इंस्ट्रक्शन सेट को अपनाया, अरबों निर्देशों का परीक्षण किया और भारतीय प्रतिभा पर अटूट विश्वास बनाए रखा। जुलाई 2018 में वह ऐतिहासिक क्षण आया जिसने इतिहास रच दिया। इन सज्जन ने अपनी टीम के साथ राइसक्रीक नाम का मात्र 16mm² का सिलिकॉन चिप तैयार किया और उस पर लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को सफलतापूर्वक चलाकर, भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम बढ़ा दिया। आज शक्ति प्रोसेसर आर्किटेक्चर रक्षा संचार प्रणालियों से लेकर इसरो के साथ विकसित अंतरिक्ष-स्तरीय नियंत्रकों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


ज़रा सोचिए... जिस बालक का क्रिकेट बैट कुएँ में फेंक दिया गया, जो छात्र 1985 में IIT-JEE में असफल रहा, वही आगे चलकर आईआईटी मद्रास का डायरेक्टर बना। इतना ही नहीं, निदेशक बनने के बाद भी उन्होंने आधिकारिक बंगले में रहने के बजाय अपने दिवंगत पिता की संस्कृत पुस्तकों और पारिवारिक विरासत की रक्षा के लिए अपने पुराने घर में रहना चुना। आज दुनिया उन्हें प्रोफेसर वीझिनाथन कामाकोटी के नाम से जानती है।


दोस्तों, जीवन की सबसे बड़ी असफलता हारना नहीं, बल्कि हार के बाद स्वयं पर विश्वास खो देना है। याद रखिएगा, इतिहास केवल वही लिखते हैं जो हर ठोकर के बाद फिर उठ खड़े होते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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