‘डर’ से डरें नहीं !!!
- Nirmal Bhatnagar

- May 1
- 3 min read
May 1, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, जीवन में हम सभी किसी न किसी डर के साथ जीते हैं। किसी को असफलता का डर सताता है, तो कोई भविष्य की अनिश्चितता से डरता है, तो कोई किसी को खोने के डर के साथ जीता है। इसलिए मेरा मानना है कि अन्य भावों के समान डर का जीवन में होना सामान्य है, लेकिन जब यह डर अनावश्यक रूप से जीवन में बढ़ जाता है तब हमारी ऊर्जा जीवन जीने से ज्यादा बचने में लगने लगती है। आइए, सोशल मीडिया पर पढ़ी एक कहानी से इसे समझने का प्रयास करते हैं-
एक शांत तालाब में बहुत सारी मछलियाँ रहती थीं। तालाब बाहर से जितना सुंदर दिखता था, उसके अंदर उतना ही डर भरा हुआ था। हर सुबह तालाब में रहने वाली मछलियों के मन में एक ही भय रहता था, “आज फिर मछुआरा आएगा… और शायद आज हमारी बारी हो।” इसी वजह से सूरज के उगते ही पानी में हलचल बढ़ जाती थी। कुछ मछलियाँ गहरे पानी में छिप जाती थी, कुछ तेजी से इधर-उधर भागती थी, और कुछ बस डर में एक ही जगह ठहर जाती थी। फिर तय समय पर मछुआरा आता, जाल डालता और हर दिन कुछ मछलियाँ उसमें फँस जातीं।
रोज़ के इस डर भरे वातावरण के कारण धीरे-धीरे तालाब का माहौल बदल गया। जहाँ पहले शांति थी, अब वहाँ सिर्फ डर था। लेकिन उसी तालाब में एक छोटी-सी मछली थी। वह सबसे अलग थी। वह न घबराती थी, न भागती थी, बल्कि हमेशा शांत और खुश दिखाई देती थी। बाकी मछलियाँ उसे देखकर हैरान रहती थी। वे सोचती थी, “जब हम सब इतने अनुभव के बाद भी डर से नहीं बच पा रहे, तो यह छोटी-सी मछली इतनी निडर कैसे है?” एक दिन कुछ बड़ी मछलियाँ उसके पास गईं और पूछा, “क्या तुम्हें मछुआरे से डर नहीं लगता? क्या तुम नहीं जानती कि हर दिन मछुआरा आता है और हममें से कई मछलियों को अपने जाल में फँसा कर ले जाता है?”
प्रश्न सुन छोटी मछली हल्के से मुस्कुराई और बोली, “दीदी! डर तो सबको लगता है, लेकिन मैंने उससे भागना छोड़ दिया है।” उसका जवाब सुन सबने उत्सुकता वश एक साथ पूछा, “तो फिर तुम उससे बचती कैसे हो?” उसने बड़ी सहजता के साथ कहा, “जब मछुआरा जाल डालने आता है, तो मैं भागने के बजाय उसके एकदम पास चली जाती हूँ याने उसके पैरों के पास।” छोटी मछली का जवाब सुन सभी मछलियाँ चौंक गईं। छोटी मछली ने मुस्कुराते हुए सभी को देखा और अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोली, “याद रखो, जाल हमेशा दूर तक फैलता है, मछुआरे के बिल्कुल पास कभी नहीं पहुँचता। इसलिए जहाँ सबको खतरा लगता है, वही मेरी सबसे सुरक्षित जगह है।”
हकीकत में दोस्तों, यह कहानी सिर्फ मछलियों की नहीं है, यह तो हमारी जिंदगी की सच्चाई है। हम अक्सर समस्याओं से दूर भागते हैं। हमें लगता है कि समस्याओं से जितना दूर रहेंगे, उतना सुरक्षित रहेंगे। लेकिन कई बार सच्चाई बिल्कुल हमारी सोच के विपरीत होती है। सीधे शब्दों में कहूँ तो जिससे डर कर हम भागते हैं, वही हमें सबसे ज्यादा कमजोर बनाता है और जिस चीज़ का सामना हम करते हैं, वही हमारी ताकत बन जाता है। इसलिए डर को खत्म करने का तरीका उससे भागना नहीं, बल्कि उसे समझना है। इसलिए हमेशा याद रखियेगा, जीवन में कई ऐसी परिस्थितियाँ आएंगी, जहाँ आपको लगेगा कि सब कुछ आपके खिलाफ है। ऐसे में अगर आप शांत रहकर सही दिशा चुनते हैं, तो आप पाएँगे कि वही परिस्थिति कुछ ही समय में आपका सुरक्षा कवच बन जाएगी।
दोस्तों, जीवन के संदर्भ में निडर होने का अर्थ डर का ना होना नहीं है, बल्कि डर के साथ कैसे जीना है, यह सीखना है। इसलिए अगली बार जब भी कोई डर आपको रोके, तो खुद से पूछें, “क्या मैं डरकर भाग रहा हूँ या समझ रहा हूँ?” क्योंकि सच्ची सुरक्षा छिपने में नहीं, समझदारी से सामना करने में होती है और साथ ही याद रखें, जहाँ सबको खतरा दिखता है, वहीं अक्सर सबसे बड़ा अवसर छिपा होता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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