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तार्किक बुद्धि से तोलें और धैर्य के साथ लें निर्णय…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Oct 13, 2024
  • 4 min read

Oct 13, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…\

आइये दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत बचपन में सुनी कहानी ‘बगुला भगत’ से करते हैं। जंगल के भीतरी भाग में एक बहुत बड़ा तालाब था। तालाब के आस-पास फैले प्राकृतिक संसाधनों के कारण, उस इलाक़े में नाना प्रकार के जीव-जंतु याने पशु-पक्षी रहा करते थे। इन्हीं पशु-पक्षियों में एक आलसी और बूढ़ा बगुला भी था, जो एक टांग पर खड़े हो, हर पल सिर्फ़ एक ही बात सोचा करता था कि ऐसा क्या किया जाये जिससे मुझे बिना मेहनत करे ही शिकार मिल जाये। एक दिन उसके मन में कुछ विचार आया और वो तालाब के किनारे खड़ा होकर आंसू बहाने लगा। जैसे ही केंकड़े ने उसे देखा, वह तुरंत उसके पास गया और बोला, ‘बगुले मामा, क्या बात है, आज आप मछलियों का शिकार करने के लिए जाने की जगह यहाँ खड़े-खड़े आंसू बहा रहे हो?’ बगुला ज़ोर की हिचकी लेते हुए, भर्राये गले से बोला, ‘बेटा, मैंने मछलियों का शिकार करके बहुत पाप किए हैं और अब मैं इसे और ज़्यादा बढ़ाना नहीं चाहता हूँ। मेरी आत्मा अब जाग चुकी है और देखो, इसीलिए मैं पास आई हुई मछलियों का भी शिकार नहीं कर रहा हूँ।’


केकड़ा, जो अब तक बगुले की बातों पर विश्वास कर चुका था, चिंतित होते हुए बोला, ‘मामा, शिकार नहीं करोगे, कुछ नहीं खाओगे तो ज़िंदा कैसे रहोगे?’ बगुला एक और हिचकी लेते हुए बोला, ‘पाप करते हुए जीने से तो मरना ही अच्छा है। वैसे भी तो हम सब को एक ना एक दिन मरना ही है। वैसे बेटा, मैं तुम्हें एक बात और बताना चाहता हूँ। एक त्रिकालदर्शी बाबा, जिनकी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती, ने मुझे बताया है कि हमारे इलाक़े में बारह साल का भयानक सूखा पड़ने वाला है।’


घबराया केकड़ा वहाँ से भागा और तालाब में जाकर बगुले में आये परिवर्तन को बताता हुआ बोला, ‘भाई लोगों, बगुला मामा, अब बदल चुका है। उसने भक्ति और बलिदान का मार्ग अपना लिया है। उन्होंने एक त्रिकालदर्शी बाबा के नाम से बताया है कि यहाँ बारह साल का सूखा पड़ने वाला है और अब हम सब की जान जोखिम में है।’ केकड़े की बात पूरी होते ही तालाब के सभी जीव याने मछलियाँ, कछुए, बतख़ें, सारस आदि सोच में पड़ गये और जब सब मिलकर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाये तो सभी मिलकर बगुले के पास गये और बोले, ‘बगुला भगत मामा, अब तो तुम महा ज्ञानी बन गये हो और अच्छे-अच्छे लोगों की संगत में रहते हो। अब तुम ही हमें बचाव का कोई रास्ता बताओ।’


बगुला सोचने का नाटक करता हुआ बोला, ‘यहाँ से कुछ कोस दूर एक जलाशय है, जिसमें एक पहाड़ी झरना गिरता है। वह कभी सूखता नहीं है, इसलिए मुझे लगता है, हमें वहाँ जाकर रहने लगना चाहिये।’ सभी जानवरों ने बगुले से एक साथ पूछा, ‘पर हम सब वहाँ जाएँगे कैसे?’ बगुला बोला, ‘मैंने वैसे भी अपना सारा जीवन अब जीव सेवा में लगाने का निर्णय लिया है। इसलिए मैं तुम्हें एक-एक कर अपनी पीठ पर बैठाकर वहाँ तक पहुँचाऊँगा।’ बगुले की बात सुन सभी जीव एकदम खुश होकर नारा लगाते हुए बोले, ‘बगुला भगत जी की जय… बगुला भगत जी की जय…’


उस दिन के बाद तो बगुला भगत के मज़े थे। अब वह रोज़ एक जीव को अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाता और कुछ दूर ले जाकर एक चट्टान पर पटककर मार देता और खा जाता। कई बार तो बगुला दो फेरे भी लगा देता था। भगत जी खा-खा कर खूब मोटे हो गए थे और उनके मुख पर लाली भी आ गई थी। उन्हें देख अब दूसरे जीव कहा करते थे, ‘देखो, दूसरों की सेवा का फल और पुण्य भगत जी के शरीर को लग रहा है।’ यह सब सुन बगुला भगत मन ही मन खूब हँसता और सोचता था कि यह दुनिया कैसे-कैसे मूर्खों से भरी पड़ी है।


एक दिन केकड़ा बगुले से बोला, ‘मामा! तुमने इतने सारे प्राणियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँच दिया, लेकिन मेरी बारी अभी तक नहीं आई।’ उसकी बात सुनते ही बगुला मुस्कुराते हुए बोला, ‘भांजे! आजा, आज तेरा ही नंबर लगाते हैं। आजा, जल्दी से आ और मेरी पीठ पर बैठ जा।’ केकड़ा खुश होकर बगुले की पीठ पर बैठ गया। बगुला मज़ेदार बातें करता हुआ आगे बढ़ने लगा। कुछ देर पश्चात जब वे चट्टान के क़रीब पहुँचे तो वहाँ हड्डियों का ढेर देख केकड़े का माथा ठनका। वह हकलाते हुए बोला, ‘मामा, यह हड्डियों का ढेर कैसा है? अब जलाशय कितनी दूर बचा है?’ बगुला भगत ज़ोर से हंसते हुए बोला, ‘मूर्ख! आगे कोई जलाशय नहीं और ना ही सूखा पड़ने वाला है। मैं रोज़ एक जानवर को यहाँ लाता हूँ और उसे मारकर खाता हूँ, आज तेरा नंबर है।’ केकड़ा अब सारा माजरा समझ चुका था। उसने बिना एक पल गँवाये अपनी सारी हिम्मत को बटोरी और बगुले की गर्दन को अपने डंकों से जकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक बगुले के प्राण नहीं निकल गये।


दोस्तों, ऐसे अनेक बगुला भगत हमारे आस-पास भी मौजूद हैं जो सामने तो मीठी बोली से हमें प्रभावित करते हैं और हमारे अपने होने का ढोंग करते हैं। लेकिन मौक़ा मिलते ही अपना रंग दिखाकर पलट जाते हैं। इसलिए दोस्तों, किसी की मीठी बातों पर विश्वास करने से पहले उसे तार्किक आधार पर तोलें, जिससे आप धोखे को पहले ही पहचान पाएँ। दूसरी बात धैर्य के साथ, समझदारी भरे निर्णय लेते हुए जीवन में आगे बढ़ें और विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी पूर्ण आत्मविश्वास के साथ सकारात्मकता का साथ ना छोड़ें। याद रखियेगा, उपरोक्त बातों और अपनों के साथ आप विषम से विषम परिस्थिति का भी सामना सरलता से कर सकते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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