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थोथा चना बाजे घना…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Mar 17, 2024
  • 4 min read

Mar 17, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


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दोस्तों, निश्चित तौर पर आपने यह कहावत सुनी होगी कि ‘थोथा चना, बाजे घना!’ अर्थात् जो चना अंदर से खोखला होता है, वह हिलाने पर बहुत आवाज़ करता है। ठीक इसी तरह अज्ञानी व्यक्ति बार-बार ज्ञानी होने का दिखावा करता है और बड़ी-बड़ी बातों को कर, अपनी कमी छुपाने और ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का प्रयास करता है। उक्त मुहावरा मुझे हाल ही में उस वक़्त याद आया जब मैं एक सज्जन से चर्चा कर रहा था। लगभग 1 घंटे की बातचीत के दौरान मैंने पाया कि वे हर तीसरे वाक्य में किसी ना किसी ‘ख़ास’ व्यक्ति को अपना ख़ास बता रहे थे।


काफ़ी देर तक अपनी कहानी सुनाने या यूँ कहूँ झेलाने के बाद उन्हें शायद मुझ पर दया आई और उन्होंने मुझे बोलने का मौक़ा देते हुए कहा, ‘वैसे आप क्या करते हैं?’ मैंने बड़ा संक्षिप्त उत्तर देते हुए कहा, ‘सर, मैं एक मोटिवेशनल स्पीकर और एजुकेशनल कंसलटेंट के रूप में कार्य करता हूँ और साथ ही ‘फिर भी ज़िंदगी हसीन है’ के नाम से मेरा एक कॉलम प्रतिदिन समाचार पत्र में प्रकाशित होता है और ‘ज़िंदगी ज़िंदाबाद’ के नाम से मेरा एक रेडियो शो चलता है। उन सज्जन ने बात आगे बढ़ाते हुए मुझसे अगला प्रश्न किया, ‘आप किस तरह के लेख लिखते हैं और अपने रेडियो शो में क्या बोलते हैं?’ मैंने मुस्कुराते हुए उन सज्जन से कहा, ‘सर मैं लोगों को कहानियाँ सुनाता हूँ और लोगों को ज़िंदगी के प्रति सही नज़रिया रखना सिखाता हूँ।’ मुझे लग रहा था कि शायद इतने में बात ख़त्म हो जाएगी, लेकिन शायद वे सज्जन कुछ ज़्यादा ही फ्री थे। बिना ज्यादा जान पहचान के ही उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा, ‘सर तो एक-आध कहानी हमें ही सुना दीजिए।’ मैंने तुरंत ‘हाँ’ कहा और एक कहानी सुना दी जो इस प्रकार थी।


उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य अपनी प्रजा का हाल जानने के उद्देश्य से भेष बदलकर अपने राज्य में घूमा करते थे। एक बार वे ऐसी ही एक यात्रा के दौरान रास्ता भटक गए। रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में राजा एक दिशा में आगे बढ़ने लगे। कुछ दूरी तय करने के पश्चात राजा को सरकारी वर्दी पहने एक युवा दिखाई दिया। राजा विक्रमादित्य उस युवा के पास गये और उससे बोले, ‘महाशय मैं रास्ता भटक गया हूँ क्या आप मुझे अमुक गाँव जाने का रास्ता बता देंगे?’ युवा ने अकड़ते हुए कहा, ‘मूर्ख आदमी, तुझे दिखता नहीं मैं एक सरकारी मुलाजिम हूँ। मेरा काम रास्ता बताना नहीं है। चल हट, किसी और से पूछ।’


राजा विक्रमादित्य एकदम नम्र स्वर में बोले, ‘अरे सरकारी मुलाजिम अगर किसी भटके हुए को रास्ता दिखा दे तो कोई हर्ज नहीं है? ख़ैर कोई बात नहीं मैं किसी और से पूछ लूँगा। बस इतना बता दीजिए कि आप किस पद पर काम करते हैं।’ युवा ने चिढ़ते हुए अपनी भौहें चढ़ाई और बोला, ‘अंधा है क्या? मेरी वर्दी देखकर पहचान नहीं पा रहा है क्या कि मैं कौन हूँ?’ राजा विक्रमादित्य ने उसे गौर से देखा और बोला, ‘शायद आप सैनिक हैं।’ वह बोला, ‘नहीं! उससे ऊंचा।’ विक्रमादित्य बोले, ‘तब क्या आप नायक हैं?’ युवा बोला, ‘नहीं, उससे भी ऊंचा।’ विक्रमादित्य बोले, ‘अच्छा!, तो आप हवलदार हैं?’ युवा खुश होता हुआ बोला, ‘चलो, अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ। पर यह तो बता इतनी पूछताछ करने वाला तू कौन है?’


राजा विक्रमादित्य बोले, ‘भई मैं भी सरकारी मुलाजिम हूँ।’ सिपाही की ऐंठ थोड़ी कम हुई और वो थोड़ा नम्र स्वर में बोला, ‘क्या तुम नायक हो?’ विक्रमादित्य बोले, ‘नहीं उससे ऊँचा।’ युवा बोला, ‘अच्छा तो फिर तुम दरोग़ा हो?’ राजा ने ना में सिर हिलाया तो युवा बोला, ‘तो फिर तुम सूबेदार हो?’ राजा बोले, ‘नहीं! उससे भी ऊँचा।’ अब वह युवा घबराने लगा और बड़े संतुलित स्वर में बोला, ‘तब तो आप मंत्री होगे।’ राजा विक्रमादित्य बोले, ‘भाई बस अब एक और सीधी रह गई है।’ इतना सुनते ही हवलदार उन्हें गौर से देखने लगा। अब वह पहचान गया था कि उसके सामने राजा विक्रमादित्य खड़े हैं। वह एकदम घबरा गया और उनके चरणों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाते हुए माफ़ी माँगने लगा। राजा विक्रमादित्य ने बड़े प्यार के साथ उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, ‘भाई, माफी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं जानता हूँ कि जो जितना नीचे होता है, वह उतना ही अकड़ता है। जब तुम बड़े बनोगे तो तुम भी मेरी तरह नम्रता का बर्ताव सीख जाओगे।’


दोस्तों अब शायद यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि इतना सुनने के बाद उन सज्जन की क्या प्रतिक्रिया रही होगी। चलिए उन्हें यहीं छोड़िए और याद रखिए, जो जितना ही ऊंचा है; जितना बड़ा है, वह उतना ही सहनशील और नम्र होता है, और जो जितना नीच एवं ओछा होता है, वह उतना ही ऐंठा रहता है। इसीलिए कहा गया है -


‘विद्या विवादाय, धनम् मदाये, शक्ति परेशाम परिपीढ़नाएं,

खलस्य साधोर,विपरीत मेतत, ज्ञानाय, दानाय, च रक्षणाय।।

अर्थात्, दुष्ट व्यक्ति के पास विद्या हो, तो वह विवाद करता है। धन हो तो घमंड करता है और यदि शक्ति हो, तो दूसरों को परेशान करता है। वहीं साधु प्रवृति का व्यक्ति याने अच्छा इंसान अपनी विद्या का उपयोग ज्ञान देने में, धन का उपयोग दान देने में और शक्ति का प्रयोग दूसरों की रक्षा करने में करता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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