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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दान के लिए धन से ज़्यादा भाव है ज़रूरी…

May 21, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हम सभी लोग यह जानते हैं कि देने में जो सुख है वह किसी और चीज़ में कहाँ। लेकिन आप इस सुख को महसूस केवल उसी वक्त कर सकते हैं जब आप सच्चे दिल से किसी की मदद करते हैं। लेकिन देने की बारी आते ही हमें अपनी ज़रूरतें याद आने लगती है। इसीलिए इस जीवन में ज़्यादातर लोग मानते हैं कि जब मैं कुछ बन जाऊँगा, तब दूँगा। लेकिन दोस्तों प्रकृति का नियम दान के विषय में कुछ और है। प्रकृति कहती है, ‘जो है, तू बस उसे देना शुरू कर। तेरे ऐसा करते ही मैं तुझे वह सब दूँगी जो तू चाहता है।’ जी हाँ साथियों, दान के विषय में देने की इच्छा या मंशा का होना संसाधन होने से कई ज़्यादा ज़रूरी है। अपनी बात को मैं आपको एक प्यारी सी कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


बात कई साल पुरानी है, गाँव में रहने वाले रामू काका रोज़ सुबह जंगल के बाहरी इलाक़े से घास काट कर बाज़ार बेचने ज़ाया करते थे। उन्हें इस तरह कार्य करता देख वही रहने वाला युवा अक्सर सोचा करता था कि इतनी सी घास बेच कर मिले पैसे से यह बुजुर्ग किस तरह अपना घर चलाता होगा। एक दिन अपनी जिज्ञासा शांत करने के उद्देश्य से यह शिक्षित युवा उस बुजुर्ग के पास पहुँचा और बोला, ‘बाबा, मैं रोज़ आपको अथक परिश्रम करते हुए देखता हूँ। लेकिन दिनभर में आप बमुश्किल आधी गाड़ी भरके घास काट पाते हो। निश्चित तौर पर इससे आपको सीमित कमाई होती होगी। मुझे समझ नहीं आता है आप किस तरह इतने काम पैसों से अपना घर चलाते होगे। क्या आप अकेले रहते हैं?’


युवा की बात सुन रामू काका मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘नहीं, मैं अपने पूरे परिवार के साथ रहता हूँ और रही बात घर चलाने की तो जितने की घास मैं बेच पाता हूँ मेरी घरवाली उतने में ही पूरा घर चलाती है।’ रामू काका का जवाब सुन युवा आश्चर्यचकित था, वह समझ नहीं पा रहा था की बुजुर्ग के घरवाले किस तरह आमदनी के हिसाब से आवश्यकताओं की पूर्ति करते होंगे। रामू काका तुरंत इस युवा की दुविधा समझ गए और वे बोले, ‘आपको दुविधा में देखकर मुझे लग रहा है की आप आश्चर्यचकित हैं कि हम इतने कम पैसों में किस तरह अपना घर चलाते होंगे।’ 1 पल चुप रहने के बाद वह युवा बोला, ‘जी बिलकुल, मैं अच्छा ख़ासा कमा लेता हूँ लेकिन उसके बाद भी समझौता करते हुए जीता हूँ और एक आप हैं, जो घास काट कर भी अपना काम मज़े में चला लेते हैं।’ युवा की बात सुन वृद्ध एकदम गम्भीर हो गए और बोले, ‘तुम्हारी महत्वकांक्षाएँ तुम्हारी आमदनी से ज़्यादा बड़ी हैं, इसलिए तुम्हें तकलीफ़ आती है और इसी वजह से तुम्हें काम आमदनी में घर चलाता देख; ग़रीबी में लोगों को खुश देख आश्चर्य होता है।’ अनपढ़, गरीब से सपाट उत्तर सुन युवा सन्न रह गया, कुछ पलों बाद वह अपनी झेंप मिटाता हुआ बोला, ‘घर चला लेना ही सब-कुछ नहीं होता दान-पुण्य के लिए भी तो पैसा चाहिए।’ युवा की बात सुन रामू काका ठहाका मार कर जोर से हंसते हुए बोले, ‘उसके लिए भी पैसा नहीं चाहिए तुम श्रम दान कर सकते हो या फिर दूसरों को प्रेरणा देकर उनका जीवन बेहतर बना सकते हो और कुछ नहीं तो फिर मुस्कुराहट तो दे ही सकते हो। गाँव में पीने के पानी की दिक़्क़त दूर करने के लिए मैंने गाँव में कुवाँ खुदवाने के लिए लोगों को दान करने के लिए प्रेरित किया और पैसे इकट्ठा होने के बाद मैंने कुवाँ खोदने के लिए श्रम दान दिया। आज पूरा गाँव उस कुएँ से पानी पीता है।’


दोस्तों, बात तो रामू काका की एकदम सही है। अक्सर महत्वकांक्षाओं को संजोने और उसकी पूर्ति करने में हममें से ज़्यादातर लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। आप स्वयं सोच कर देखिएगा, क्या यह जीवन जीने का सही तरीक़ा है? मेरी नज़र में तो नहीं। याद रखिएगा, भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए तो कुबेर का धन भी कम है और दान करने या दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए तो भाव का होना ही पूर्ण है। जी हाँ साथियों, धन के बिना इच्छा और सेवा भाव से यथासंभव दान दिया जा सकता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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