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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दुःख और परेशानी की मुख्य वजह बेलगाम इच्छाएँ…

June 30, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज ज़्यादातर लोगों के पास एक आरामदायक और ख़ुशनुमा ज़िंदगी जीने के लिए सभी संसाधन मौजूद हैं उसके बाद भी अगर आप अपने आस-पास नज़रें घुमा कर देखेंगे तो पाएँगे कि ज़्यादातर लोग दुखी और परेशान हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि हर कोई जो है, उससे ज़्यादा पाना चाहता है। उसे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जिस चीज़ को पाने की चाह रख रहा है उसकी उसको आवश्यकता भी है या नहीं। अनावश्यक चीजों को पाने की यही इच्छा आज उसकी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है।


जी हाँ साथियों, मनुष्य कभी भी अपनी आवश्यकताओं की वजह से दुखी नहीं रहता है। उसके दुखी रहने की मुख्य वजह तो अपनी बेलगाम इच्छाओं के कारण हमेशा तनाव और दबाव में रहना है। यह बात बिल्कुल सही है कि इच्छाएँ जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं लेकिन अगर वो दिशा हीन हो जाएँ तो हमारे दुःख का मूल कारण बन जाती हैं। इसीलिए दोस्तों, इच्छाओं को लेकर सजग रहना आवश्यक है।


इसके विपरीत अगर आपका जीवन आवश्यकताओं के आसपास है तो यक़ीन मानिएगा वे ज़रूर पूरी हो जाएँगी। आवश्यकताओं के पूर्ण होने की सम्भावना हमेशा अधिक रहती है, लेकिन इच्छाओं की नहीं। इच्छाएँ तो आज तक किसी की भी पूरी नहीं हो पायी हैं क्योंकि जब तक आप किसी तरह एक इच्छा को पूरा करते हैं, तब तक आपके मन में दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है। इसकी वजह से आप जो पहली इच्छा पूरी हुई थी उसका लुत्फ़ उठाने का मौक़ा भी चूक जाते हैं। अर्थात् अब जो आपके पास है, आप उसका मज़ा लेने के स्थान पर इच्छाओं के आधार पर बनाए गए नए लक्ष्य को पूरा करने में लग जाते हो। कई बार उपरोक्त आधार पर बनाई गई इच्छाएँ अपूर्ण भी रह जाती हैं।


पूर्ण इच्छाओं का उपभोग या उपयोग करे बिना उन्हें नज़रंदाज़ करना और अपूर्ण इच्छाओं के लिए परेशान होना; उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास करना और बार-बार इसी तरह जीवन में आगे बढ़ना आपके जीवन में परेशानियों और दुखों का प्रमुख कारण बन जाता है। अगर आपका लक्ष्य सुखी जीवन जीना है तो उसका मेरी नज़र में तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही रास्ता है और वह है, अभावों को नज़रंदाज़ कर, जो है उसका सौ प्रतिशत से ज़्यादा मज़ा या लाभ लेना। जो आज के युग में हमारी वर्तमान स्थिति के ठीक विपरीत है। आज जो हमें प्राप्त है, हम उसका आनंद तो लेते नहीं और जो अप्राप्य है उसका चिंतन करके जीवन को शोकमय बना लेते हैं।


जी हाँ दोस्तों, दुःख की मूल वजह हमारी आशा, हमारी इच्छाएँ ही है। हमें इस संसार में कभी भी, कोई भी दुखी नहीं कर सकता है, सिवाए हमारी इच्छाओं और अपेक्षाओं के। अति इच्छायें रखने वाला व्यक्ति और असंतोषी हमेशा दुखी ही रहता है। याद रखिएगा साथियों, जिसकी इच्छाएँ सीमित हैं, उसके दुःख भी स्वतः ही सीमित याने कम हो जाते हैं और जब कोई भी इच्छा सीमित हो, तो उसे पूरा करना भी आसान हो जाता है। याने आपके लिए दुखों से पार पाना आसान हो जाता है। आपके सुखी होने की सम्भावना बढ़ जाती है। दोस्तों इसीलिए तो कहते हैं, ‘संतोषी सदा सुखी!’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


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