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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दूसरों को ठोकर खाता देख ख़ुद ठाकुर बनें…

Dec 19, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, बात अगर सीखने की हो तो मेरा मानना है कि समय रहते बड़े-बुजुर्गों द्वारा बताई गई बातों, दूसरों के जीवन से मिली सीखो और समाज से मिले अनुभव और किताबी ज्ञान से सीख लेना बेहतर है, अन्यथा जीवन से मिलने वाले अनुभव से सीखने में सारी उम्र निकल जाती है। शायद इसीलिए भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को मृत्यु शय्या पर अंतिम साँसें गिन रहे अपने शत्रु महाज्ञानी, पंडित और राजनीतिज्ञ रावण के पास ज्ञान की कुछ बातों को सीखने के लिए भेजा था। चलिए आगे बढ़ने से पहले हम उस पूरी घटना को एक बार दोहरा लेते हैं-


भगवान श्री राम के बाण से घायल रावण जब अपनी अंतिम साँसें ले रहा था तब भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे महाज्ञानी, पंडित और राजनैतिक रावण के पास जाएँ और ज्ञान की कुछ बातें सीख कर आएँ। बड़े भ्राता भगवान श्री राम का आदेश पा लक्ष्मण उसी पल महाज्ञानी पंडित रावण के सर के पास ज्ञान मिलने की अपेक्षा लिए बैठ गए, लेकिन रावण ने लक्ष्मण को कुछ बताया ही नहीं। इस बात से व्यथित लक्ष्मण वापस प्रभु श्री राम के पास गये और उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए सब कुछ कह सुनाया।


सारी बात ध्यान से सुनने के बाद प्रभु श्री राम ने लक्ष्मण से कहा कि तुम एक बार फिर वापस जाओ और इस बार शिष्य की भाँति रावण के चरणों में बैठकर ज्ञान देने का निवेदन करो। इस बार लक्ष्मण ने ऐसा ही किया और रावण को भगवान राम का सन्देश कह सुनाया। इस पर महापंडित रावण बोला, ‘राम तो त्रिलोक के स्वामी हैं, सर्वज्ञ हैं। वे क्या नहीं जानते हैं? फिर भी यदि इस दास से कुछ सुनना चाहते हैं तो पहले मुझे मेरे अंत समय में दर्शन देने की कृपा करें, तब मैं कुछ सुनाऊँगा।’ रावण की याचना सुन प्रभु श्री राम रावण के सम्मुख गए, तब रावण ने प्रभु श्रीराम को प्रणाम करते हुए कहा, ‘प्रभु अब मेरा अंतिम समय आ गया है और इस स्थिति में ज़्यादा कुछ कह पाना संभव नहीं है, फिर भी प्रयास करता हूँ।’ एक पल शांत रहने के बाद रावण अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘हे राम, मनुष्य को यदि कोई भी शुभ कर्म करने की इच्छा हो तो उसे कभी टालना नहीं चाहिए और उसे शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण कर लेना चाहिये और यदि कोई अशुभ-पाप कर्म करने की इच्छा हो जाए तो उसे टालते-टालते, हमेशा के लिए ही टाल देना चाहिये। यह मैं अपने जीवन के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ।


एक बार नर्क के समीप से गुज़रते वक्त मैंने देखा कि वहाँ जीवों को भयंकर दंड दिया जा रहा है। तब मेरे मन में आया था कि मैं धरती से लेकर स्वर्ग तक सीढ़ी लगा दूँ। ताकि किसी भी जीव को नारकीय यातनाएँ ना भोगनी पड़ें। इसी तरह खारे पानी से भरे समुद्र को देख मेरे मन में ख़्याल आया था कि मैं इस पानी को उलीच कर समुद्र को दूध, घी, मक्खन आदि से भर दूँ। जिससे सामान्य से सामान्य मनुष्य को भी यह आसानी से मिल जाए। मैं यह भी सोचा करता था कि मैं अपनी सोने की लंका में, सोने में सुगन्ध भर कर, सुगंधित स्वर्ण लगा दूँ तो यह लोगों को रहने के लिए कितनी अच्छी हो जाएगी। देव, दानव, यक्ष, गंधर्व यहाँ तक कि इंद्र, ब्रह्मा और विश्वकर्मा भी मेरे अधीन थे, इसलिए यह सब करना मेरे लिये मुश्किल नहीं था। लेकिन मैं आज-कल, आज-कल कहकर इसे टालता रहा। लेकिन अब मेरे पास इन्हें पूर्ण करने का समय ही नहीं बचा है।


दूसरी ओर, आकाश मार्ग से गुजरते वक़्त जंगल में एक सुंदरी स्त्री को देख मेरे मन में एक कुविचार उत्पन्न हुआ कि मैं इस सुंदरी स्त्री को भी अपनी पत्नी बनाऊँगा। हे राम! मैं जानता था कि पराई स्त्री पर बुरी नजर डालना पाप है, लेकिन मैं अपने आप को रोक ना सका और मैंने आपकी भार्या का अपहरण कर लिया। यदि मैं उस दिन अपने इस कुविचार को टाल जाता तो आज मैं इस हाल में ना होता। इसलिए मैंने कहा था कि शुभ कर्म को शीघ्र करना चाहिए और अशुभ कर्म को सदा के लिए टाल देना चाहिए, तभी जीवन में कल्याण संभव है। दूसरी बात, अपने शत्रु को कभी भी अपने से छोटा मत समझो, मैंने हनुमान और मनुष्य को छोटा समझने की भूल की थी। जबकि मैं जानता था कि ब्रह्मा जी से मिले अमरता के वरदान के अनुसार; मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई और मेरा वध नहीं कर सकता है। यह मेरे जीवन की एक बड़ी गलती थी। तीसरी और अंतिम बात, अगर जीवन का कोई राज हो, तो उसे कभी किसी को मत बताना। यहाँ भी मुझसे गलती हुई थी। मैंने अपनी मृत्यु का राज अपने भाई विभीषण को बताया था और उसने इसका खुलासा आपके समक्ष कर दिया जो आज मेरी मौत का कारण बन रहा है।’ इतना कह कर रावण ने भगवान श्री राम को प्रणाम करा और अपने प्राण त्याग दिए।


दोस्तों, प्रभु श्री राम तक को विश्वास था कि दूसरों के जीवन से मिले अनुभव से सीखना हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है। इसलिए उन्होंने लक्ष्मण को महापंडित रावण के पास शिक्षा लेने के लिये भेजा था। इसीलिए मेरा मानना है कि हमें दूसरों के जीवन अनुभव से सीखना चाहिए और इसीलिए मैं अक्सर कहता हूँ, ‘ठोकर खाकर ठाकुर बनने के लिए एक जन्म कम है। अगर इसी जन्म में ठाकुर बनना चाहते हो, तो दूसरों की ठोकरों से सीख लो।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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