top of page
  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दौलत नहीं, चरित्र और ज्ञान बनाता है आपको महान…

Dec 21, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है एक गाँव में राजेश नाम का बहुत ही ग़रीब लेकिन समझदार और वेद पाठी पंडित रहा करता था। उसकी ग़रीबी का आलम यह था कि कई बार उसे अपने टूटे-फूटे घर में भूखे पेट ही रहना पड़ता था। सामान्यतः गाँव से मिली भिक्षा से राजेश का काम चल ज़ाया करता था, लेकिन एक बार २ दिन तक राजेश को भिक्षा में कुछ भी नहीं मिला इसलिए उसे भूखा ही रहना पड़ा। भूख से परेशान राजेश फटेहाल हालत याने गंदे और फटे हुए कपड़ों में ही संध्या के समय में भिक्षा माँगने निकल पड़ा और गाँव के बाहरी इलाक़े में रहने वाले सेठ के घर पहुँच गया। राजेश द्वारा घर का दरवाज़ा खटखटाने पर सेठ बाहर आए। सेठ को देखते ही राजेश ने संस्कृत में आशीर्वचन कहे और उनसे भिक्षा माँगी। आशा के विपरीत राजेश को फटे और गंदे कपड़ों में देख सेठ ने उसे भला-बुरा कहते हुए दुतकारना शुरू कर दिया और उसे धक्के मारकर अपने घर से बाहर निकाल दिया। धक्का देते वक़्त सेठ बड़बड़ा रहा था कि पता नहीं कहाँ से नंगे-भूखे, पागल लोग चले आते हैं। राजेश को सेठ का यह व्यवहार बहुत बुरा लगा और वह दुखी मन लिए वहाँ से चला गया।


सेठ के घर से लौटते वक़्त रास्ते में राजेश को एक भला इंसान मिला उसने पहले तो उसे भरपेट भोजन करवाया और फिर उसे नये कपड़े दिलवाए। अगले दिन राजेश नये कपड़े पहन कर तैयार हुआ और वापस से भिक्षा माँगने गाँव के बाहरी इलाक़े में रहने वाले उसी सेठ के घर पहुँच गया और वेद की ऋचाओं को सुनाने के पश्चात भिक्षा माँगने लगा। आज सेठ राजेश को नए कपड़ों में देख पहचान नहीं पाया और उसकी विधा से प्रभावित हो उसे बड़े आदर के साथ अपने घर के अंदर ले गया और उन्हें भोजन ग्रहण करने के लिए आग्रह करने लगा।


राजेश के हाँ करने पर सेठ ने कई व्यंजनों के साथ भोजन थाली राजेश के समीप रख दी। लेकिन सेठ की अपेक्षा के विपरीत राजेश भोजन ग्रहण करने के स्थान पर अपने कपड़ों पर ढोलने लगा और कहने लगा, ‘ले खा… और खा… पेट भर के खा…’ सेठ राजेश को बड़े आश्चर्य से देख रहा था। कुछ ही पलों में उसे लगने लगा कहीं मैंने किसी पागल को ज्ञानी समझ कर तो भोजन के लिए आमंत्रित नहीं कर लिया है? जब उनसे सहा नहीं गया तो उन्होंने राजेश से पूछ ही लिया, ‘महाराज जी आप यह क्या कर रहे हैं? इस तरह तो आप अपने कपड़े और भोजन दोनों को बर्बाद कर देंगे।’


प्रश्न सुनते ही राजेश मुस्कुराया और बोला, ‘आपने यह खाना मुझे नहीं मेरे कपड़ों को दिया था इसलिए मैं यह खाना इन कपड़ों को खिला रहा हूँ।’ जवाब सुनते ही सेठ ने अगला प्रश्न किया, ‘मैं समझा नहीं आप क्या कहना चाह रहे हैं?’ राजेश एकदम गंभीर होते हुए बोला, ‘कल जब मैं थोड़े गंदे और फेट कपड़े पहन कर आया था तो आपने मुझे धक्के मारकर निकाल दिया था और आज जब मैंने नए कपड़े पहने तो आप ने मुझे ढेर सारा अच्छा भोजन परोस दिया। इसीलिए मैंने कहा था कि आपने भोजन पर मुझे नहीं, इन कपड़ों को बुलाया है।’


दोस्तों बात तो राजेश की एकदम सही थी, कोई भी व्यक्ति महान उसके चरित्र, ज्ञान, कौशल आदि के आधार पर बनता है ना कि उसके पास उपलब्ध पैसों या संसाधनों से। जी हाँ साथियों सिर्फ़ बहुत सारे पैसे होने, अच्छे कपड़े या गहने पहनने से इंसान बड़ा या महान नहीं बनता है। उसके लिए तो उसे अच्छे चरित्र के साथ सकारात्मक नज़रिया रखते हुए अच्छे कर्म करने पड़ते हैं। सही कहा ना साथियों… इस विचार पर अपने विचार से अवगत करवाइयेगा…

-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

6 views0 comments
bottom of page