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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दौलत नहीं, दुआएँ इकट्ठा करें…

Updated: Apr 2, 2023

Mar 29, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, इस दुनिया में अमीर बनने या दौलत इकट्ठी करने से भी ज़्यादा ज़रूरी है, दुआएँ इकट्ठा करना। ठीक इसी तरह मालाएँ ज़्यादा जपने से ज़रूरी है, जीवन साधना करना। जी हाँ साथियों, जिन चीजों को सामान्य व्यक्ति महत्वपूर्ण मान, अपना जीवन जीता है, उनके मुक़ाबले हमारे आसपास मौजूद लोगों के जीवन को बेहतर बनाते हुए जीना ज़्यादा बेहतर है। याने दोस्तों, मानवता और इंसानियत के आधार पर जीवन जीना ही, वास्तव में सही जीवन जीना है। मेरी नज़र में तो साधारण इंसान या व्यक्तित्व से विशेष इंसान या व्यक्तित्व के मालिक बनने का यही एकमात्र तरीक़ा है।


इस वक्तव्य के साथ मैंने दोस्तों एक विशेष कारण से आज के लेख की शुरुआत की है। हाल ही में मुझे किसी कार्यवश एक सज्जन से मिलने जाना पड़ा। जब मैं उनके यहाँ पहुँचा तो मुझे बताया गया, ‘साहब अभी पूजा में व्यस्त हैं।’ मैं वहीं इंतज़ार करने लगा। पूजा के दौरान मैंने उन्हें माला जपते, ईश्वर को काफ़ी सारे मेवे और पकवानों का भोग लगाते और पंडितजी को दक्षिणा अर्पण करते हुए देखा। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 1 घंटे से ज़्यादा का समय लगा। अपने धर्म के प्रति उनकी आस्था देख मैं अभिभूत था।


ख़ैर उनके पूजन के पश्चात हमारी मीटिंग शुरू हुई। मीटिंग के पश्चात जब वे मुझे छोड़ने बाहर आ रहे थे तभी उन्होंने अपने एक अधीनस्थ को ज़बरदस्त फटकार लगाई। इसकी मुख्य वजह उस अधीनस्थ का अपने पिता के ऑपरेशन के लिए एडवांस लेना और 2 दिन की ली गई छुट्टी पर 3 दिन अनुपस्थित रहना था। हालाँकि उस कर्मचारी के पास इन दोनों ही ग़लतियों के लिए वाजिब कारण थे। वह बार-बार समझाने का प्रयास कर रहा था कि उसने एच॰आर॰ को एक दिन की अतिरिक्त छुट्टी के लिए पूर्व में ही सूचित कर दिया था और हॉस्पिटल में अपेक्षा से अधिक लगे पैसे के कारण ही उसने अतिरिक्त एडवांस माँगा था, जो वह अपनी अगली सैलरी में एडजस्ट करवाने के लिए राज़ी था।


दोस्तों, उन सज्जन का व्यवहार देख में हैरान था क्योंकि उनके लिए अपना कार्य एक व्यक्ति की जान से ज़्यादा महत्वपूर्ण था। वे चाहते तो उस कर्मचारी को पैसे से मदद दान समझ कर भी कर सकते थे क्योंकि उस कर्मचारी की कुल आवश्यकता उन सज्जन द्वारा कुछ देर पूर्व की गई पूजा के खर्च से भी कम थी। लेकिन शायद उनके लिए पूजा और दान का महत्व अपने कर्मचारी की ज़रूरत से ज़्यादा था। मेरी नज़र में तो मानवता की सेवा को छोड़ ईश्वर के नाम पर दान-धर्म करना एक बड़ी भूल से अधिक कुछ नहीं है क्योंकि भगवान की सोच इतनी छोटी तो नहीं हो सकती कि कोई उन्हें नैवेद्य, नारियल, दान-दक्षिणा चढ़ा देगा तो वे खुश हो जाएँगे। आप स्वयं ही सोच कर देखिएगा, जिन्होंने सारी सृष्टि बनाई है, जिन्होंने आपको इस प्यारी दुनिया देखने के लिए चुना है, क्या वो थोड़े से पैसे, थोड़े से नैवेद्य का भूखा होगा? क्या वह बच्चों की तरह नासमझ है जिसे थोड़ा सा बरगलाया या फुसलाया तो वह हमारी बात मान जाएगा?


दोस्तों, यह हमारी भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है। समाज में ऐसी और भी कई भ्रांतियाँ मौजूद हैं, अगर उपरोक्त बात सही होती तो पूजा-पाठ करने वाला हर इंसान अमीर होता। मेरी नज़र में तो परमपिता ईश्वर बस उस वक्त आपसे खुश होते है, जब आप उसकी बनाई इस सृष्टि या उसमें रहने वाले सभी पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं और इंसानों का सम्मान करना शुरू कर देंगे। वैसे भी साथियों, इंसान का मूल्य उसके द्वारा बनाई गई किसी भी वस्तु से ज़्यादा ही होना चाहिए।


याद रखिएगा दोस्तों, मैं ईश्वर की पूजा, उपासना का विरोधी नहीं हूँ। लेकिन मेरा मानना है कि पूजा-उपासना आदि तभी लाभकारी हो सकते हैं जब उसमें भौतिक चीजों से ज़्यादा भाव मौजूद हों। इससे आत्मिक शांति, संकल्प शक्ति, धैर्य, साहस, पराक्रम, तप और कष्ट को सहन करने की क्षमता में बढ़ोतरी भी तभी हो सकती है जब आप इसे पूरे भाव और समर्पण के साथ कर रहे हों। याद रखिएगा दोस्तों, जिस तरह कुम्हार बर्तन को मिट्टी में उसकी मज़बूती बढ़ाने के लिए तपाता है और साथ ही उसे बार-बार बजाके देखता है ठीक उसी तरह ईश्वर आपकी परीक्षा जीवन में अलग-अलग स्थितियों और चुनौतियों का सामना कराकर लेता है। जब आप स्वयं को ईश्वर के मूल्यों के अनुरूप सिद्ध करते हैं तब वह आपको वह सब देता है जिसे पाने की आप लालसा रखते हैं। इसीलिए दोस्तों, मैंने पहले कहा था, ‘इस दुनिया में अमीर बनने या दौलत इकट्ठी करने से भी ज़्यादा ज़रूरी है, दुआएँ इकट्ठा करना। ठीक इसी तरह मालाएँ ज़्यादा जपने से ज़रूरी है, जीवन साधना करना।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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