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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

दौलत से बड़ी है मन की शांति…

Mar 12, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, अक्सर लोग अपने व्यक्तिगत, व्यवसायिक और सामाजिक जीवन में संतुलन बनाने में असफल हो जाते हैं और इसीलिए तनाव युक्त जीवन जीते हैं। मेरी नज़र में इसकी मुख्य वजह ग़लत धारणाओं पर आधारित सोच के कारण, प्राथमिकताओं पर आधारित जीवन ना जी पाना है। अपनी बात को मैं एक बहुत ही पुरानी कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ।


एक गाँव में बहुत ही अमीर सेठ रहा करता था। जिसका मुख्य शौक़ लोगों के सामने अपनी रईसी दिखाना था। याने उसकी जीवनशैली तमाम तरीक़े के दिखावे से भरी थी। जब भी उसका कोई दोस्त या रिश्तेदार उससे मिलता था, तो वह किसी ना किसी बहाने से उनके सामने अपने पैसों का प्रदर्शन करते हुए, अपनी रईसी की चर्चायें किया करता था। इसी कारण सेठ ने अपने बच्चे को गाँव से दूर शहर के सबसे बड़े विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा था।


समय बीतता रहा और सेठ अपनी सोच पर आधारित जीवन जीता रहा। एक दिन उसका बेटा छुट्टी के दौरान अपने गाँव आया। उसके व्यवहार को देख सेठ को एहसास हुआ कि उसके बेटे की सोच उसकी सोच के विपरीत है। बेटे का मानना था कि जीवन में पैसा और सुख-सुविधाएँ सब कुछ नहीं है। सोच के इस अंतर को दूर करने के लिए सेठ ने सोचा अब समय आ गया है, जब बेटे को इस बात का एहसास करवा दिया जाए कि पिता के अमीर होने के कारण वह कितनी परेशानियों से बच गया। विचार आते ही सेठ अपनी समृद्ध जीवन शैली का एहसास अपने बेटे को करवाने का मौक़ा तलाशने लगा। इस सोच के पीछे सेठ का मानना था कि ग़रीबी सिर्फ़ और सिर्फ़ कष्टों को आमंत्रित करती है।


एक दिन अपनी अमीरी और उसके फ़ायदे का एहसास करवाने के उद्देश्य से सेठ के मन में विचार आया कि वह अपने बेटे को गाँव की सैर करवाये और उसे ग़रीबों का दयनीय जीवन दिखाए, जिससे वह पैसे या अमीर होने की महत्ता सीख सके। उसने तुरंत अपने बेटे को बुलाया और उसे अपनी योजना याने साथ में गाँव की सैर करने करने के विषय में बताया, जिसे बच्चे ने तुरंत स्वीकार कर लिया। नियत दिन पिता और पुत्र दोनों गाँव के दौरे पर निकल गए। यात्रा के दौरान, रास्ते में मिलने वाला हर व्यक्ति सेठ को सम्मान दे रहा था, जिसे देख सेठ बहुत खुश था। वह सोच रहा था कि आज उसे अपने बेटे को खुद के अमीर होने का और गाँव के लोगों में खुद के प्रति सम्मान दिखाने का मौका मिला था।


यात्रा पूर्ण करने के पश्चात सेठ ने अपने बच्चे से प्रश्न किया, ‘बताओ बेटा, आज का दिन कैसा रहा? क्या तुम्हें आज आनंद मिला?’ बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘पिताजी, आपके साथ बिताया दिन बहुत आनंददायक रहा। मुझे आज बहुत कुछ सीखने और समझने का मौक़ा मिला।’ पुत्र का जवाब सुनते ही सेठ को लगा उसकी योजना काम कर गई। उसने खुश होते हुए अपने बेटे से कहा, ‘आख़िरकार तुम समझ ही गए कि इस दुनिया में कौन अमीर है और कौन ग़रीब।’ बेटे ने हाँ में गर्दन हिलाते हुए कहा, ‘जी पिताजी, हमारे पास केवल दो कुत्ते हैं जबकि गाँव वालों के पास कम से कम दस। हमारे घर में एक छोटा सा स्वीमिंग पुल है और उनके पास पूरी की पूरी नदी। हमारे घर में कुछ विदेशों से आयातित, विभिन्न प्रकार की महँगी और शानदार लाइट है और उनके पास अनगिनत तारे।। हमारा घर मात्र १०००० वर्ग फीट पर बना है जबकि उनके पास प्रचुर मात्रा में खेत हैं, जिसका दूसरा छोर, पहले छोर से नहीं दिखता। हमने अपने घर को चारदीवारी से सुरक्षित बनाया है, जबकि वे लोग एक दूसरे से इतने बंधे है कि हमेशा एक दूसरे के साथ बने रहते हैं और ख़ुद को सुरक्षित बनाए रखते हैं। हम अपना अनाज दूसरों से खरीदते है और दूसरों से ही अपना भोजन बनवाते हैं , लेकिन वे अपना भोजन खुद उगाते भी हैं और ख़ुद बनाते भी हैं। उनकी अमीरी और हमारी ग़रीबी के स्तर का एहसास करवाने के लिए धन्यवाद पिताजी। आज मैं समझ गया हूँ कि यह अंतर मिटाने के लिए अभी मुझे कितनी मेहनत करनी है।’ बेटे का जवाब सुन पिता दंग और अवाक थे।


दोस्तों, अगर आप उपरोक्त कहानी पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि युवा के कोमल हृदय ने अमीरी और ग़रीबी के अंतर को सही नज़रिए के साथ ना सिर्फ़ समझा था, बल्कि अपने पिता याने अमीर सेठ को भी समझा दिया था, जो निश्चित तौर पर उन्हें तनाव मुक्त जीवन जीने की राह दिखाने वाला था। इसलिए दोस्तों, अगर आप ग़लत धारणाओं पर आधारित नकारात्मक सोच और ग़लत प्राथमिकताओं से बचना चाहते हैं तो इंसानियत के नज़रिए के साथ कोमल हृदय से दुनिया को देखें। इसके बिना शांतिपूर्ण जीवन कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं होगा। शायद इसलिए कहा गया है, ‘मन की शांति दुनिया की तमाम दौलत से बढ़कर होती है।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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