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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

धैर्य इंतज़ार में लगने वाले समय का नाम नहीं…

Feb 14, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, आपने अपने जीवन में कई बार मुश्किल या विपरीत परिस्थितियों का सामना करते वक़्त बड़ों या हितैषी लोगों से सुना होगा कि ‘धैर्य रख, सब ठीक हो जाएगा!’ और हम में से ज़्यादातर लोगों ने उनकी इस सलाह पर जवाब भी दिया होगा या मन ही मन सोचा होगा कि इतने समय या इतने दिनों से इंतज़ार ही तो कर रहा हूँ और कितने घंटों या दिनों तक धैर्य रखूँ? असल में दोस्तों, ऐसा अक्सर इसलिए होता है क्योंकि हम धैर्य का अर्थ इंतज़ार याने वेटिंग पीरियड से जोड़ कर देखते हैं और शायद इसीलिए मन को शांत रखने वाले इस ज़बरदस्त ‘टूल’ का सही उपयोग नहीं कर पाते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर धैर्य का अर्थ इंतज़ार करना नहीं है तो फिर यह है क्या? तो चलिए, एक कहानी के माध्यम से हम इसे समझने का प्रयास करते हैं।

बात कई हज़ार साल पुरानी है, एक तपस्वी जंगल में बैठ तपस्या कर रहे थे। तभी उस इलाक़े से नारद जी का निकलना हुआ। उन्हें देखते ही तपस्वी जी उठे और उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हुए बोले, ‘मुनिवर, आज इतनी सुबह-सुबह कहाँ जा रहे हैं?’ नारद जी ने तपस्वी को पहले आशीर्वाद दिया फिर बोले, ‘भगवान के दर्शन करने के लिए विष्णु लोक जा रहा हूँ।’ यह सुनते ही तपस्वी के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वह खुश होते हुए बोले, ‘मुनिवर, क्या आप भगवान विष्णु से मेरा भी एक प्रश्न पूछ लेंगे?’ नारद जी के हाँ कहते ही तपस्वी बोले, ‘मुनिवर, आप उनसे पूछियेगा कि मुझे उनके दर्शन करने का अवसर कब मिलेगा?’


नारद जी तपस्वी को हाँ कहते हुए विष्णु लोक की ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर पहले उन्होंने विष्णु भगवान को साष्टांग प्रणाम करते हुए उनके दर्शन किए और फिर तपस्वी का प्रश्न पूछा। प्रश्न सुन विष्णु जी मुस्कुराए और बोले, ‘मेरे भक्त को मेरा आशीर्वाद देते हुए कहिएगा कि उसे चौरासी लाख योनियों के अट्ठारह चक्कर लगाने के बाद मेरे दर्शन करने का मौक़ा मिलेगा।’ भगवान विष्णु का जवाब सुन नारद जी चौंक गए और लौटते वक़्त तपस्वी को विष्णु जी का आशीर्वाद देते हुए बता दिया कि उन्हें अभी चौरासी लाख योनियों के अट्ठारह चक्कर और लगाने पड़ेंगे उसके बाद ही भगवान विष्णु के दर्शन हो पायेंगे।

भगवान विष्णु का जवाब सुन नारद जी की अपेक्षा के एकदम इतर तपस्वी अधीर नहीं हुए और ख़ुशी से नाचने लगे। ऐसा लग रहा था मानो उनके लिए चौरासी लाख योनियों का अट्ठारह बार चक्कर लगाना मामूली सी बात थी। अर्थात् उनकी प्रतिक्रिया देख ऐसा लग रहा था मानो समय की उन्हें जल्दी ही न थी। उन्हें नारद जी का आश्वासन देना कि देर सबेर भगवान उन्हें दर्शन देंगे; यही पर्याप्त लगा और वे दोगुने जोश के साथ तपस्या में लग गये। नारद जी समेत भगवान विष्णु तपस्वी की अविचल निष्ठा और धैर्य को देख हैरान थे। नारद जी ने तपस्वी को प्रणाम किया और वहाँ से चले गए। दूसरी ओर तपस्वी की तल्लीनता देख विष्णु जी प्रसन्न हो गये और उन्होंने तुरंत ही उन तपस्वी को दर्शन दे दिए।


जब यह बात नारद जी को पता चली तो वे बहुत दुखी हुए और वे भगवान विष्णु के पास जाकर बोले, ‘प्रभु आपने तो मुझे झूठा साबित करवा दिया। मुझसे कहा कि उस तपस्वी को चौरासी लाख योनियों के अट्ठारह चक्कर लगाने के बाद दर्शन देंगे और आपने उन्हें तुरंत दर्शन दे दिए।’ भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए बिलकुल शांत स्वर में बोले, ‘नारद, जिस भक्त की निष्ठा अविचल हो; जिसमें असीम धैर्य हो, उसके तो मैं सदा समीप हूँ, देर तो उन्हें लगती है जो उतावले रहते हैं। उस भक्त के प्रश्न में मुझे उतावलापन नज़र आ रहा था, इसलिए मैंने इतनी लंबी अवधि बताई थी। लेकिन जैसे ही मुझे उसके धैर्यवान होने का एहसास हुआ, मैंने तुरंत उसे दर्शन दे दिये।’


दोस्तों, अब तो आप निश्चित तौर पर समझ ही गए होंगे मैंने पूर्व में क्यों कहा था कि धैर्य का अर्थ इंतज़ार नहीं है। धैर्य का अर्थ तो इंतज़ार के दौरान आप किस तरह का व्यवहार करते हैं, उससे है। इसी बात को अगर मैं उपरोक्त कथा से जोड़कर बताऊँ तो चौरासी लाख योनियों के अट्ठारह चक्कर सुनकर, चौंक कर जो प्रतिक्रिया नारद जी ने दी थी, वह अधीरता का प्रतीक थी और जिस तरह तपस्वी ने इंतज़ार में लगने वाले जन्मों के समय को सरलता के साथ स्वीकारा था, वह धैर्य का प्रतीक था। इस आधार पर कहा जाए, तो अगर आप आनंद के साथ हर क्षण को स्वीकार रहे हैं तो आप धैर्यवान हैं। विचार कर देखियेगा…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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