• Nirmal Bhatnagar

नज़रिए को सही रख रहें हमेशा ख़ुश!!!

Sep 24, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, खुश रहना भी एक आदत है और दुखी और परेशान रहना भी एक आदत है। अपनी बात को मैं हाल ही में घटी एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ। मेरे एक मित्र पिछले कुछ दिनों से थोड़े परेशान चल रहे थे। मैंने जब उनसे इस विषय में चर्चा करी तो वे बोले, ‘क्या बताऊँ यार लाखों का नुक़सान हो गया।’ बात सुन कुछ पलों के लिए तो मुझे भी जोर का धक्का लगा, पर अगले ही पल मुझे ध्यान आया कि वे तो बड़े मंझे हुए खिलाड़ी है अर्थात् बेहद अनुभवी व्यापारी हैं, जिन्होंने फ़र्श से अर्श तक का सफर तय किया है। वे इतनी बड़ी चूक कैसे कर सकते हैं? मैंने उन्हें पूरी बात विस्तार से बताने के लिए कहा तो वे बोले, ‘यार तुम्हें तो पता ही है ना, मैंने एक प्लॉट ले रखा था।’ मैंने कहा, ‘हाँ तुमने मुझे बताया था।’ ‘बस यार वह प्लॉट मैंने बेच दिया है’ मित्र बोले। मैंने तुरंत बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘यार ऐसी क्या ज़रूरत आ गई थी जो प्लॉट को नुक़सान में बेचना पड़ा।’ तो वे बोले, ‘ऐसा तो कुछ नहीं है मित्र, 2000 प्रति वर्ग फुट के लाभ के साथ मैंने उसका सौदा किया था। पर बाद में मुझे पता चला कि अगर मैं थोड़ा सा इंतज़ार करता तो यह लाभ 2500 से 2700 रुपए प्रति वर्ग फुट होता।’ मित्र की बात सुन, मैं हैरान था, वह 750 रुपए प्रति वर्ग फुट के काल्पनिक लाभ या नुक़सान की वजह से 2000 प्रति वर्ग फुट के लाभ को भूल, दुखी हो रहा था। इसीलिए दोस्तों, मैंने पूर्व में कहा था, ‘खुश रहना भी एक आदत है और दुखी रहना भी एक आदत है।’


मेरे मित्र ज़्यादा लाभ को, ज़्यादा ख़ुशी के साथ जोड़ रहे थे और उसी के लिए प्रयासरत थे। ठीक उसी तरह जैसे, हममें से हर कोई जीवन में ख़ुशियाँ चाहता है, उसके लिए प्रयास करता है। लेकिन ख़ुशी के बारे में सोचना या प्रयास करना काफ़ी नहीं है दोस्तों, उसके लिए सोच, नज़रिया और दृढ़ इच्छा की भी आवश्यकता होती है। सामान्यतः देखा गया है, असफलता, दुःख या परेशानी की वजह, प्रयास में कमी के साथ-साथ सही सोच और सही नज़रिया ना होना भी है। मित्र के संदर्भ में दुःख का यही कारण था।


सामान्यतः देखा गया है कि असफल, परेशान और दुखी लोग अपनी चाहत के विपरीत प्रयास करते हैं। अर्थात् उनके कर्म, उनकी सोच, उनका नज़रिया उनके लक्ष्य के साथ मेल नहीं खाता है। चाहत रखना कहीं से भी ग़लत नहीं है, लेकिन गलत सोच, नकारात्मक नज़रिए और अधूरे प्रयास से मंज़िल पाने की आस रखना ग़लत हैं। उपरोक्त उदाहरण को एक बार फिर देखा जाए तो आप पाएँगे कि हक़ीक़त में तो मित्र ने मुनाफ़ा ही कमाया था, लेकिन अपनी ग़लत सोच व नज़रिए के कारण उसे अपने दुःख का कारण बना लिया था।


इसीलिए मेरा मानना है कि सुखी या खुश रहने के लिए निरंतर प्रयास करना काफ़ी नहीं है। अपितु सही सोच और नज़रिए के साथ सही दिशा में प्रयास करना ज़रूरी है। इसी तरह दुःख या असफलता को लेकर भी हमारी सोच में परिवर्तन करना ज़रूरी है। दुःख ईश्वर का दिया दंड नहीं बल्कि ग़लत सोच, ग़लत नज़रिए या फिर ग़लत दिशा में किए गए प्रयास का परिणाम है। इसे आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। अगर आप अपने आस-पास मौजूद लोगों को थोड़ा सा ध्यान से देखेंगे, तो पाएँगे कि वे दिखाने के लिए तो एकदम राम की तरह जीवन जीते हैं। लेकिन हक़ीक़त में उनके कर्म रावण जैसे होते हैं। उदाहरण के लिए, आपको कई लोग दूर से एकदम सरल, सहज और नियमों पर चलने वाले लगेंगे, लेकिन अगर आप क़रीब जाकर देखेंगे तो पाएँगे कि वे अपने तात्कालिक लाभ के अनुसार निर्णय ले, काम करते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो आजकल ज़्यादातर लोग, देखने में राम के संग खड़े नज़र आएँगे, परंतु जैसे ही उन्हें अपना लाभ नज़र आएगा या अवसर मिलेगा, वे रावण बन जाएँगे। यहाँ आप राम को सही सोच, नज़रिया या पुण्य मान सकते हैं और रावण को तात्कालिक लाभ, लालच या पाप समझ सकते हैं। अगर आप खुश रहते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो आज से राम को अर्थात् सही सोच और नज़रिए को हमेशा के लिए अपना साथी बना लें।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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