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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

पहचाने मूल्य उसका, जो है आपके पास…

Sep 3, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइये साथियों आज के लेख की शुरुआत जीवन मूल्य सिखाने वाली एक बड़ी ही प्यारी कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है गाँव के धन्ना सेठ, जिनके पास अथाह दौलत थी, अचानक ही काफ़ी उदास रहने लगे। उनके परिचितों को इसका कोई कारण समझ नहीं आता था क्योंकि उनके ना तो कोई आगे था ना पीछे और ना ही जीवन में किसी चीज की कमी थी, जिसकी चिंता हो। लोगों की सलाह पर उस धन्ना सेठ ने एक बार शहर के बाहरी इलाक़े में घास-पूस की झोपड़ी में रहने वाले साधु-महात्मा से मिलने का निर्णय लिया।


एक दिन वह उनके पास सुबह-सुबह पहुँचा और उनके सामने हीरे-जवाहरात और अथाह दौलत से भरी झोली रखते हुए बोला, ‘महात्मन, मैंने पूरे जीवन भर सुख, प्रसन्नता और आनंद की चाह में अथाह धन कमाया। आज यह देखिए मेरे पास सब-कुछ है। ना मेरे आगे कोई है और ना ही पीछे और तो और अब तो कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं बची है और लग रहा है मृत्यु भी क़रीब है। लेकिन आज तक सुख का एक कण भी मुझे चखने को नहीं मिला है। महात्मन अब सिर्फ़ आपका सहारा है, बताइये मैं कैसे सुखी होऊँ।’


साधु-महात्मा तो साधु-महात्मा ही होते हैं कई बार उनके सिखाने के तरीक़े बड़े विचित्र और अजीबोग़रीब होते हैं। उन्होंने सेठ की और देखा और ज़ोर से खिलखिलाकर हंसने लगे और फिर अचानक ही उस सेठ के सामने रखे हीरे-जवाहरात, धन-दौलत का थैला उठाकर भागने लगे। पहले तो सेठ को कुछ समझ नहीं आया कि यह क्या हो रहा है। लेकिन अगले ही पल उसे एहसास हुआ कि शायद मुझे महात्मा ने लूट लिया है। मेरे हाथ से मेरे जीवन भर की कमाई छिन गई है। वह तेज़ी से उठा और ‘लूट गया, लूट गया…’ चिल्लाते हुए साधु के पीछे भागा। भागते-भागते धन्ना सेठ मन ही मन सोच रहा था कि मैं तो सुख की तलाश में इस महात्मा के पास आया था लेकिन अब लूट जाने की वजह से और दुखी हो गया। दूसरी ओर साधु-महात्मा भी बेतहाशा शहर की गलियों में भागे जा रहे थे। भीड़ भी अब साधु-महात्मा के पीछे हो ली। वो भी इस बात को जानती थी कि महात्मा जी के जीवन पाठ सिखाने के तरीक़े बड़े अनूठे और अनोखे होते हैं। वे आश्वस्त थे कि आज भी महात्मा जी कोई लीला रच रहे होंगे इस धन्ना सेठ को जीवन का कोई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने के लिए। इसलिए बस वे सब दर्शक बने हुए थे। लेकिन धन्ना सेठ पसीना-पसीना हो महात्मा के पीछे मदद माँगते हुए चिल्लाता हुआ भागा जा रहा था।


कुछ देर बाद महात्मा जी वापस अपनी झोपड़ी के समीप, पेड़ से बंधे धन्ना सेठ के घोड़े के पास पहुँच गये और धन-दौलत से भरा झोला घोड़े के पास रख, पेड़ के पीछे छुप गये। कुछ ही देर में हाँफते-हाँफते धन्ना सेठ वहाँ पहुँचे और झोले को देख उसे उठा कर छाती से लगा कर बोले, ‘हे परमात्मा! तेरा लाख-लाख धन्यवाद!’ इतना सुनते ही महात्मा जी झाड़ के पीछे से बाहर निकले और मुस्कुराते हुए बोले, ‘मिल गया सुख?’ धन्ना सेठ अपना मुँह हिलाये बिना नहीं रह सका। महात्मा ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘यह झोला पहले भी तुम्हारे पास था अर्थात् तुम्हारा सुख पहले से ही तुम्हारे पास था, पर तुम उस ओर देख ही नहीं रहे थे। इसका अर्थ हुआ जो तुम्हारे पास था तुम उसका मूल्य ही नहीं समझ रहे थे। जब तुमसे थोड़ी देर के लिए झोली छिनी तो तुमने उसका मूल्य पहचाना अर्थात् जो पास है उसे खोते ही तुम्हें अक़्ल आ गई।’


दोस्तों, महात्मा जी की बात थी तो एकदम सही। सामान्यतः हम सभी लोग भी उस धन्ना सेठ के समान ही चीजों को खोने के बाद ही उसका मूल्य समझते हैं फिर वह चाहे हमारी सेहत हो या हमारे परिवार के सदस्य या फिर कोई रिश्तेदार या मित्र। जब तक हम गँवाते नहीं है तब तक उनका मूल्य नहीं समझ पाते हैं और अकारण ही दुखी रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ साथियों, तो जो हमारे पास है वह हमारी नज़र में दो कौड़ी का है और जो खो गया, उसके लिए हम रोते हैं। अगर साथियों, वाक़ई सुखी रहते हुए जीवन जीना चाहते हो तो ‘जो प्राप्त है वह पर्याप्त है!’ की सोच विकसित करो अन्यथा जीवन भर असंतुष्ट और अशांत ही रहोगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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