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पाने नहीं, देने का नज़रिया रखें…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Nov 6, 2023
  • 4 min read

Nov 6, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत कई वर्षों पूर्व सुनी एक जीवन बदल देने वाली कहानी से करते हैं। बात काफ़ी साल पुरानी है, एक साधु ने शहरी शोर-शराबे से दूर जाकर शांत वातावरण में साधना करने के लिए जंगल को चुना और जंगल पहुँचकर एक बड़ी चट्टान पर आँखें बंद कर ध्यान करने के लिए बैठ गया। कुछ देर बाद साधु के मन में विचार आया कि उसे अपने भोजन की व्यवस्था अभी कर लेना चाहिये नहीं तो अंधेरा होने के पश्चात दिक़्क़त होगी। विचार आते ही साधु साधना से बाहर आए और जंगल में भोजन तलाशने लगे, तभी उनका ध्यान एक घायल लोमड़ी पर गया जिसके पैरों में गंभीर चोट लगी हुई थी और उसके कारण उसके लिए चलना भी मुश्किल हो गया था। साधु सोचने लगे, देखने से तो इस लोमड़ी की चोट बहुत पुरानी लग रही है। जिसके कारण उसके लिए हिलना-डुलना भी मुश्किल है, ऐसी स्थिति में यह अपने भोजन का इंतज़ाम कैसे करती होगी और साथ ही इस घने जंगल में ख़ूँख़ार जंगली जानवरों से अपने जीवन की रक्षा कैसे करती होगी?


अभी साधु इस विषय में सोच ही रहे थे कि उन्होंने पक्षियों के बीच में अजीब सी हलचल देखी। इसका कारण जानने के लिए वे इधर-उधर नज़रें दौड़ाने लगे। तभी शेर की दहाड़ सुन साधु को पक्षियों की हलचल का कारण समझ आया और वे तुरंत अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ गए और सोचने लगे आज लोमड़ी के जीवन का अंतिम दिन है क्योंकि उसके लिए शेर से अपनी जान बचाना संभव नहीं है। शेर आज उस लोमड़ी को मारकर खा जाएगा। लेकिन आगे जो हुआ, वह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। शेर ने वहाँ पहुँचकर उसका शिकार नहीं किया बल्कि अपने मुँह में पकड़ा मांस का टुकड़ा लोमड़ी के सामने गिरा दिया जिससे वह अपनी भूख मिटा सके।


साधु अचंभित था, वह सोच रहा था कि शिकारी ख़ुद शिकार के लिए खाना लेकर आया है। इतना ही नहीं, जब तक लोमड़ी ने मांस का वह टुकड़ा खा नहीं लिया, वह वहीं खड़ा रहा जिससे कोई और उससे मांस ना छीन ले। यह देख साधु गंभीर सोच में पड़ गया। उसे आज पहली बार ईश्वर के साक्षात होने का एहसास हुआ। वह सोचने लगा जिस तरह उसने इस लोमड़ी के लिए भोजन का इंतज़ाम किया है ठीक उसी तरह वह मेरे भोजन का भी इंतज़ाम करेगा। मैं भी कितना मूर्ख था जो अपनी साधना छोड़, खाने-पीने की व्यवस्था में लग गया। अब तो मैं तभी भोजन करूँगा, जब ईश्वर मेरे खाने-पीने की व्यवस्था करेंगे।


शेर के जाने के बाद साधु पेड़ से नीचे उतरा और अपने स्थान पर जाकर साधना में लग गया। उस पूरे दिन उसे कुछ भी खाने-पीने के लिए नहीं मिला। साधु ने दूसरे दिन भी अपनी साधना को उसी तरह जारी रखा। तीसरे दिन रात तक साधु की तबियत भूखे रहने कारण बिगड़ने लगी लेकिन फिर भी साधु ने अपनी साधना यह सोच कर जारी रखी कि जिस तरह ईश्वर ने लोमड़ी के लिए खाने की व्यवस्था की थी, ठीक वैसे ही वे मेरे लिये भी भोजन की व्यवस्था करेंगे और किसी ना किसी को मेरे पास भोजन लेकर भेजेंगे, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।


अगले दिन दोपहर तक भूख की वजह से वो साधु मूर्छित हो गया। तभी वहाँ से एक बड़े सिद्ध महात्मा निकले, उन्होंने साधु को इस अवस्था में देखा तो वे तत्काल उसके पास गये और जड़ी-बूटी की सहायता के साथ उसे होश में लाए। उसके बाद सिद्ध महात्मा ने साधु को पानी पिलाया और उससे उसकी हालत के विषय में पूछा। साधु ने लोमड़ी वाली पूरी घटना कह सुनाई और सिद्ध महात्मा से प्रश्न पूछते हुए बोला, ‘महात्मन! भगवान मेरे साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं। उन्होंने लोमड़ी तक तो भोजन पहुँचा दिया, लेकिन मुझे इस हालात में छोड़ दिया। समाज में फैली भुखमरी और परेशानियों को देख तो मुझे लगता है कि ईश्वर की प्राथमिकता में इंसान है ही नहीं।’ प्रश्न सुन महात्मा मुस्कुराए और साधु से बोले, ‘तो फिर मैं तुम्हारे पास कैसे आया? मुझे भी तो ईश्वर ने ही भेजा है। रही बात भोजन की तो शायद ईश्वर तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हों।’


दोस्तों, बात तो सिद्ध महात्मा ने सौ टका सच बोली थी। ईश्वर के लिये तो सभी प्राणी बराबर है, फिर चाहे वे इंसान हों या जानवर। वह कभी भी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं क्योंकि वे हम सभी के जनक हैं। लेकिन इसके बाद भी सारा अंतर सिर्फ़ और सिर्फ़ इस वजह से आता है कि आपने अपने आपको कहाँ रखा है। उसने याने परमात्मा ने तो इंसानों को अपनी सर्वोच्च क्षमताओं से नवाज़ा है। उसने हमें असीम क्षमता और शक्तियाँ दी हैं, बस अपनी अज्ञानता और चीजों को नज़रंदाज़ करने की अपनी आदतों के कारण हम उसे पहचान नहीं पा रहे हैं और ख़ुद को कमज़ोर, परेशान और पीड़ित मान रहे हैं। इतना ही नहीं इन समस्याओं, दिक़्क़तों, परेशानियों को याद कर हम दूसरों से मदद की आस रखते हैं और ना मिलने पर दुखी हो जाते है। इससे निपटने का सबसे आसान रास्ता; मदद की आस में बैठे रहने के स्थान पर अपनी क्षमताओं को विकसित कर दूसरों की मदद करने लायक़ बनाना है। यही वास्तव में प्रगति का सूचक है, सपनों को पूरा करने का रास्ता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

 
 
 

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