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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

पैसों से भी ज़्यादा ज़रूरी है कुछ…

Jan 24, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक ऐसी कहानी से करते हैं जिसे आपने निश्चित तौर पर सुन रखा होगा। लेकिन आज हम उसी कहानी को थोड़ा आगे बढ़ाके जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ सीखेंगे जिसकी सहायता से हम अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सीखेंगे। चलिए शुरू करते हैं, बात कई साल पुरानी है। एक वृद्ध विद्वान साधु ने पानी के जहाज़ से धार्मिक यात्रा पर जाने का निर्णय लिया। आश्रम से निकलते वक्त उन्होंने दान में मिले हीरे के साथ रास्ते में खर्च के लिए पर्याप्त धन रख लिया। जैसे ही उक्त बात एक चोर को पता चली उसने विद्वान साधु को लूटने की योजना बनाई और स्वयं भी उसी जहाज़ से यात्रा पर निकल गया।


जहाज़ पर पहुँच कर सबसे पहले उस चोर ने विद्वान साधु के साथ नज़दीकियाँ बढ़ाने का प्रयास करना शुरू कर दिया और बातों ही बातों में साधु से उगलवा लिया कि वे अपने साथ एक बहुमूल्य हीरा लेकर यात्रा कर रहे हैं। इतना ही नहीं एक दिन तो साधु ने उसे विश्वासपात्र मान हीरे की झलक भी दिखा दी। चोर ने उसी रात हीरा चुराने की योजना बनाई और साधु के सोने के बाद उनके झोले और कपड़ों में हीरा खोजने का प्रयास करने लगा। हीरा खोजने में सफलता ना मिलने के बाद उस चोर ने अगले दिन साधु से प्रश्न किया, ‘आपने हीरा सम्भाल कर तो रखा है?’ साधु ने झोले में से तुरंत हीरा निकालकर उस चोर को दिखा दिया। चोर हैरान था, उसने अगले दिन भी प्रयास करा लेकिन उसे एक बार फिर असफलता ही हाथ लगी। कई बार असफलता हाथ लगने के बाद एक दिन चोर ने साधु से इस विषय में पूछ ही लिया, ‘बाबा, मैं कई बार आपके झोले में हीरे को तलाशता हूँ, मगर वह मुझे कभी नहीं मिलता। ऐसा क्यों?’ प्रश्न सुनते ही साधु मुस्कुराये और बोले, ‘मुझे पता था तुम ढोंगी चोर हो। इसलिए हीरे को सुरक्षित रखने के लिए मैं उसे रात को तुम्हारे झोले में छुपा देता था और तुम्हारे उठने के पहले उसे वापस निकाल लेता था।


दोस्तों, कहानी के इस पहले भाग से हम जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पाठ सीख सकते हैं कि व्यक्ति सामान्यतः सुख और ख़ुशी को बाहरी दुनिया में तलाशने में इतना व्यस्त हो जाता है कि कभी अपने अंदर झांकता ही नहीं है। अर्थात् उसे कभी अपने अंदर नहीं ढूँढता। इसी तरह हमें अवगुण और ग़लतियाँ भी दूसरों में ही दिखती हैं। इसका कारण भी वही है, हम कभी भी अपने अंदर नहीं झांकते।


चलिए, अब हम कहानी के दूसरे भाग की ओर चलते हैं। साधु से हीरे के विषय में जान चोर और ज़्यादा ईर्ष्या और द्वेष से भर गया और मन ही मन किसी भी क़ीमत पर हीरा पाने की योजना बनाने लगा। एक दिन सुबह-सुबह उस चोर ने रोते हुए ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मर गया!!! मेरा एक कीमती हीरा चोरी हो गया। कोई तो मदद करो मेरी।’ जहाज़ के कर्मचारियों ने उसे ढाढ़स बँधाते हुए कहा, ‘घबराओ मत! हम अभी सबकी तलाशी लेते हैं और उनके सामान को चेक करते हैं। जिसने भी हीरा लिया होगा, अभी पकड़ा जाएगा।’


सभी यात्रियों की तलाशी शुरू हो गई। जब साधु बाबा की बारी आई तो जहाज़ के कर्मचारी बोले, ‘बाबा, आपकी तलाशी की ज़रूरत नहीं है। आप पर अविश्वास करना धर्म का और सज्जनता का अपमान होगा।’ यह सुनते ही साधु बोले, ‘नहीं!!! ऐसा करने से जिसका हीरा चोरी हुआ है, उसे संतोष नहीं मिलेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।’ बाबा के बार-बार कहने पर उनकी और उनके सामान की तलाशी ली गई लेकिन इस बार भी उनके पास हीरा नहीं मिला और अंत में सभी ने यह मान लिया कि उस चोर के पास हीरा था ही नहीं। उस दिन संध्या के समय चोर वापस से साधु के पास पहुँचा और बोला, ‘बाबा, इस बार तो मैंने अपने और आपके दोनों के सामान में हीरा तलाशा था, पर वो मिला नहीं। वो कहाँ गया?’ साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘उसे तो मैंने समुद्र में फेंक दिया था क्योंकि मेरे लिये हीरे से ज़्यादा बहुमूल्य लोगों का अपने ऊपर विश्वास और ईमानदारी है।’


बात तो दोस्तों उन बुद्धिमान साधु की बहुत गहरी थी। इंसान का चरित्र, उसकी ईमानदारी, विश्वसनीयता, सत्यता आदि अन्य किसी भी भौतिक चीज से ज़्यादा क़ीमती होती है। अगर आप अपने जीवन में सिर्फ़ इसे बचा लेंगे तो भी विशेष और सफल बन जाएँगे और इसके बिना सब कुछ होने के बाद भी ग़रीब और बुरे ही माने जाओगे। उपरोक्त बात को हम उपरोक्त कहानी से ही समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए तलाशी के दौरान हीरा साधु के पास मिलता और वो लोगों से कहता कि यह मेरा है तो क्या लोग उस पर विश्वास करते? शायद नहीं! चलिए, अब हम दूसरी परिस्थिति पर भी विचार करके देखते हैं। साधु के पूर्व के कर्मों और उनकी विश्वसनीयता को आधार मानकर विश्वास करते और तलाशी नहीं लेते तो भी कुछ लोग निश्चित तौर पर उनकी ईमानदारी और सत्यता पर संशय करते। इसलिए दोस्तों, साधु ने हीरा गँवाना बेहतर समझा। इसलिए दोस्तों, आज से किसी भी अन्य चीज के मुक़ाबले अपने चरित्र, ईमानदारी, सत्यता, सत्य निष्ठा, विश्वास आदि को प्राथमिकता में रखें।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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