प्यार, धैर्य और समझदारी से करें पेरेंटिंग…
- Nirmal Bhatnagar

- Mar 9, 2025
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Mar 9, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

आइए शुरुआत करते हैं, एक छोटे से किस्से से। एक मॉल के बीचों-बीच, एक दो साल की बच्ची ज़मीन पर लेटकर ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी। उस वक्त मॉल में उसके आस-पास मौजूद हर शख़्स उस बच्ची और उसके साथ आए पालकों को देख रहा था। लेकिन उसके पालक याने उसके पिता या दादा उसे चुप कराने में कोई हड़बड़ाहट नहीं दिखा रहे थे और न ही गुस्से से उसे डांट रहे थे। बल्कि, वे दोनों तो बस शांत खड़े थे और धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे थे कि बच्ची का गुस्सा खुद ही शांत हो जाए। उन्होंने तय कर लिया था कि वे उसकी जिद को नहीं मानेंगे, लेकिन साथ ही, वे उसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की पूरी आज़ादी दे रहे थे।
दोस्तों उपरोक्त दृश्य की सबसे खास बात थी, उसके पिता और दादा का शांत और धैर्य पूर्ण व्यवहार। वे दोनों बिना किसी हड़बड़ाहट, क्रोध या शर्मिंदगी के बस शांत खड़े हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि बच्ची का गुस्सा खुद-ब-खुद शांत हो जाए। यह घटना हमें बहुत कुछ सिखाती है। आमतौर पर जब बच्चे सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह की हरकतें करते हैं, तो माता-पिता असहज हो जाते हैं। वे या तो बच्चों को तुरंत चुप कराने की कोशिश करते हैं या फिर नाराज़ होकर उन्हें डांटते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें लगता है कि लोग उन्हें जज करेंगे और सोचेंगे कि‘कैसे माता-पिता हैं, जो अपने बच्चे को सम्भाल नहीं पा रहे हैं!’ लेकिन यहाँ पिता और दादा ने बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने बच्ची को उसकी भावनाओं को व्यक्त करने दिया, बिना किसी हस्तक्षेप या दबाव के। यह धैर्य और समझदारी से पेरेंटिंग करने का एक बेहतरीन उदाहरण है।
चलिए इस पर थोड़ा विस्तार से चर्चा कर लेते हैं। बच्चे जब बड़े हो रहे होते हैं, तो वे नई-नई भावनाओं का अनुभव करते हैं। वे अपनी इच्छाओं को पूरा न होता देख गुस्सा, नाराज़गी और हताशा महसूस करते हैं, लेकिन उनके पास इतनी समझ नहीं होती कि वे इन भावनाओं को कैसे सँभालें। ऐसे में, अगर माता-पिता गुस्सा करते हैं या उन्हें हड़बड़ाहट में चुप करवाते हैं, तो बच्चे अपनी भावनाओं को सही तरीके से समझना नहीं सीखते। बल्कि वे अंदर ही अंदर अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं, जो आगे चलकर उनके जीवन में मानसिक तनाव का कारण बन सकता है।
इसलिए, जब बच्चे गुस्से में हों या कोई जिद पकड़ लें, तो जरूरी नहीं कि उन्हें तुरंत शांत करवाने की कोशिश की जाए। कभी-कभी बस उनके पास रहकर, धैर्य के साथ प्रतीक्षा करना ही सबसे अच्छा समाधान होता है। बीतते समय के साथ धीमे-धीमे ख़ुद ही शांत हो जाने का यह अनुभव उन्हें सिखाता है कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करना गलत नहीं है। साथ ही वे यह भी सीखते हैं कि उन्हें ऐसी स्थितियों में ख़ुद को कैसे सम्भालना है, जो जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक है।
धैर्य और प्रतीक्षा के साथ बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने के इस तरीके को ‘Get Comfortable in the Uncomfortable’ याने असहज परिस्थितियों में सहज रहना कहा जाता है। यह सिद्धांत सिर्फ बच्चों के गुस्से से निपटने का सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह हमें उस वक्त भी मदद करता है जब हम जीवन में उन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिनका हमें तुरंत समाधान नहीं मिलता, जहां हालात हमारे नियंत्रण में नहीं होते। यह सिद्धांत हमें ऐसे समय में धैर्य रखने, चीजों को उनके स्वाभाविक प्रवाह में चलने देने और उसपर तत्काल प्रतिक्रिया देने या घबराने के स्थान पर उसे स्वीकारना सिखाता है।
इसके विपरीत अक्सर माता-पिता बच्चों की परवरिश को समाज के नजरिये से देखते हैं और उनके द्वारा रोते या गुस्सा करते हुए अपनी भावना को व्यक्त करता देख उन्हें सिर्फ़ इस सोच के साथ डांटते हैं कि "लोग क्या कहेंगे?" याद रखिएगा, अच्छी परवरिश का मतलब यह नहीं कि बच्चे हमेशा अनुशासित रहें, बल्कि यह है कि हम उन्हें समझने और सम्भलने का सही तरीका सिखायें। जी हाँ, यह कतई जरूरी नहीं कि हम बच्चों की परवरिश दूसरों की अपेक्षाओं के हिसाब से करें। उपरोक्त किस्से में उस बच्ची के पिता या दादा ने यह नहीं कहा कि‘मत रोओ तुम्हारा यह व्यवहार हमें शर्मिंदा महसूस करवा रहा है।’ या ‘ऐसी स्थिति में हमारे माता-पिता हमारे साथ कैसा व्यवहार करते थे।’ बल्कि उन्होंने उस बच्ची को अपनी भावनाओं को महसूस करने और समझने की आज़ादी दी।
दोस्तों उपरोक्त किस्सा या बच्चों को डील करने का यह तरीका हमें पेरेंटिंग के निम्न सूत्र सिखाता है-
1) बच्चों को उनकी भावनाएं व्यक्त करने दें – उन्हें बताएं कि गुस्सा या उदासी जैसी भावनाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना जरूरी है।
2) धैर्य रखें और शांत रहें – तुरंत गुस्सा न करें, बल्कि धैर्यपूर्वक स्थिति को समझें।
3) दूसरों की परवाह किए बिना परवरिश करें – अच्छे माता-पिता होने का मतलब समाज के हिसाब से अपने बच्चे को ढालना नहीं, बल्कि उसे प्यार और समझदारी से गाइड करना है।
4) बच्चों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) विकसित करें – उन्हें यह सिखाएं कि अपनी भावनाओं को कैसे पहचाने और सही तरीके से संभाले।
अंत में दोस्तों सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि धैर्य, समझदारी और बच्चों की भावनाओं को स्वीकार करने की कला पेरेंटिंग में बड़ा महत्वपूर्ण रोल निभाती है। बच्चों को एक सख्त अनुशासन से नहीं, बल्कि प्यार, धैर्य और सही मार्गदर्शन से बेहतर इंसान बनाया जा सकता है। अगली बार जब आपका बच्चा जिद करे या गुस्सा दिखाए, तो उसे चुप कराने से पहले यह सोचें, ‘क्या वह सिर्फ अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा है? और क्या हमें उसे यह अवसर नहीं देना चाहिए?’ याद रखें, परवरिश सिर्फ सिखाने का नाम नहीं, बल्कि समझने का भी है। अगर हम अपने बच्चों को प्यार, धैर्य और सही मार्गदर्शन देंगे, तो वे ज़रूर आत्मनिर्भर और भावनात्मक रूप से मजबूत बनेंगे।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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