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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

प्रतिस्पर्धा जमाने से नहीं, ख़ुद से करिए…

Apr 1, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



आईए दोस्तों आज के लेख की शुरुआत एक काल्पनिक क़िस्से से करते हैं। शहर के सबसे नामी विद्यालय का माहौल आज कुछ अनूठा, अनोखा और उत्साह से भरा था। इसका मुख्य कारण आज विद्यालय प्रबंधन द्वारा खेलकूद महोत्सव का आयोजन किया जाना था, जिसमें उन्होंने बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी बुलाया था। उद्घाटन समारोह के पश्चात खेल शिक्षक के सीटी बजाते ही सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षा के साथ तय स्थान पर एकत्रित हो गए और अलग-अलग खेल प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। बच्चों का उत्साह और ख़ुशी देख माता-पिता भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, हर प्रतियोगिता के दौरान वे भी कभी ताली बजाकर तो कभी ज़ोर से चिल्लाकर उनका उत्साह बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।


कुछ देर पश्चात खेल के मुख्य मैदान में ४०० मीटर दौड़ का फाइनल मुक़ाबला आयोजित किया गया। खेल शिक्षक के सीटी बजाते ही लगभग ३० बच्चे मैदान में पहुँचे और अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए। तभी एक अध्यापक ने सीटी बजाई और सभी बच्चों ने दौड़ लगाना शुरू कर दिया। हर बच्चा अपनी ओर से इस दौड़ को जीत कर प्रथम तीन में से कोई एक स्थान प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था, जिससे वह आज विशेष पुरस्कार हासिल कर सके। वहीं दूसरी ओर वहाँ उपस्थित बच्चों के अभिभावक भी ‘और तेज…’ ‘और तेज…’ ‘और तेज…’, बोलकर बच्चों का उत्साह बढ़ा रहे थे।


लगभग एक-सवा मिनिट में दौड़ ख़त्म हो गई। दर्शक जहाँ तालियाँ बजाकर बच्चों को बधाई दे रहे थे, वहीं प्रथम तीन स्थानों पर आए बच्चे अपने माता-पिता को देख ख़ुशी से हाथ हिला रहे थे। दूसरी ओर कुछ माता-पिता और बच्चे हार जाने के कारण थोड़े निराश भी थे। कुछ बच्चों को उनके माता-पिता समझा रहे थे कि अगर उन्होंने थोड़ी प्रैक्टिस और करी होती तो नतीजा कुछ और होता। कुल मिलाकर वहाँ बड़ा मिश्रित सा माहौल था।


इन्हीं बच्चों में एक बच्ची वह भी थी जो उपरोक्त दौड़ में एक सेकंड अधिक लग जाने के कारण चौथे नंबर पर आई थी। निराश, हताश और उदास चेहरा और आँखों में आँसू लिए यह बच्ची दौड़ते हुए अपने माता-पिता की ओर आई और एकदम से उनके गले लग गई। पिता ने उसी पल उसे अपनी गोद में उठाया और बोले, ‘बहुत खूब मेरी बच्ची… आज तुम क्या ज़बर्दस्त दौड़ी… इस रेस को जीतने पर तुम्हें ढेर सारी बधाई… चलो इस जीत की ख़ुशी में हम कहीं चलकर तुम्हारी पसंदीदा आइसक्रीम खाते हैं।’


पिता के शब्दों को सुन बच्ची अचंभित थी। वह आश्चर्य मिश्रित स्वर में थोड़ा चौंकते हुए बोली, ‘लेकिन पापा, मेरा नंबर प्रथम तीन स्थान में कहाँ आया?’ पिता मुस्कुराते हुए बोले, ‘आया है बेटा, पहला नंबर आया है तुम्हारा।’ बच्ची अब पूरी तरह उलझन में थी। वह कुछ सोचते हुए बोली, ‘ऐसे कैसे पापा, मैं तो दौड़ में चौथे नंबर पर आई थी।’ पिता ने उसकी बात को नज़रंदाज़ करते हुए कहा, ‘मुझे तो तुम यह बताओ कि तुम्हारे पीछे कितने बच्चे और थे?’ वह उँगलियों पर जोड़ते हुए बोली, ‘शायद छब्बीस बच्चे।’ पिता एकदम खुश और उत्साहित होते हुए बोले, ‘इसका मतलब हुआ तुम उन छब्बीस बच्चों से आगे थी। इसलिए तुम्हारा स्थान इन २७ बच्चों की रेस में प्रथम था। इसीलिए तुम्हें ईनाम में आइसक्रीम मिलेगी।’ बच्ची की दुविधा और परेशानी शायद और बढ़ गई थी। वह थोड़ा सोचते हुए बोली, ‘और मेरे से आगे जो ३ बच्चे आए थे?’ पिता मुस्कुराते हुए बोले, ‘इस बार उनसे तुम्हारी प्रतियोगिता नहीं थी।’ बच्ची ने तुरंत पूछा, ‘क्यों?’ पिता इस बार गंभीर स्वर में बोले, ‘क्योंकि उन्होंने तुमसे अधिक तैयारी की हुई थी। अब तुम भी फिर से बढ़िया तैयारी करना और देखना अगली बार तुम २८ में से प्रथम आओगी और फिर उसके बाद तीसों बच्चों में तुम प्रथम रहोगी।’ बच्ची जो अब खुश और उत्साहित थी, एकदम से बोली, ‘पिताजी, अगली बार तो मैं खूब तेज दौड़कर प्रथम आ जाऊँगी।’ पिता अभी भी गंभीर थे। वे उसी लहजे में बोले, ‘इतनी जल्दबाज़ी क्यों? अभी थोड़ा अपने पैरों को… अपने आपको मज़बूत बनाओ। वैसे भी हमें ख़ुद से आगे निकलना है… ख़ुद से बेहतर बनना है, दूसरों से नहीं।’ यह सुनते ही बेटी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था, वह ख़ुशी से लगभग उछलते हुए बोली, ‘मैं रेस जीती हूँ, इसलिए अब आप मुझे जल्दी से चॉकलेट आइसक्रीम खिलाइए।’

दोस्तों, यह कहानी मैंने आज विशेष रूप से आप सभी को सुनाई है। आज बहुत सारे विद्यालय हमारे बच्चों का वार्षिक परीक्षा परिणाम घोषित करने जा रहे हैं। इस परीक्षा में भी उपरोक्त दौड़ समान ही कोई बच्चा प्रथम स्थान पाएगा, तो कोई दूसरा तीसरा, तो कोई दसवाँ, बीसवाँ या कोई अंतिम। परिणाम पश्चात उस बच्चे से संवाद करते समय हमें याद रखना है कि उसकी प्रतिस्पर्धा किसी और से नहीं बल्कि ख़ुद से थी। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया घर का माहौल बिगाड़ने वाली या फिर बच्चे को नीचा दिखाने वाली नहीं होना चाहिए। ना ही हमें उसकी तुलना किसी और से करनी है। हमें तो बस उसे प्रोत्साहित कर, प्रेरणा देना है कि वह अगले वर्ष और बेहतर परिणाम ला सके। याद रखियेगा, प्रतिस्पर्धा, दूसरों से तुलना करने के लिए नहीं होती, बल्कि वह तो अपने आप को पहचानने के लिए होती है और माता-पिता के रूप में हमने अपने दायित्व को सही तरीक़े से निभाया या नहीं इसका पता सिर्फ़ इस बात को देख कर लगाया जायेगा कि बच्चों को बड़ा करते समय हम उन्हें अच्छा इंसान बनाने के साथ-साथ उनकी क्षमताओं के अनुरूप, उन्हें खुश रखते हुए निखार पाए या नहीं। अर्थात् हमने उन्हें उनके लक्ष्य तक पहुँचने में सही मदद करी या नहीं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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