प्रेम, करुणा और सेवा के भाव से करें कार्य…
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 14, 2025
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Aug 14, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज शुरुआत हम प्राचीन काल के एक प्रसंग से करते हैं जिसमें जीवन को बेहतर बनाने वाली एक गहरी शिक्षा छिपी है। एक शिवभक्त राजा को पूजन के दौरान अचानक विचार आया कि सोमवार के दिन वह अपने आराध्य भगवान शिव का दुग्धाभिषेक कुछ इस तरह करे जिससे पूरा शिवलिंग दूध के अंदर समा जाये। शिवलिंग की जलहरी का हौद काफी चौड़ा और गहरा था, इसलिए राजा ने पूरे राज्य में ऐलान करवा दिया कि सोमवार को सभी लोग पूरा दूध पूजन के लिए मंदिर में देंगे, ताकि भगवान शिव के हौद को दूध से लबालब भरा जा सके। साथ ही उन्होंने यह भी आदेश दिया कि जो इस आज्ञा का अनुपालन नहीं करेगा, उसे कठोर दंड मिलेगा।
नगरवासियों ने भय वश अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाया। उस दिन पूरे राज्य का दूध मन्दिर में अर्पित हुआ, फिर भी अंत में हौद खाली रह गया। तभी अचानक एक बुढ़िया कहीं से लुटिया भर दूध लेकर आई और उसे प्रेम और भक्ति के साथ भगवान को अर्पण किया। उसके ऐसा करते ही पूरा हौद भर गया।
यह देख राजा सहित सभी हैरान थ क्योंकि वे मान रहे थे कि ज़्यादा दूध की मात्रा ही भगवान को प्रसन्न करेगी, लेकिन भगवान ने दिखाया कि भाव ही सबसे बड़ा अर्पण है। अंत में राजा ने इस विषय में राज्य के सबसे ज्ञानी पंडित से इसका कारण पूछा तो उसने बताया, ‘नगरवासियों ने भय और बलपूर्वक दूध दिया था, इसलिए उसमें न प्रेम था, न आशीर्वाद। अर्थात् वह केवल त्याग था, मन की भेंट नहीं। इसके विपरीत, बुढ़िया ने घर के सभी बच्चों को तृप्त करके, बचा हुआ दूध प्रेम से अर्पित किया था। इसलिए उस दूध में करुणा, सेवा और संतोष का भाव था, जिसे भगवान ने स्वीकार किया।
दोस्तों, दिल किसी का भी क्यों ना हो उसे भय से नहीं, प्रेम से कर्म करके ही जीता जा सकता है। जी हाँ, जीवन में जब हम किसी कार्य को केवल डर, दबाव या दिखावे के लिए करते हैं, तो उसमें आत्मा नहीं होती। इसलिए उसका प्रभाव खोखला और अधूरा होता है। परंतु जब हम वही कार्य प्रेम, निष्ठा और पूरी स्वेच्छा से करते हैं, तो उसका असर अद्भुत होता है। चाहे वह काम छोटा हो या बड़ा, उसकी ऊर्जा सबको प्रभावित करती है।
याद रखियेगा दोस्तों, सच्ची भक्ति और सच्चा आदेश भय से नहीं, बल्कि प्रेरणा और संवेदना से होता है। जब हम दूसरों को सहयोग के लिए प्रेरित करते हैं और उनकी परिस्थितियों को समझते हैं, तब उनका योगदान हृदय से आता है। भक्ति भी ऐसी ही है अर्थात् भक्ति केवल पूजा-पाठ का कर्मकांड नहीं, बल्कि मन की गहराई से निकला हुआ भाव है।
यह कहानी जीवन को बेहतर बनाने के तीन महत्वपूर्ण सूत्र सिखाती है:
1) जीवन में भावना को प्राथमिकता दें, संसाधनों की मात्रा को नहीं क्योंकि अच्छे रिश्तों में भावना की गुणवत्ता मायने रखती है।
2) किसी को कष्ट देकर ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता और इसी तरह किसी का अधिकार छीनकर भक्ति नहीं हो सकती।
3) नेतृत्व में संवेदनशीलता आवश्यक है इसलिए कोई भी आदेश देने से पहले सामने वाले की परिस्थिति और जरूरतों को समझना चाहिए।
अंत में इतना ही कहूँगा कि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बाहरी वैभव की नहीं, भीतरी सच्चाई और निःस्वार्थ भावना की आवश्यकता होती है। जब हम प्रेम, करुणा और सेवा के भाव से कार्य करते हैं, तो परिणाम स्वतः ही श्रेष्ठ बनता है। दोस्तों, जीवन के हर क्षेत्र में, फिर चाहे वह परिवार हो, कार्यस्थल हो या समाज हो, यही सिद्धांत हमें सच्ची सफलता और संतोष प्रदान करता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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