• Nirmal Bhatnagar

बच्चों को आदेश देकर नहीं, उदाहरण पेश कर सिखाएँ !!!

June 7, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत हम एक सच्ची घटना से करते हैं जो मेरे साथ आज से कुछ वर्ष पूर्व घटी थी। बस मैंने परिवार की गोपनीयता बरकरार रखने के लिए बच्चे का नाम बदल दिया है।


7 वर्षीय राजू आज बहुत खुश नज़र आ रहा था और हो भी क्यूँ ना? आज उसके सामने उसके पसंद के सारे पकवान जैसे बेसन का लड्डू, सेव-नमकीन, बिस्कुट, समोसा आदि सब कुछ सजे हुए रखे थे, मेहमान जो आए हुए थे। राजू के लिए दिक़्क़त बस एक ही थी, पिताजी की आँख उसे लगातार घूरे जा रही थी और इशारों में मानों कह रही थी, ‘मेहमान के सामने इसमें से कुछ उठा मत लेना अन्यथा तुम्हें पता ही है, मैं तुम्हारा क्या हाल करूँगा।’ इसी वजह से दुविधा में फँसा राजू नाश्ते के आस-पास ही मंडरा रहा था और कभी पैर सोफ़े पर रखकर ऊपर चढ़ना या फिर किसी भी तरीक़े से सबका ध्यान आकर्षित करना और याद दिलाना, ‘मैं भी तो हूँ! मुझे भी यह सब पसंद है।’ पर बड़े तो बड़े ठहरे उनके लिए बाल इच्छा से ज़्यादा ज़रूरी बच्चे के संस्कारों और उसको क्या-क्या आता है, उसका प्रदर्शन करना था। इसीलिए वे उसे कभी प्यार से तो कभी डराकर सब्र करने का इशारा कर रहे थे। मानो कह रहे हों, ‘मेहमान को जाने दो उसके बाद यह सब-कुछ तुम्हारा ही तो है।’


दूसरी और बच्चे का डर भी जायज़ था। मुझे लगता है वह सोच रहा होगा, ‘इतने सारे बड़े लोगों के बीच एक छोटी सी प्लेट में थोड़े से लड्डू ही तो रखे है। अगर सब ने एक-एक भी ले लिया तो मेरा नम्बर आने से पहले ही सब खत्म हो जाएँगे। फिर मेरा क्या होगा?’ शायद इसी विचार के बाद, बच्चे ने धीरे से प्लेट में से एक लड्डू उठाया और अंदर भाग गया। राजू को ऐसा करते देख पिता ने हमारे सामने खिसियानी हंसी फैलायी और राजू के पीछे-पीछे कमरे में अंदर चले गए।


कुछ ही पलों बाद राजू के रोने की आवाज़ आने लगी। मैं समझ गया कि राजू को अपनी गलती का ‘प्रसाद’ मिल गया है। मैं मन ही मन सोचने लगा, ‘इस थप्पड़ का असली हक़दार कौन है?’ हालाँकि इसमें ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं थी। कुछ देर बाद जब ‘प्रसाद’ के असली हक़दार, राजू के पिता बाहर आए तो मैंने उनसे कहा, ‘सर, हम राजू की इस हरकत को बचपना मान, नज़रंदाज़ भी तो कर सकते थे।’ तो वे बोले, ‘सर, बच्चों को सिखाना हमारी ज़िम्मेदारी है, इसीलिए मैंने उसकी अशिष्टता पर प्रतिक्रिया दी। अगर हम उसे उसकी गलती पर टोकेंगे नहीं तो वह सीखेगा कैसे?’ हालाँकि मैं उनके तर्क से सहमत नहीं था फिर भी मैंने उस वक्त उनकी बात को नज़र अन्दाज़ करने का निर्णय लिया।


अक्सर दोस्तों, हम में से ज़्यादातर लोग राजू के पिता की ही तरह बच्चों को हर बात पर टोक-टोक कर सिखाने का प्रयास करते हैं, जो मेरी नज़र में बिलकुल भी सही नहीं है। मेरा मानना है बच्चा रोकने, टोकने या ठोकने से ज़्यादा अपने सामने घटती हुई घटनाओं को देखकर सीखता है। अगर मेरी बात से सहमत नहीं हों तो एक बार याद कर देखिए, जब आपने कुछ माह के बच्चे के सामने बार-बार ताली बजाई थी तो क्या हुआ था? या जब आपने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उसके सामने बार-बार चुटकी बजाई थी तब उसकी प्रतिक्रिया क्या थी? निश्चित तौर पर आप कहेंगे उसने ताली या चुटकी बजाने का प्रयास किया था।


याद रखिएगा दोस्तों, बच्चे अच्छी-अच्छी बातें बोलकर सिखाने से कहीं ज़्यादा अपने सामने घटने वाली घटनाओं से सीखते हैं। उदाहरण के लिए जब वह विद्यालय से आकर आपको जोर से आवाज़ देकर कहता है, ‘मम्मी पानी!!!’ तो आप कहते हैं, ‘अब तुम बड़े हो गए हो, पानी भी अपने आप नहीं ले सकते हो क्या?’ ठीक इसी तरह जब वह अपना बसता, यूनिफ़ॉर्म, जूते आदि कहीं भी फेंकता है तो भी आप अपनी ‘बड़े हो गए हो!’ वाली बात दोहरा देते हो। लेकिन जब यही बच्चा कोई चीज़ इलेक्ट्रिक सॉकेट में लगाने जाता है तो आप तुरंत अपनी बात बदलते हुए कहते हो, ‘अभी तुम छोटे हो बिजली से दूर रहो।’ ठीक इसी तरह उसके लिए झूठ बोलना ग़लत है लेकिन आप उसके सामने फ़ोन पर दिन भर में कई बार झूठ बोल सकते हैं।


चलिए इस बात को राजू वाली घटना से ही जोड़कर समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए राजू के सामने उसके पिता रोज़ किसी भी चीज़ को खुद खाने के पहले दूसरों को अपने हाथ से देते तो राजू क्या सीखता? निश्चित तौर पर पहले दूसरों को सर्व कर खाना।


असल में दोस्तों, बच्चे बहुत अधिक जिज्ञासु और नई चीजों को सीखने के लिए उत्सुक होते हैं और इसीलिए वे अपने सामने घटने वाली हर घटना से कुछ ना कुछ सीखने का प्रयास करते हैं। दिक़्क़त तो सिर्फ़ तब आती है जब आप उनकी इस सामान्य सीखने की प्रक्रिया में बाधक बन जाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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