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बच्चों को दें सम्मान और सराहना...

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • May 25
  • 3 min read

May 25, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, भारतीय परिवारों की सबसे सुंदर बात यह है कि यहाँ माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा देते हैं। वे अपने सपनों को छोटा कर लेते हैं, ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। वे अपनी इच्छाएँ टाल देते हैं, ताकि बच्चों को अवसर मिल सकें। लेकिन इसी प्रेम के बीच कई बार अनजाने में एक ऐसी गलती हो जाती है, जो बच्चों के आत्मविश्वास को धीरे-धीरे भीतर से कमजोर कर देती है। हम माता-पिता के रूप में अपने त्याग के एवज में बच्चों से अपेक्षा रखना शुरू कर देते हैं और इन्हीं अपेक्षाओं की वजह से उनकी कोशिश को नजरंदाज कर जाते हैं याने उनके द्वारा किए गए प्रयास की सराहना करना भूल जाते हैं। उदाहरण के लिए जब बच्चा अपनी क्षमता के अनुसार कोई कार्य करता है तो हम उससे कहते हैं, “ये तो तुम्हारा ही काम था…” या “तुम और बेहतर कर सकते थे…” या फिर “तुम्हारी उम्र में तो हम…” अथवा “शर्मा जी के बेटे को देखो…”, आदि और धीरे-धीरे इन बातों से बच्चा सीख जाता है कि उसे प्रेम और सराहना पाने के लिए अच्छा नहीं, सबसे अच्छा होना पड़ेगा। इस वजह से वो परीक्षा में अंक तो लाने लगता है, लेकिन जीवन के आनंद को खो देता है। वह उपलब्धियाँ तो हासिल करने लगता है, लेकिन जीवन के मज़े लेना और खुद के साथ पर्याप्त समय बिताना भूल जाता है।


दोस्तों, बच्चों को इस जीवन को पूर्णता के साथ जीने के लिए हर समय सलाह की नहीं बल्कि इस एहसास की ज़रूरत होती है कि कोई उसकी कोशिश, उसके प्रयास को देख रहा है; उसकी मेहनत को पहचान रहा है। कल्पना कीजिए एक बच्चा साल भर मेहनत करने के बाद परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक लेकर आता है। अब हमारे पास दो विकल्प हैं, पहला, उससे पूछा जाए, “बचे हुए 10 नंबर कहाँ कट गए?” और दूसरा, उससे कहा जाए, “बहुत खूब, मैं जानता हूँ तुमने बहुत मेहनत की थी। अब बताओ, अगली बार और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए क्या करोगे?” सुनने में आपको दोनों वाक्य सामान्य लग सकते हैं लेकिन यकीन मानियेगा दोनों का असर बच्चों पर बिल्कुल अलग होता है। पहला वाक्य सुनने वाला बच्चा जहाँ तुलना सीखता है वहीं दूसरा बच्चा विकास सीखता है। याद रखियेगा दोस्तों, बच्चों का आत्मविश्वास बड़ी उपलब्धियों से नहीं बनता। वह रोज़ के छोटे अनुभवों से बनता है। जब पिता कहे, “मुझे तुम पर विश्वास है।” और माँ कहे, “परिणाम जैसा भी हो, हम तुम्हारे साथ हैं।” याने जब घर ऐसी जगह बन जाए जहाँ बच्चा असफल होकर भी सुरक्षित महसूस करे। तब बच्चे जीवन में सिर्फ सफल नहीं बल्कि दमदार व्यक्तित्व के मालिक बनते हैं।


एक बात और हमेशा याद रखिएगा, बच्चे हमारी कही हुई बातें कम याद रखते हैं, लेकिन हमारे साथ होने का एहसास बहुत लंबे समय तक याद रखते हैं। उन्हें यह याद नहीं रहेगा कि आपने उन्हें कितनी बार ट्यूशन भेजा था। लेकिन उन्हें यह याद रहेगा कि हारने पर आपने उन्हें गले लगाया था या नहीं। उन्हें यह याद नहीं रहेगा कि आपने कितने खिलौने खरीदे। लेकिन उन्हें यह याद रहेगा कि आपने उनकी बात ध्यान से सुनी थी या नहीं।


दोस्तों, यहाँ एक बात और समझना आवश्यक है, सराहना का मतलब बच्चों की हर बात पर ताली बजाना नहीं है। सराहना का अर्थ है - उनकी मेहनत देखना, उनकी प्रगति पहचानना, और उन्हें यह विश्वास दिलाना कि परिणाम ही सब कुछ नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमें उसे सिखाना है कि मंजिल पर पहुँचने जितना ही मजा हमें रास्ते का भी लेना है। इसलिए, अगर बच्चा गिरता है, तो उसे उठना सिखाइए। अगर बच्चा हारता है, तो उसे हार से सीखना सिखाइए। अगर बच्चा डरता है, तो उसे भरोसा दीजिए। कुल मिलाकर उसे सकारात्मकता के साथ जीवन को स्वीकारना सिखाइये।


दोस्तों, याद रखियेगा भारत को सिर्फ टॉपर नहीं बल्कि ऐसे बच्चे चाहिए जो संवेदनशील हों, आत्मविश्वासी हों, खुश हों और जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकें। इसलिए प्रतिदिन बच्चे से पूछिए, “आज तुमने क्या सीखा?” और साथ ही उससे एक वाक्य जरूर कहिए, “मुझे सिर्फ तुम्हारी सफलता पर नहीं बल्कि तुम्हारी कोशिश पर भी गर्व है।” यकीन मानिएगा, जिस बच्चे को घर से सम्मान और सराहना मिलती है, वह दुनिया से लड़ने नहीं, दुनिया बनाने निकलता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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