• Nirmal Bhatnagar

बढ़ना हो आगे तो सीखें हर हाल में…

Oct 22, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, मेरी नज़र में हार या जीत दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जीत जहाँ आपको मनचाहा परिणाम देती है, वहीं हार आपको अपनी कमियों को पहचानकर, उन्हें दूर करने और साथ ही पहले से और ज़्यादा बेहतर बनने का मौक़ा देती है। लेकिन अक्सर मैंने देखा है लोग हार से टूट जाते हैं या खुद को तनाव, दबाव या डिप्रेशन का शिकार बना लेते हैं।


हाल ही में मेरी मुलाक़ात ऐसे ही एक व्यक्ति से हुई जो हार की वजह से उपरोक्त नकारात्मक भावों का शिकार हो गया था और अपनी सारी ख़ुशी, शांति व सुख-चैन को लूटा चुका था। पूरी चर्चा के दौरान मैंने महसूस किया कि उसकी परेशानी की मुख्य वजह उसका अपना दृष्टिकोण है। ऐसे सभी लोगों को मैं सामान्यतः एक ही सलाह देता हूँ, ‘हमेशा याद रखो, आपके हाथ में सिर्फ़ कर्म करना है, परिणाम निकालना नहीं।’ परिणाम देना तो सिर्फ़ और सिर्फ़ ईश्वर के हाथ में होता है। कई बार जब आपका लक्ष्य या आपका सोचा हुआ परिणाम ईश्वरीय योजना से मेल खाता है तो आप खुद को विजेता मान लेते हैं और जब चीज़ें इसके विपरीत होती है अर्थात् कर्मों का परिणाम आपकी सोच के अनुसार नहीं अपितु ईश्वर की योजना के अनुसार मिलता है तो आप खुद को हारा हुआ मान, नकारात्मक भावों का शिकार हो जाते हैं।


दोस्तों, अगर आप अपनी योजना या अपेक्षा के अनुसार परिणाम ना मिलने की वजह से आए नकारात्मक विचारों, भावों आदि से बचना चाहते हैं तो सबसे पहले खुद को याद दिलाएँ कि हम उस परमपिता परमेश्वर की सबसे अनूठी और शक्तिशाली कृति है। वे हमारे पिता समान है और कोई भी पिता अपने बच्चे का बुरा नहीं चाह सकता। इस दुनिया में हमें वह प्राप्त नहीं होता जो हमें अच्छा लगता है, बल्कि हमें वह मिलता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। यह विचार आपको अपनी सोच को बदलने का मौक़ा देगा।


इस बदले हुए मूड या विचार के साथ उसी पल खुद से एक प्रश्न पूछिएगा, ‘आशा के विपरीत परिणाम देकर ईश्वर मुझे क्या सिखाना चाहता है?’ जी हाँ साथियों, अपनी हर हार, हर पराजय से कुछ ना कुछ सीखना उससे नए अनुभव प्राप्त करना आपको पहले से बेहतर बनाता है। इसके बाद आप नए अनुभव और नए ज्ञान से फिर से खुद को खड़ा कर स्थापित कर सकते हैं। याद रखिएगा, ज्ञान, कौशल और अनुभव आपको पराजित मनोदशा से छुटकारा दिलाकर, फिर से लड़ने की ऊर्जा एवं शक्ति देते हैं। जीवन में सफलता पाने का सबसे बड़ा मंत्र यही है।


आप सोच रहे होंगे सफलता का सबसे बड़ा मंत्र यह कैसे हो सकता है? तो चलिए इसे मैं आपको थोड़ा विस्तार से समझाने का प्रयास करता हूँ। नकारात्मक परिणामों से जब आप सीख लेने का प्रयास करते है तो आप सबसे पहले अपनी सोच और नज़रिया बदलते हैं, यही बदली हुई सोच और नज़रिया आपके मनोबल को मज़बूत बनाता है और इंसान अपने मनोबल से विपरीत से विपरीत परिस्थितियों और चुनौतियों से निपटकर, जीतने का साहस रखता है। इसीलिए हर हाल में सफलता पाने के लिए मनोबल मनुष्य की पहली आवश्यकता है।


दूसरी बात, उच्च मनोबल आपको साहसी बनाता है और साहस, आत्मबल को मज़बूत बनाता है और आत्मबल मनुष्य को जुझारू बनाता है अर्थात् आत्मबल के धनी व्यक्ति को किसी कार्य में असफलता तो मिल सकती है, लेकिन वह खुद कभी असफल नहीं होता है। वैसे इसी स्थिति को हम एक और नज़रिए से देख सकते हैं, जब आप हार से भी सीख लेना शुरू कर देते हैं तो कुल मिला कर देखा जाए तो आप कुछ खोते नहीं हैं और जब इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता तो वह निश्चिंत होकर अपनी पूरी क्षमता से पूरे संयम और साहस के साथ कर्म करता है या दूसरे शब्दों में कहूँ तो आगे बढ़ने या सफल होने का प्रयास करता है। जी हाँ साथियों, बदली सोच, सकारात्मक नज़रिया, उच्च मनोबल, संयम, साहस और आत्मबल का होना ही तो सफलता को सुनिश्चित करता है उसे हमेशा आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देकर उत्साहित रखता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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