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बाहरी दुनिया से पहले जीतें ख़ुद के मन को !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jul 28
  • 3 min read

July 28, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, डेटा आधारित इंटरनेट के इस युग में एक क्लिक पर दुनिया भर का ज्ञान हमारी हथेली पर आ जाता है। इसकी गति इतनी तेज है कि माना जा रहा है 20000 वर्षों में इंसान ने जितनी रिसर्च की है वह कंप्यूटर एक सप्ताह में कर सकता है। लेकिन जितनी गति से जानकारी याने डेटा बढ़ा है, उतनी ही तेज़ी से इंसान में ‘संयम’ कम हो गया है। आज हम हर बात तुरंत जान लेना चाहते हैं, हर रहस्य खोल देना चाहते हैं और हर जिज्ञासा को उसी क्षण शांत कर लेना चाहते हैं। लेकिन क्या यह सब कर लेना ही बुद्धिमानी है? चलिए एक सूफ़ी परंपरा की कथा से इसे समझने का प्रयास करते है-


एक प्रसिद्ध संत ने अपने प्रिय शिष्य को आगे की आध्यात्मिक शिक्षा के लिए दूसरे महात्मा के पास भेजा। मन में विशेष मंत्र, कोई गूढ़ ज्ञान या किसी अद्भुत साधना सीखने की आस लिए शिष्य उन महात्मा के पास पहुँचा। लेकिन उसकी आशा के विपरीत महात्मा ने उसे बिना कोई उपदेश दिए, एक छोटा सा संदूक देते हुए कहा, “पहले इसे अपने गुरु और मेरे मित्र तक सुरक्षित पहुँचा कर वापस आओ, तब मैं तुम्हें दीक्षा दूँगा।”


शिष्य कुछ समझ तो नहीं पाया पर गुरु को प्रणाम कर छोटे संदूक को लिए वापस निकल पड़ा। रास्ता लंबा था और मन बेचैन था। उसके भीतर बार-बार ये प्रश्न उठ रहा था कि आख़िर इस संदूक में ऐसा क्या है, जिसे इतनी सावधानी से भेजा जा रहा है? उसका मन बार-बार उससे कह रहा था, ‘खोल कर देख ले..’ लेकिन वह अपने मन को समझा कर रोकता रहा। लेकिन अंततः जीत मन की हुई और उसने संदूक को खोल लिया। संदूक खुलते ही उसमें से एक छोटा-सा चूहा बाहर निकला और देखते ही देखते गायब हो गया। यह देख शिष्य घबरा गया। वह खाली संदूक लेकर ही महात्मा के पास पहुँचा और क्षमा माँगते हुए अपनी भूल स्वीकार ली। महात्मा एकदम शांत स्वर में बोले, “वत्स! जो व्यक्ति संयम के साथ एक छोटे से चूहे को सुरक्षित नहीं रख सकता, उसे सत्य का ख़ज़ाना कैसे सौंपा जाये?”


दोस्तों, गुरु का कहा यह वाक्य केवल उस शिष्य के लिए नहीं, बल्कि हम सबके लिए भी उतना ही सही है। जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं, भीतर चलती है। हमारा मन हर पल हमें उकसाता है, ‘यह भी देख लो’, ‘यह भी जान लो’, ‘इसका भी उत्तर खोज लो’, आदि, और हम बिना सोचे-समझे उसके पीछे चल पड़ते हैं। इस आधुनिक युग में सोशल मीडिया पर किसी की निजी ज़िंदगी में झाँकने की उत्सुकता, हर अफ़वाह को तुरंत आगे भेज देने की जल्दबाज़ी, बिना पूरी बात जाने प्रतिक्रिया देना, या मोबाइल पर आए हर नोटिफिकेशन को उसी क्षण खोलने के लिए बेचैन रहना आदि सब उसी असंयम के आधुनिक रूप हैं।


दोस्तों, इंसान तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता है, जब तक वह अपने मन का स्वामी ना बन जाए। याद रखिएगा, जो इंसान अपने मन को नियंत्रित नहीं कर सकता, वह परिस्थितियों का नहीं, अपनी इच्छाओं का कैदी बन जाता है। इससे बचना चाहते हो तो ‘संयम’ धरना सीखो और याद रखो कि संयम का अर्थ इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि यह तय करना सीखना है कि कौन-सी इच्छा का अनुसरण करना है और किसे मुस्कुराकर जाने देना है। यह भी याद रखियेगा, ज्ञान केवल बुद्धि से नहीं मिलता, पात्रता से मिलता है। और पात्रता का पहला प्रमाण है, विश्वास के योग्य होना। जिस व्यक्ति को कोई छोटी ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती, उसे बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे दी जाएगी? जो छोटी गोपनीयता नहीं निभा सकता, वह बड़े विश्वास का अधिकारी कैसे बनेगा?


दोस्तों, अगर आपको जीवन वह नहीं दे रहा, जिसकी आप प्रतीक्षा कर रहे हैं तो ‘मुझे अवसर क्यों नहीं मिला?’ पर सोचने के स्थान पर ख़ुद से यह पूछिए, “क्या मैंने स्वयं को उस अवसर के योग्य बनाया है?” क्योंकि सफलता से पहले पात्रता आती है, और पात्रता से पहले संयम। जो अपने मन की हर जिज्ञासा का दास बन जाता है, वह ज्ञान के द्वार तक पहुँचकर भी भीतर प्रवेश नहीं कर पाता। इसलिए ही कहा गया है, “सच्ची शिक्षा पुस्तकों से नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय पाने से शुरू होती है।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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