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  • Nirmal Bhatnagar

बाहर नहीं, अपने अंदर खोजें समाधान…

Dec 15, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

बात कई साल पुरानी है, गाँव से शिक्षा पूरी कर शहर में जा बसे दोस्तों ने अपनी पुरानी यादों को ताज़ा करने के उद्देश्य से एक बार फिर गाँव में मिलने का निर्णय लिया। तय दिन, तय समय पर सभी दोस्त तय स्थान याने गाँव में रहने वाले अपने एक मित्र के यहाँ पहुँच गए। शुरुआती मेल-मिलाप और बातचीत के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनकी पुरानी टोली का एक साथी अभी तक वहाँ नहीं पहुँचा है। सभी मित्रों ने गाँव में रहने वाले अपने मित्र से इस विषय में पूछा तो पता चला कि वह दोस्त तो अब फ़क़ीर बन गया है और हर पल अपनी मौज मस्ती में ही रहता है।


इतना पता चलते ही सभी दोस्त उससे मिलने गए और किसी तरह उसे राज़ी करके अपने साथ खाना खाने के लिए ले आए। सभी दोस्त हालाँकि कैरियर में सफल थे, उन्होंने अपने जीवन में काफ़ी कुछ अचीव करा था। वे सभी सक्षम और सुखी भी थे लेकिन कुछ ना होने के बाद भी फ़क़ीर के चेहरे पर जो सुकून और शांति थी, उसे वे मिस कर रहे थे। सभी दोस्तों ने तीसरी मंज़िल की छत पर भोजन के समय पर फ़क़ीर से इस विषय में चर्चा करने का निर्णय लिया।


मौज-मस्ती और बातचीत के बाद सभी दोस्त तीसरी मंज़िल की छत पर भोजन करने के लिए पहुंचे। वे सभी अपने तय स्थान पर बैठे ही थे कि तेज़ भूकम्प की वजह से पूरी बिल्डिंग काँपनें लगी। सभी 30-35 मित्र काँपती बिल्डिंग को देख डर गए, वे सभी घबराकर एक साथ छत से नीचे जाने वाली सीढ़ियों की ओर भागे। लेकिन उस पल उस तीन मंज़िला भवन में बहुत सारे लोग मौजूद थे इसलिए अत्यधिक भीड़ हो जाने के कारण सभी दोस्त सीढ़ी पर ही अटक गए।


सभी दोस्तों ने डर और घबराहट के साथ एक-दूसरे की ओर देखा तो उन्हें एहसास हुआ फ़क़ीर अभी भी छत पर उसी स्थान पर आँखें बंद किए बैठा है जहाँ उसे भोजन के लिए बैठाया था। इस मुश्किल वक्त में भी उसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी कुछ देर पहले, जब सब कुछ सामान्य था, तब थी। भूकम्प से काँपती धरती और मकान के बीच फ़क़ीर को शांति से बैठा देख ऐसा लग रहा था मानो कुछ हुआ ही नहीं हो।


सभी दोस्त उसे इस तरह बैठा देख ठिठक कर रुक गए। कुछ पलों पश्चात जब सब कुछ सामान्य हुआ तो सभी दोस्त उस फ़क़ीर के पास लौट कर आए और उससे बोले, ‘डोलती धरती, काँपते मकान को देख जब सब लोग यहाँ से भागे थे आप तब भी अपनी उसी मौज-मस्ती के साथ आँखें बंद किए, पूर्व के समान ही पूरी तरह शांत चित्त बैठे हुए थे। क्या आपको डर नहीं लग रहा था? क्या आप अपनी जान बचाने के लिए बेचैन नहीं थे? क्या आपको अपनी जान की परवाह नहीं थी?’ दोस्तों के मुख से एक साथ कई प्रश्न सुन फ़क़ीर ने आँख खोलते हुए पहले ईश्वर को धन्यवाद दिया, फिर कहा, ‘विपरीत स्थिति आने पर तुम भी भागे, मैं भी भागा। बस अंतर इतना सा था कि तुम बाहर भागे और मैं अंदर। चूँकि तुम बाहर भागे इसलिए तुम्हारा भागना दिखा, लेकिन मेरी दौड़ अपने अंदर बैठे ईश्वर के उस अंश की ओर थी जिसके सामने दुनिया की समस्याओं की कोई बिसात नहीं है।’


दोस्तों, अब अगर इसी कहानी को दूसरी नज़र से देखा जाए तो हमारे जीवन की सारी उथल-पुथल, चिन्ताएँ, दुविधाएँ सिर्फ़ इसी कारण हैं कि हमारे सारे निर्णय बाहर घटने वाली घटनाओं और उपलब्ध समाधानों पर आधारित होते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह सामान्य इंसान का बाहरी चकाचौंध को देख मुख्य उद्देश्य से भटक जाना होता है। जब आपकी सोच, निर्णय और उठाए गए कदम बाहरी दुनिया की चकाचौंध पर आधारित होते हैं तो वे बाहरी दुनिया में ही प्रासंगिक नज़र आते हैं। उनपर कार्य करना, उन विचारों पर अमल करना हमारे भीतर द्वन्द पैदा करता है। उदाहरण के लिए दूसरों को देख, अपनी क्षमताओं से आगे जा, भौतिक संसाधनों की बराबरी करना; सामाजिक बदलाव के आधार पर अपने कल्चर को छोड़, आधुनिक दिखने का प्रयास करना; अपने अंदर झांकने के स्थान पर सुख, चैन, शांति को बाहरी दुनिया अथवा संसाधनों में तलाशना, आदि।


याद रखिएगा दोस्तों, इस दुनिया में सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी और मौज से होता है, फिर कहाँ भागना? ईश्वर कहीं और नहीं हमारे अंदर ही मौजूद है, इसीलिए तो हमें ‘अहम् ब्रह्मासमी’ अर्थात् ‘मैं ही ब्रह्म हूँ!’ सिखाया जाता है, तो आइए दोस्तों, आज से हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए बाहर की नहीं, अपने अंदर की यात्रा प्रारम्भ करते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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