भाग्य से ज्यादा पाना हो, तो देना शुरू करें…
- Nirmal Bhatnagar

- Sep 14, 2024
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Sep 14, 2024
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, कभी-कभी आप ना चाहते हुए भी ऐसी चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं, जो अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपको ऐसे निष्कर्ष तक पहुँचा देती है, जिसकी आपने कभी परिकल्पना भी नहीं की होती है और अंत में आप सोचते हैं कि ‘अच्छा हुआ मैं इस चर्चा का हिस्सा बन गया, अन्यथा मैं जीवन को बेहतर बनाने के एक ज़बरदस्त सूत्र को सीखने से वंचित रह जाता।’ ऐसा ही कुछ अनुभव मुझे कल रात्रि को उस वक़्त हुआ, जब मैं अपने किसी परिचित के आवश्यक कार्य के कारण अपने एक मित्र के यहाँ गया।
शुरुआती सामान्य बातचीत के बाद जब मैंने मित्र को अपने परिचित से मिलवाया और उसके कार्य के विषय में बताया। तब मित्र ने कहा, ‘सर, आप बड़े भाग्यशाली थे जो यह कार्य मेरे पास आया अन्यथा इस कार्य को पूर्ण करवाने में आपको कई दिन लग जाते।’ मित्र की बात सुन मैं मुस्कुरा कर रह गया, जिसे देख मित्र के पिताजी बोले, ‘लगता है, निर्मल तुमसे इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता है।’ मैं कुछ प्रतिक्रिया देता उसके पहले ही मित्र बोला, ‘इसके सहमत होने या ना होने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? जो सही है, वह सही है। हमारी संस्कृति तक में भाग्य को महत्वपूर्ण बताया गया है। रोज़ यह हमको कहानी सुनाता है ना, चलो आज मैं इसको एक कहानी सुना कर समझाता हूँ कि भाग्य से बड़ा कुछ नहीं होता है।’ इतना कहकर मित्र ने एक कहानी सुनाई जो इस प्रकार थी-
एक बार एक राजा को पता चला कि एक बहुत पहुँचे हुए संत का उनके राज्य में आना हुआ है। राजा तुरत उनसे मिलने के लिये भागे-भागे उनके पास पहुँचे। मुलाक़ात के दौरान संत के ज्योतिष ज्ञान को देख राजा अचंभित रह गये। इसी वजह से वहाँ से लौटते वक़्त वे संत को सौ स्वर्ण मुद्राएँ भेंट स्वरूप देने लगे, जिसे संत ने बड़ी विनम्रता के साथ यह कहते हुए लौटा दिया कि ‘राजन, मैं सिर्फ़ अपने भाग्य का ही खाता हूँ। मेरा मानना है कि राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते।’ संत की बात सुन राजा हैरान थे। उन्होंने अपनी दुविधा ज़ाहिर करते हुए संत से पूछा, ‘इससे क्या तात्पर्य है आपका गुरुदेव?’ संत बोले, ‘राजन, कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है। यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे तो नहीं बना सकता क्योंकि बिना भाग्य के आई दौलत हाथ से निकल जाया करती है।’
राजा संत की बात से सहमत नहीं थे इसलिए उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘गुरुदेव, मैं कुछ लोगों को आपसे मिलवाता हूँ आप उनका हाथ देखकर बताइए कि वह अमीर बन पायेगा या नहीं। जो आपके अनुसार अमीर नहीं बन पायेगा, उसे मैं अमीर बना कर दिखा दूँगा।’ संत ने बड़ी शालीनता के साथ राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। राजा ने तुरन्त मंत्री को बुलवाया और उसके कान में कुछ कहा। मंत्री उसी पल वहाँ से गए और कुछ ही मिनिटों में राजसी लिबास पहने एक शख़्स को वहाँ ले आये। संत ने उस शख़्स का हाथ देख कर कहा, ‘राजन, इस व्यक्ति का जन्म ग़रीब परिवार में हुआ है और यह ज़िंदगी भर ग़रीब ही रहेगा। अभी तक यह जिस तरह प्रकृति के बीच एक कुटिया में रहा है, यह आगे भी वैसे ही रहेगा।’
संत की बात सुन राजा हैरत के साथ बोले, ‘आप सही कह रहे हैं। यह महल के बागों की देखभाल करने वाला ग़रीब माली है, जो बागों के बीच में ही कुटिया बनाकर रहता है। परंतु गुरुदेव मैं इसे एक वर्ष के भीतर अमीर बना दूंगा।’ राजा की बात सुन संत मुस्कुराते हुए एक वर्ष बाद मिलने का कहकर वहाँ से चले गये। उनके जाते ही राजा ने माली को अपने पास बुलाया और उसे एक पत्र देते हुए कहा, ‘पास ही के राज्य का राजा मेरा बहुत अच्छा मित्र है, उसे इस पत्र को दे आओ।’ राजा का आदेश सुनते ही माली का चेहरा एकदम उतर गया। असल में वह आलस के कारण कहीं जाना नहीं चाहता था। पर राजा के आदेश को टालना भी संभव नहीं था। इसलिए उसने राजा के हाथ से पत्र लिया और पड़ोस के राज्य की ओर चल दिया। अभी वह कुछ दूर ही चला था कि उसे उसका एक दोस्त मिल गया जो उसी रास्ते से कहीं जा रहा था। आपसी बातचीत में माली को पता चला कि वह पास ही के राज्य जा रहा है, तो उसने उसे राजा का पत्र देते हुए कहा, ‘मित्र कृपा कर यह पत्र उस राज्य के राजा को दे देना। तुम्हारे साथ मेरा काम भी हो जाएगा और मुझे अनावश्यक यात्रा भी नहीं करना पड़ेगी।’ मित्र ने माली से पत्र लिया और पड़ोस के राज्य के राजा को दे दिया। पड़ोसी राज्य के राजा ने पत्र पढ़ते ही अपनी बेटी याने राजकुमारी की शादी पत्र लाये युवा से करवा दी और उसे अपने राज्य के एक हिस्से का राजा भी बना दिया।’
कहानी पूरी होते ही मेरा मित्र मेरी और देखते हुए बोला, ‘पापा, निर्मल कुछ भी कह ले भाग्य अपना काम करता है। जैसे उस माली के भाग्य में राजा और अमीर बनना नहीं लिखा था, इसलिए वो हाथ आए राज्य और दौलत दोनों को ही गँवा बैठा। इसलिए मेरा मानना तो यह है कि इंसान को उसके भाग्य के अनुरूप ही सब कुछ मिलता है। ‘
मित्र की बात सुन मैं जवाब देने का मन बना ही रहा था कि इतने में मित्र के पिता बोले, ‘नहीं बेटा, अगर तुम चाहो तो भाग्य से अधिक दौलत, शोहरत आदि सब कुछ पा सकते हो, बस तुम्हें जो तुम्हारे पास है, उसे ज़रूरतमंदों को देना सीखना पड़ेगा।’ दोस्तों, अंकल के यह शब्द मेरे लिये कई ख़ज़ानों से ज़्यादा महत्वपूर्ण थे क्योंकि इसमें अपने जीवन को बेहतर बनाने का नुस्ख़ा जो छिपा था। इस बात को सुनते ही मैंने निर्णय लिया कि अब मैं ‘देने’ पर और ज़्यादा विश्वास रखूँगा और आप सभी से भी यही निवेदन करूँगा कि अगर आप भी अपने भाग्य से अधिक पाना चाहते हैं तो आज नहीं अभी से देना प्रारंभ कीजिए क्योंकि ‘देना ही पाना है!’
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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