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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

भावनात्मक होना नकारात्मक नहीं…

Jan 15, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, मेरा मानना है कि ब्रह्मांड के प्रति पूर्ण विश्वास के साथ, समर्पण किए बिना जीवन के अंतिम लक्ष्य सुख, शांति और संतुष्टि को पाना असंभव है। सुनने में आपको मेरी बात थोड़ी अटपटी लग सकती है, लेकिन यक़ीन मानियेगा समर्पण के भाव के बिना तो सच्चाई के साथ जीवन जीना भी संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में यह सीखना महत्वपूर्ण हो जाता है कि ब्रह्मांड के प्रति समर्पण का भाव लाएँ कहाँ से? तो मेरा मानना है कि भावना प्रधान जीवन जीना इस दिशा में पहला कदम हो सकता है।

चलिए, इसी बात को हम एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए कोई इंसान किसी बात पर नाराज़ है और साथ ही अपने स्वभाव की वजह से वह अपनी भावनाओं को व्यक्त भी नहीं कर पा रहा है। ऐसी स्थिति में वह इंसान अपने अंतर्मन में एक द्वन्द पैदा करेगा। अगर इस इंसान ने अपने इस द्वन्द का समाधान जल्द कर लिया तो ठीक है अन्यथा यह अंतर्मन का द्वन्द बीतते समय के साथ व्यक्ति के अंदर असंतोष और नकारात्मक भावों को जन्म देने लगेगा और वह इंसान झूठा जीवन जीने लगेगा। अर्थात् अब वह व्यक्ति ऐसे कुचक्र में फँसेगा, जहाँ उसको वह सब बार-बार करना पड़ेगा, जो वह करना नहीं चाहता है और जो वह नहीं चाहता है वह बार-बार करने के कारण उस व्यक्ति के अंदर उदासी, निराशा, हताशा जन्म लेने लगेगी, जो बीतते समय के साथ उसे अवसाद और चिंताग्रस्त बना देगी।


दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भावना को छिपाने की प्रवृति इंसान से उसकी असली पहचान भी छीन लेती है। दोस्तों, झूठी जीवनशैली अपनाना इंसान को बीमार और कमजोर बनाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो जो हम नहीं करना चाहते वह करके हम ख़ुद की नज़रों में गिरकर अपनी आत्मा को मारने लगते हैं, जो हमारे अंदर अकारण ग़ुस्सा और थकान पैदा करता। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ‘भावनाओं के बिना इंसान, इंसान भी नहीं बन सकता है।’


यक़ीन मानियेगा दोस्तों, भावनाओं को छिपाना असल में कायरता की निशानी है। अगर आप इन बिन बुलाई परेशानियों और दिक्कतों याने चिंता, अवसाद, उदासी, निराशा, हताशा आदि से बचना चाहते हैं, तो आज नहीं अभी से ही अपनी हर भावना को दिल की गहराइयों से महसूस करना शुरू कीजिए। अर्थात् मन में जो भी भाव उत्पन्न हो रहा है, पहले तो उसे एकदम गहराई तक महसूस कीजिए और फिर उसके बाद उस भाव के उत्पन्न होने के कारण खोजिए। इसके पश्चात उन कारणों से जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ सीखने का प्रयास कीजिए और नई सीख की सहायता से जीवन को बेहतर बनाइए। ऐसा करना आपको भावनाओं का ग़ुलाम बनने से बचाएगा और आप भावनाओं की मदद से अपने जीवन को नया आयाम दे पायेंगे।


इसीलिए दोस्तों मैं कहता हूँ भावनात्मक व्यक्ति ही रोज़ कुछ नया सीखकर अपना जीवन बेहतर बना सकता है। इसलिए आज से ख़ुद को इस ब्रह्मांड के प्रति समर्पित कीजिए और संतुष्टि के भाव के साथ आप जीवन में आगे बढ़ते हुए जीवन के अंतिम लक्ष्य सुख, शांति और संतुष्टि को पा सकते हैं। तो आईए दोस्तों, आज नहीं अभी से ही भावनाप्रधान जीवन जीना शुरू करते हैं और उससे मिलने वाली सीख को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर, अपने जीवन को बेहतर बनाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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