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भाव ही सबसे बड़ा धन है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 25, 2025
  • 3 min read

June 25, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, अक्सर हम सोचते हैं कि ईश्वर या गुरु को क्या भेंट करें जिससे उन्हें प्रसन्न किया जा सके? यही सोच अक्सर लोगों को महंगे, सुंदर और अमूल्य चीजों को भेंट करने के लिए तैयार करती है। लेकिन भेंट अर्पण करते समय हम यह भूल जाते हैं कि ईश्वर या गुरु हमसे वह भेंट चाहते भी हैं या नहीं या फिर गुरु और ईश्वर को चढ़ाने वाली असली भेंट होती क्या है? आइए भगवान बुद्ध की एक कहानी से हम इसे समझने का प्रयास करते हैं-


एक बार भगवान बुद्ध का आगमन एक गाँव में होता है। उनके कहे वचनों, उनके आभामंडल को देख सभी गांव वासी उनसे प्रभावित हो जाते हैं और उन्हें तरह-तरह की वस्तुएं भेंट देने लगते हैं। उसी गाँव में एक ग़रीब मोची भी रहता था, जिसकी रोज़ी-रोटी दिन भर दूसरों के जूते-चप्पल ठीक करके चला करती थी। सबको बुद्ध के पास भेंट लेते जाता देख उसके मन में विचार आया कि आज तो दिन भर उसे कोई काम नहीं मिलेगा क्योंकि सब लोग बुद्ध दर्शन में व्यस्त हैं, तो मैं भी क्यूँ ना अपने इस समय का उपयोग उनके दर्शन के लिए कर लूँ?


विचार आते ही वह भगवान बुद्ध के दर्शन के लिए जाने की तैयारी करने लगा। लेकिन तभी उसके मन में एक ख्याल आया कि सब लोग तो कुछ ना कुछ भेंट लेकर जा रहे हैं, लेकिन मेरे पास तो कुछ है ही नहीं, मैं क्या लेकर जाऊँ? वह अभी इस विषय में सोच ही रहा था कि उसका ध्यान तालाब में बेमौसम खिले कमल के फूल पर जाता है। उसे देखते ही वह सोचता है कि इसे बेचकर मैं आज का गुजारा कर लूँगा और अंत में जो बचेगा उसे बुद्ध को अर्पित कर दूँगा।


विचार आते ही मोची तालाब में कूद गया और कमल के फूल को तोड़ लाया और उसे एक पत्ते के बनाए दोने में सजा कर रख दिया और उसपर कुछ बूँदें पानी की डाल दी और उसे बेचने की तैयारी करने लगा। तभी वहाँ एक सेठ आया और दो चाँदी के सिक्कों के एवज़ में फूल माँगने लगा। मोची उसके जवाब में कुछ कहता उससे पहले ही गाँव का एक बड़ा व्यापारी आया और दस सिक्कों के एवज में फुल मांगने लगा। फिर नगर सेठ, मंत्री और अंत में राजा उस मोची के पास पहुंचे और हज़ार सोने के सिक्कों के एवज में फुल देने का कहने लगे। तभी मोची पूर्ण गंभीरता और नम्रता के साथ अपने दोनों हाथ जोड़ता हुआ बोला, “महाराज! मैं यह फूल बेचने के लिए नहीं, बल्कि अपने गुरु बुद्ध को भेंट करने के लिए लाया हूँ।”


उसकी बात सुन राजा बोले, “मैं तुम्हारा भाव समझ सकता हूँ लेकिन फिर भी एक बार अच्छे से विचार कर लो क्योंकि हज़ार सोने के सिक्कों से तुम्हारा पूरा जीवन आराम से गुज़र सकता है।” इतना सुनते ही मोची बोला, “राजा जी मैंने आज तक किसी भी इंसान को राजाओं की संपत्ति से तरते नहीं देखा। लेकिन इस जहाँ में ऐसे कई लोग हैं जो संतों के आशीर्वाद से तर जाते हैं।” उसकी बात सुनते ही राजा के मुँह से अनायास ही निकल गया, “तुम बहुत सही कह रहे हो। मेरी नजर में तो तुम भी किसी महात्मा से कम नहीं हो।”


मोची ने मुस्कुराते हुए राजा का अभिवादन किया और फूल लेकर बुद्ध से आशीर्वाद लेने के लिए चल दिया। उनके स्थान तक पहुंचते-पहुंचते इस मोची की आँखों से आँसू बहने लगे, जो सीधे कमल के फूलों की पंखुड़ी पर गिरे। रोते-रोते ही वह मोची बुद्ध के पास पहुँचा और बोला, “सब ने बहुत-बहुत कीमती चीजें आपके चरणों में भेंट की होंगी, लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप, जो पाप मैंने किए हैं, वह आँसुओं के रूप मे आंखों में भरे पड़े हैं। उनको आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूँ। मेरा ये फूल और मेरे ये आँसू स्वीकार करें।” उसके वचनों को सुनते ही महात्मा बुद्ध बोले, “आनंद! देखो, इसने एक पल में ही वो कमा लिया जो बड़े-बड़े राजा नहीं कमा पाए – इसका समर्पण सच्चा है।”


दोस्तों, यह कथा हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है, “ईश्वर या गुरु को भेंट में वस्तु नहीं, भाव चाहिए। क्योंकि सच्चा समर्पण किसी भी भौतिक चीज़ से अधिक मूल्यवान होता है। जब हम अपने अहंकार, अपने पाप और अपने दुःखों को प्रभु के चरणों में अर्पण करते हैं, वही सबसे बड़ी भक्ति बन जाती है क्योंकि इससे हम स्वयं भार मुक्त हो जाते हैं।


इसलिए दोस्तों, हमें कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारे पास देने को कुछ नहीं है। हमारे सच्चे भाव, ईमानदारी से किया गया समर्पण, और निर्मल हृदय ही सबसे मूल्यवान भेंट हैं और भक्ति में भाव ही सबसे बड़ा धन होता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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