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भीतर शांति चुनने वाला ही स्वतंत्र होता है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jan 29
  • 3 min read

Jan 29, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आज मैं आपसे एक ऐसी सच्चाई साझा करना चाहता हूँ, जो सुनने में साधारण लगती है, लेकिन अगर इसे स्वीकार लिया जाये तो वह जीवन को भीतर से बदल देने की शक्ति रखती है। भगवान गौतम बुद्ध का कहना है, “तुम्हें अपने क्रोध के लिए दंड नहीं मिलेगा, तुम अपने क्रोध से ही दंडित हो जाओगे।” थोड़ा और सरल शब्दों में कहूँ तो “आपको कभी भी क्रोध करने के लिए दंड याने सजा नहीं मिलती, दंड याने सजा तो आपको आपका क्रोध ही दे देता है।”


अब ज़रा थोड़ा गहराई से सोचिए, जब आप क्रोधित होते हैं, तो सबसे पहले परेशानी किसे होती है, किसका दिल जलता है, आपका या सामने वाले का? निश्चित तौर पर ख़ुद का! जब हम क्रोध करते हैं तब हमारा ख़ुद का मन, ख़ुद की शांति और ख़ुद का स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। लेकिन अक्सर हम मानते हैं कि क्रोध हमारी ताक़त है। हमें लगता है, “गुस्सा दिखाऊँगा तो लोग मेरी बात जल्दी समझेंगे और अगर मैं चुप रहा तो लोग मुझे कमज़ोर मान लेंगे।” लेकिन सच तो यह है कि क्रोध दूसरों को कम और हमें ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है। इसलिए ही कहते हैं, “क्रोध में बोले गए शब्द तलवार से ज़्यादा गहरे घाव देते हैं और उन घावों पर माफ़ी का मरहम भी अक्सर देर से लगता है।”


चलिए, इस सत्य को हम भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना से समझने का प्रयास करते है। एक बार अपमान, ईर्ष्या और क्रोध से भरा व्यक्ति महात्मा बुद्ध के पास आया और आरोप लगाकर अपशब्द कहते हुए उनका अपमान करने लगा। महात्मा बुद्ध उसकी ग़लत बातों को सुनने के बाद भी शांत बैठे रहे। उन्होंने ना तो कोई प्रतिक्रिया दी और ना ही क्रोध किया। वे तो बस मंद-मंद मुस्कुराते रहे। कुछ देर बाद वह व्यक्ति थक कर, चुप हो गया। शिष्यों ने जब उनसे इस विषय में प्रश्न किया, तो वे प्रश्न का उत्तर प्रश्न से देते हुए बोले, “वत्स, अगर कोई तुम्हें उपहार दे और तुम उसे स्वीकार न करो, तो वह उपहार किसका रहता है?” शिष्य बोले, “उपहार देने वाले का।” जवाब सुन बुद्ध मुस्कुराए और बोले, “जिसके पास जो होता है, वो वही देता है और अगर उसे सामने वाले द्वारा स्वीकार ना किया जाये, तो वह देने वाले के पास ही रह जाता है।”


दोस्तों, क्रोध भी ऐसा ही एक उपहार है, जो हम दूसरों को देना चाहते हैं, लेकिन असल में उसे अपने भीतर ही रख लेते हैं। थोड़ा सा इस विषय में गंभीरता के साथ सोचियेगा, तब आपको एहसास होगा कि इस जीवन में हमने क्रोध में कई रिश्ते खो दिए हैं, जो शांत बातचीत से बच सकते थे। हमने क्रोध के कारण ही कई अवसरों को गंवाया है, जो एक क्षण के संयम से हमारे हो सकते थे और सबसे बड़ी बात, हमने क्रोध के कारण अपना ही मन खो दिया है। इसकी मुख्य वजह क्रोध के दौरान यह भ्रम होना है कि “सिर्फ़ मैं ही सही हूँ!” यही भ्रम हमें सही रास्ते से भटका देता है।


क्रोध का सबसे बड़ा दंड यह है कि वह हमें वर्तमान से काट देता है। हम बार-बार उसी घटना को मन में दोहराते रहते हैं, जिसने हमें चोट पहुँचाई। घटना बीत जाती है, लेकिन क्रोध हमें अतीत में कैद कर देता है और जब मन अतीत में फँसा होता है, तब जीवन आगे कैसे बढ़ सकता है?


दोस्तों, क्रोध के विषय में एक बात और याद रखियेगा, इसे दबाना समाधान नहीं है। इससे मुक्ति तो इसे समझ कर छोड़ने से ही मिल सकती है। इसलिए जब आप क्रोधित हों, तब ठहरिए और एक गहरी सांस लेकर ख़ुद से पूछिए, “क्या यह गुस्सा मेरे जीवन में शांति लाएगा या और विष घोलेगा?” इस प्रश्न का उत्तर आपको एहसास करवायेगा कि सामान्यतः क्रोध के दौरान चुप रहना, सबसे बुद्धिमानी भरा उत्तर होता है।


याद रखिए, क्रोध नहीं, संयम हमें ताक़तवर बनाता है। जो व्यक्ति अपने गुस्से को जीत लेता है, वह दुनिया को जीतने की दौड़ से मुक्त हो जाता है। इसलिए दोस्तों, अगली बार जब क्रोध आए, तो उसे तुरंत व्यक्त करने के स्थान पर, उसे देखिए, समझिए, और जाने दीजिए क्योंकि दुनिया आपको सज़ा दे या न दे, क्रोध आपको ज़रूर सज़ा देगा। याद रखिएगा, जो व्यक्ति अपने भीतर शांति चुन लेता है, वही वास्तव में स्वतंत्र होता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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