मनमाफ़िक परिणाम के लिए विश्वास है ज़रूरी…
- Nirmal Bhatnagar

- Oct 8, 2023
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Oct 8, 2023
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

‘सर मैं अपनी और से पूरा प्रयास तो कर रहा हूँ, लेकिन फिर भी ना जाने क्यों परिणाम मनमाफ़िक नहीं मिल रहे हैं।’ दोस्तों, यह एक ऐसा वाक्य है, जो अक्सर बच्चा अपने शिक्षक को, कर्मचारी अपने बॉस को या फिर सेल्समैन अपने सीनियर को कहता दिख जाएगा। ऐसा ही एक वाक़या मुझे हाल ही में एक कंपनी की सेल्स टीम की ट्रेनिंग के दौरान उस वक़्त देखने को मिला, जब मैं उन्हें सेल्स पिच बनाने के सूत्र को समझा रहा था। मेरी बातचीत के बीच में एक सज्जन, जो शायद मैनेजर रैंक के होंगे, एकदम खड़े हुए और बोले, ‘सर आप जो बता रहे हैं वह तो बिलकुल सही है। लेकिन हमारा प्रोडक्ट तो बाज़ार में तब ही बिकेगा ना जब डिमांड होगी।’ इस विषय में उनसे जब मैंने थोड़ी देर बात की तो मुझे एहसास हुआ असली समस्या डिमांड की नहीं अपितु प्रोडक्ट पर विश्वास की है। मैंने उन्हें बीच में रोका और कहा, ‘सर, पहले मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ उसके बाद हम इस विषय में चर्चा करेंगे और उन्हें एक कहानी सुनाई जो इस प्रकार थी-
राजपुर में रहने वाले राजू को किसी ने समझा दिया कि ठाकुर जी की रोज़ सेवा करने से मन की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती है।राजू ने अगले दिन से ही प्रतिदिन ठाकुर जी की सेवा करना शुरू कर दिया, लेकिन राजू को इसका परिणाम उसकी सोच के बिलकुल विपरीत मिला। याने उसका धन बढ़ने के बजाय घटने लगा। राजू रोज़ सेवा करने के परिणाम को देख हैरान था। एक दिन राजू ने एक ज्योतिष से इस विषय में सलाह-मशवरा किया। ज्योतिष ने राजू की कुंडली देखकर उसे बताया कि वह ग़लत भगवान की नियमित सेवा और पूजा कर रहा है। ठाकुर जी तो अपने भक्तों को केवल अपने चरणों की भक्ति देते हैं या फिर जन्म-मरण के बंधन से सदा-सदा के लिए मुक्ति दिलवा देते हैं। उसे तो मनवांछित फल याने धन-दौलत पाने के लिए धन देने वाली माँ लक्ष्मी की पूजा करना चाहिये।
राजू को तो सिर्फ़ और सिर्फ़ धन की लालसा या कामना थी। उसे इससे क्या फ़र्क़ पढ़ना था कि उसकी इच्छा ठाकुर जी की भक्ति से पूरी हो या फिर देवी लक्ष्मी के पूजन से। उसने ठाकुर जी की मूर्ति को पूजा में से उठाया और अपनी अलमारी के ऊपरी खाने में रख दिया और पूजा में रखे सिंहासन पर ठाकुर जी की जगह लक्ष्मी जी को विराजित कर दिया। अब राजू रोज़ पूरे सम्मान के साथ देवी माँ लक्ष्मी जी का पूजन करने लगा।
एक दिन राजू ने पूजन के दौरान माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए सुगंधित धूप बत्ती जलाई तो उसने देखा कि धूप का धुआँ हवा के झोंके से ठाकुर जी की ओर जा रहा है। यह देखते ही उसका मन क्रोध से भर गया और वह मन ही मन बोला, ‘मेरी परेशानी से तो कोई लेना देना नहीं है तुम्हारा, बस मुफ़्त में ही धूप सूंघने के लिए तैयार बैठे हो। नाहक ही माँ को प्रसन्न करने के लिए लगाई धूप को सूंघकर जूठी कर रहे हो। विचार आते ही राजू पूजन बीच में छोड़ उठा और एक रूई का टुकड़ा लेकर ठाकुर जी की नाक में ठूँसने लगा। उसी पल ठाकुर जी राजू के सामने प्रकट हुए और उससे बोले, ‘राजू, वर माँगो! बताओ तुम्हें क्या चाहिये?’ राजू थोड़ा नाक-भौंह चढ़ाता हुआ बोला, ‘वरदान-वरदान तो सब ठीक है, पहले यह बताओ कि जब मैं आपकी सेवा कर रहा था तब तो आप जड़ बने रहे और आज जब मैं लक्ष्मी जी को मना रहा हूँ तो वर देने आ गये। बताओ यह माजरा क्या है?’
इतना कहकर मैं रुक गया और प्रश्न पूछने वाले सज्जन से मुख़ातिब होता हुआ बोला, ‘सर, बताइये अगर यह प्रश्न राजू ने आपसे पूछा होता तो आप क्या जवाब देते?’ वे बोले, ‘जिसका जैसा भाव या विश्वास होता है, उसकी सिद्धि भी उसी प्रकार होती है।’ मैंने तुरंत उनकी हाँ में हाँ मिलाई और कहा, ‘बिलकुल सही कहा आपने, ‘राजू पहले ठाकुर जी को सिर्फ़ एक मूर्ति मान रहा था। याने राजू की नज़र में पहले ठाकुर जी जड़ थे, इसीलिए वे जड़ बने रहे। लेकिन जब राजू ने ख़ुशबू को ठाकुर जी की और जाते देखा और यह महसूस किया कि वे नाहक ही ख़ुशबू के मज़े लेकर उसे जूठी कर रहे हैं यानी उसने ठाकुर जी को साक्षात माना, तो वे सच में उसके सामने आ गये।’ ठीक इसी तरह जब तक तुम स्वयं अपने प्रोडक्ट पर विश्वास नहीं करोगे, उसकी आवश्यकता और महत्ता नहीं समझोगे, तब तक तुम्हारे लिए उसे बाज़ार में बेच पाना मुश्किल, थकाने और ख़ुशी चुराने वाला अनुभव ही रहेगा। सही कहा ना साथियों? इस विषय में अपने विचारों से अवगत ज़रूर कराइयेगा…
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com




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