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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

मन, शरीर और तनाव…

Nov 28, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज के आपाधापी भरे इस युग में हम इतने उलझ चुके हैं कि अपने जीवन की सही प्राथमिकताएँ तक नहीं बना पा रहे हैं और इसीलिए सब कुछ होने के बाद भी शांति और संतुष्टि के लिए भटक रहे हैं। मेरी नज़र में तनाव भरे इस जीवन का मूल कारण शिक्षा के दौरान बच्चों को भेड़चाल के रूप में हांकना है। थोड़े कटु शब्दों के इस्तेमाल के लिए माफ़ कीजियेगा दोस्तों, पर कभी ना कभी, किसी ना किसी प्लेटफ़ार्म पर इस विषय में चर्चा होना ज़रूरी है। लेकिन आगे बढ़ने से पहले दोस्तों मैं आपको बता दूँ कि यहाँ शिक्षा का अर्थ सिर्फ़ स्कूल या कॉलेज में दी जाने वाली शिक्षा से ही नहीं है। इसे आप लालन-पालन के दौरान सिखाई जाने वाली बातों से भी जोड़ कर देखें।


जी हाँ साथियों, मेरी नज़र में पेरेंटिंग और औपचारिक शिक्षा दोनों ही हमारे जीवन में तनाव की मुख्य वजह है। एक बार फिर उक्त बात का एहसास मुझे बच्चों के एक समूह के लिए एक संस्था द्वारा आयोजित किए गए कैरियर गाइडेंस और काउन्सलिंग सेशन के दौरान, उस वक़्त हुआ, जब मेरे द्वारा पूछे गये एक प्रश्न के जवाब में छप्पन प्रतिशत बच्चों ने अपने लक्ष्य चुनने का आधार माता-पिता की आदेशात्मक सलाह को बताया। इतना ही नहीं पैंसठ प्रतिशत बच्चों ने पैकेज याने पैसे को आधार मानकर और २२ प्रतिशत बच्चों ने ग़लत रोल मॉडल चुनकर, अपने लक्ष्य को चुना। आपको जानकर आश्चर्य होगा साथियों कि उस बड़े समूह में मात्र ८ प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जिन्होंने अपना लक्ष्य, अपनी पसंद, अपनी क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर बनाया था। आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि बच्चों की पहली तीन प्राथमिकताओं के आधार पर की गई कैलकुलेशन की वजह से उपरोक्त प्रतिशत का जोड़ सौ प्रतिशत से ज़्यादा जा रहा है।


इसी बात को अगर मैं आपको दूसरे शब्दों में कहूँ तो बच्चों के उस समूह में ९२% बच्चों ने अपनी पसंद, क्षमता और संभावना को नज़रंदाज़ कर अपना लक्ष्य चुना था। याने दूसरों से प्रभावित लक्ष्यों का जीवन में होना तनाव और दबाव की प्रमुख वजह हो सकता है। इसका अर्थ यह क़तई नहीं है दोस्तों कि लक्ष्य जीवन में तनाव लाते हैं। मेरी नज़र में तो जीवन में लक्ष्य का होना या लक्ष्य आधारित जीवन जीना निश्चित तौर पर लाभदायक होता है, लेकिन तब तक ही जब वह लक्ष्य आपका अपना हो। उसे आपने दूसरों से उधार ना लिया हो, अन्यथा आप अच्छे भले जीवन को तनाव युक्त बना लेंगे।


जी हाँ दोस्तों, जाने-अनजाने में उधार के लक्ष्यों को आधार बनाकर जीवन जीना अपरोक्ष तरीक़े से तनाव को निमंत्रण देना है। अब आप सोच रहे होंगे कि भला कोई तनाव को निमंत्रण देता है क्या? जी हाँ, मेरा तो यही मानना है, क्योंकि जब आप ख़ुद के अंदर क्या है उसे छोड़ कर आस-पास मौजूद लोगों, माहौल, उपलब्ध संसाधनों आदि पर आधारित जीवन जीना शुरू कर देते हैं तब आप ना चाहते हुए भी तनाव को अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं और जब यह आपके जीवन में आ जाता है तब यह आपको दीमक की तरह पकड़ लेता है और धीमे-धीमे आपकी ख़ुशी, शांति और संतुष्टि को खा जाता है।


इससे बचने का एक तरीक़ा सबसे पहले यह जानना है कि आप तनाव में हैं या नहीं। तो चलिए पहले यह समझ लेते हैं कि तनाव होता क्या है। साथियों तनाव का जन्म शरीर और मन में दूरी की वजह से होता है अर्थात् जब भी कोई व्यक्ति काम करते समय कल्पनाओं में होता है, तो वह अपने मन और शरीर में एक दूरी पैदा कर लेता है। यह दूरी जितनी ज़्यादा होगी उतना ही उसका अंतर्मन दुविधा में होगा और आपके अंदर एक झगड़ा; एक खिंचाव उत्पन्न करेगा। इसी दूरी या इसी खिंचाव या ख़ुद के अंदर उड़े मानसिक द्वन्द को तनाव कहते हैं। यक़ीन मानियेगा साथियों, इसका कारण कभी भी कार्य का अधिक होना नहीं है।


चलिए उपरोक्त बात को हम एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए आप एक तैराक है या आपको खेलना बहुत पसंद है और आज आप तीन घंटे तैर कर या खेलकर घर लौटे हैं। अब आप बताइए इतना थकने के बाद आपका मन तनावग्रस्त होगा या वह चुस्ती और प्रसन्नता से भरा हुआ होगा? आप कहेंगे, ‘चुस्ती और प्रसन्नता से भरा हुआ होगा।’ ऐसा आपने इसलिए कहा क्योंकि खेलते समय आपका मन और शरीर पूरी तरह से उस खेल पर केंद्रित था। जिसके कारण आपके शरीर और मन के बीच दूरी पैदा नहीं हो पाई और इसीलिए आप शारीरिक रूप से अधिक मेहनत करने के बाद भी तनाव में नहीं है। मैं तो बल्कि यह कहूँगा कि अगर खेलने के पहले आप तनाव में होंगे तो भी अब खेलने के बाद वह दूर हो गया होगा। चलिए अब एक विपरीत स्थिति सोच कर देखिए, आप अभी खेलने जाना चाह रहे हैं और इस समय आप कोई भी कार्यालय संबंधी कार्य करने के मूड में नहीं है। तभी आपके बॉस का फ़ोन आता है और वह आपको किसी कार्य को करने के लिए विवश करता है। अब यह स्थिति आपके भीतर तनाव पैदा करेगी या नहीं? निश्चित तौर पर करेगी क्योंकि हमारा मन तो खेलने जा रहा है याने कल्पनाओं में जी रहा है और हमारा शरीर कार्यालयीन कार्य कर रहा है। अर्थात् हमने इस स्थिति में अपने मन और शरीर में एक दूरी पैदा कर ली है जिसके कारण अब हमारे अंदर तनाव ने जन्म ले लिया है। दोस्तों मुझे नहीं लगता कि अब आपको यह बताने की ज़रूरत बची है कि तनाव से कैसे बचा जाए…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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