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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

‘माया’ की माया से बचाएँ ख़ुद को…

Dec 05, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक क़िस्से से करते हैं। बात कई साल पुरानी है, गाँव में सफेद लंबी दाढ़ी वाला एक बूढ़ा फ़क़ीर घुमा करता था। उसकी अजीब सी हरकतों को देख गाँव वाले अक्सर उसे पागल कहकर पुकारा करते थे। जैसे, वह हमेशा ‘माया’ लिखा हुआ थैला लेकर घुमा करता था, जिसमें वह सड़क पर पड़े रंगीन काग़ज़ों को उठाकर, बड़ा सम्भालकर रखा करता था। ऐसा करते वक़्त वह सुनिश्चित करता था कि कागज पर कोई निशान या सलवट ना बचे।


दिन में जब भी उस फ़क़ीर को समय मिलता था, वह माया की थैली में से रंगीन काग़ज़ों को निकाल कर उन्हें नोटों की गड्डी के रूप में जमा कर, उसे बड़ा सम्भालकर वापस माया की थैली में रख लिया करता था। इस आदत के कारण उस फ़क़ीर की थैली रोज़ बड़ी और भारी होती जा रही थी। लोग जब भी माया की थैली के अतिरिक्त भार को कम करने के विषय में उसे समझाया करते थे तो वह कहता था कि, ‘क्या फ़ालतू की बात कर रहे हो। यह तो मेरी जीवन भर की कमाई है। इसके बिना तो मैं एक क्षण के लिये भी नहीं जी पाऊँगा।’ कभी-कभी वह रंगीन काग़ज़ों की मदद से महल बनाने की तो कभी जीवन की नैया पार लगाने की बातें किया करता था। जब भी कोई व्यक्ति उसे चिढ़ाने के लिए थैला छीनने का प्रयास करता तो वह कहता था अगर तुमने या किसी और ने इसे चुराया तो मैं आत्महत्या कर लूँगा। इस माया के बिना तो मैं जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ।’ उसकी बातों को सुन अक्सर लोग हँसा करते थे। कई बार बच्चे उसे पागल कहते थे तो कई बार किसी और तरह चिढ़ाया करते थे। इस पर वह फ़क़ीर हंसते हुए कहता था, ‘चुप रहो, ख़ुद तो पागल हो और दूसरों को पागल समझते हो।’


एक बार उस गाँव में एक ज्ञानी महापुरुष का आगमन हुआ। सभी गाँव वाले उनके पास मिलने के लिए आने लगे। लोगों की इस भीड़ में वह फ़क़ीर भी था। उसे देखते ही गाँव वाले उसे भगाने का प्रयास करने लगे। इस विषय में ज्ञानी व्यक्ति के पूछने पर गाँव वालों ने विस्तार से फ़क़ीर की हरकतों के विषय में उन्हें सब कुछ कह सुनाया। गाँव वालों की बात सुनते ही ज्ञानी पुरुष अपने स्थान से उठे और उस फ़क़ीर के चरणों में जाकर बैठ गए। जब गाँव वालों ने उनसे इस विषय में पूछा तो वे बोले, ‘जिन फ़क़ीर को तुम पागल समझ रहे हो हक़ीक़त में वे मुझसे भी ज़्यादा ज्ञानी है। वे अपने क्रियाकलापों से तुम्हें तुम्हारे जीवन की हक़ीक़त समझाने का प्रयास कर रहे हैं। असल में उनके द्वारा रंगीन काग़ज़ों को उठाकर माया नामक थैली में रखना, असल में तुम्हें यह याद दिलाने का प्रयास है कि तुम किस तरह रुपये इकट्ठे करते हो और उनसे महल बनाने, अपना जीवन सुधारने जैसे तमाम तरह के सपने पूरे करने के विषय में सोचते हो। फ़क़ीर असल में अपनी हरकतों से तुम्हारी मूढ़ता को प्रकट कर रहा है। याद रखना यही गलती सिकंदर और नेपोलियन समेत कई लोगों ने की थी, तुम उसे दोहराओ मत।’


ज्ञानी पुरुष के इतना कहते ही वह फ़क़ीर ज़ोर से हंसा और बोला, ‘किन मूर्खों को समझाने का प्रयास कर रहे हो? ये सब मेरे रंगीन काग़ज़ों को कागज और ख़ुद के रंगीन काग़ज़ों को नोट समझ कर तिजोरियों में रखते हैं और सोचते हैं कि उनसे यह दुनिया को जीत लेंगे। हक़ीक़त में तो यह सब पागल हैं और मानते मुझे हैं।


बात तो दोस्तों, उस फकीर और ज्ञानी पुरुष की एकदम सटीक थी। सामान्यतः हम सभी लोगों को दूसरों की गठरी याने ग़लतियों का बोझा तो आसानी से नज़र आ जाता है, लेकिन हम अपनी गठरी याने ग़लतियों पर ध्यान देना भूल जाते हैं। याद रखियेगा, जब तक हम दूसरों को छोड़ कर ख़ुद के अंदर झांकना शुरू नहीं करेंगे तब तक हम अपने अंदर मौजूद ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं को पहचान नहीं पाएँगे और समझौतों के साथ अपना जीवन जिएँगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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