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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

यश और कीर्ति की सुगंध या संग्रह और आसक्ति की दुर्गंध

May 7, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, इस दुनिया में ज़्यादातर लोगों की इच्छा सब कुछ समेटकर, इकट्ठा कर सुखी बनने की होती है। जबकि प्रकृति का नियम इसके बिलकुल उलट है। प्रकृति हमेशा पाने से ज़्यादा देने के सुख को बड़ा और जीवन को सार्थक बनाने वाला बताती है। अपनी बात को मैं आपको एक बहुत छोटी सी कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


बात कई साल पुरानी है एक भिखारी भीख माँगने शहर के सबसे बड़े कंजूस के घर पहुँच गया और उनसे याचना करते हुए कुछ दान देने का निवेदन करने लगा। कंजूस अपनी आदतानुसार तरह-तरह के बहाने बनाकर उस भिखारी को भगाने का प्रयास करने लगा। वहीं दूसरी ओर भिखारी भी किसी ना किसी तरह से सेठ से कुछ ना कुछ देने का निवेदन करने लगा। दोनों के पास ही खड़े एक संत यह नजारा देख मुस्कुरा रहे थे, वे सेठ के पास गए और उससे भिखारी को दान देने के लिए कहा। सेठ ने बड़े अनमने मन से जेब से सबसे छोटा सिक्का निकाला और भिखारी को दे दिया।


सेठ को अनमने मन से सिक्का देता देख संत ने उससे कहा, ‘सेठ भिखारी को तो तुमने दान दे दिया, अब मुझे भी कुछ दे दो।’ संत की बात सुन सेठ चिंता में पड़ गया। वह कुछ कहता या करता उसके पहले ही संत बोले, ‘चिंता मत कर सेठ मुझे तेरी दौलत नहीं चाहिए। मुझे तो बस ज़मीन पर पड़ी 1 मुट्ठी धूल उठा कर दे दे। संत की बात सुनते ही सेठ के चेहरे पर ख़ुशी छा गई और उसने तुरंत ही ज़मीन पर पड़ी धूल उठाकर दान स्वरूप संत को दे दी।


संत को दान में धूल लेता देख वहाँ से गुजर रहे एक सज्जन ने संत से इसकी वजह पूछ ली। संत मुस्कुराते हुए बोले, ‘तुमने अगर ध्यान दिया हो तो सिक्का दान में देते समय सेठ बड़ी दुविधा में था। उसने उस सिक्के को बचाने का अपनी ओर से हर सम्भव प्रयास किया था। लेकिन जब बात नहीं बनी तो उसने भिक्षुक से पीछा छुड़ाने के लिए उसे बड़े ही अनमने मन से दान दिया। जब आप किसी को ख़ुशी और पूरे मन के साथ नहीं देते हैं तो वह दान नहीं माना जाता है। मैं चाहता था कि उस सेठ को दान का लाभ मिले इसलिए मैंने उससे वह चीज़ माँगी जिसे वो खुश होकर मुझे दे सके।


दोस्तों, अनमने मन से या फिर खुश होकर दान देना, दूर से तो एक समान लगता है, लेकिन हक़ीक़त में दोनों में काफ़ी अंतर होता है। जब आप स्वयं की इच्छा से किसी वस्तु या पदार्थ को किसी और को देते हैं तो वह दान कहलाता है, अन्यथा इसे हम भीख कह सकते हैं। इसी तरह अपनी इच्छा से किसी वस्तु को छोड़ना त्याग और अनिच्छा के साथ छूटना, वस्तु या पदार्थ का नाश होना कहलाता है। अब यह आपके ऊपर है कि आप इसे अपने जीवन में किस तरह आगे बढ़ाते हैं। अर्थात् दान और त्याग के साथ अथवा भीख और नाश के साथ।


आप भी सोच रहे होंगे कि क्या इन बातों का भी प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है? तो मैं कहूँगा निश्चित तौर पर क्योंकि सामान्यतः जिन चीजों का हम संग्रह करने का प्रयास करते हैं, वह सभी नष्ट हो जाने वाली हैं या हमारी इच्छा के विरुद्ध भी दूसरों के पास चली जानी हैं। उदाहरण के लिए एकत्र की हुई दौलत, शोहरत, पद, प्रतिष्ठा, मान, वैभव इत्यादि। जिस तरह सूर्य सुबह सुनहरा प्रकाश देता हुआ, उदय होता है। दोपहर में अपने पूरे तेज के साथ वातावरण को गर्म करता है और शाम होते-होते उसका प्रकाश क्षीण होते हुए, अंत में वो अस्त हो जाता है। इसी तरह रात्रि को शीतलता बिखेरने वाला चाँद भी सुबह होते-होते प्रकृति के उस विराट आंचल में कहीं छुप सा जाता है। यही प्रकृति का एकमात्र शाश्वत नियम है कि सदा कुछ भी एक सा नहीं रहने वाला है। इसलिए दिल से देना और छोड़ना सीखो फिर चाहे वह प्रेम हो, सम्मान हो, समय हो, खुशी हो, धन हो अथवा अन्य कोई भी वस्तु। दूसरे शब्दों में कहूँ तो दान और त्याग के साथ जीवन जीना सीखो। याद रखना दोस्तों, जिन फलों को वृक्ष हमेशा के लिए अपने पास रखता है वह समय के साथ सड़ जाते हैं और वृक्ष को दुर्गंध युक्त कर देते हैं। इसी तरह से समय आने पर प्रकृति द्वारा सब कुछ स्वतः वापस ले लिया जायेगा, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप बाँटकर अपने यश और कीर्ति की सुगंध को बिखेरना चाहते हैं या सम्भालकर, संग्रह और आसक्ति की दुर्गंध को अपने पास रखना चाहते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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