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युद्ध हथियारों से नहीं, निर्णयों से जीते जाते हैं !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jan 28
  • 3 min read

Jan 28, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

Source: Wikipedia Commons
Source: Wikipedia Commons

दोस्तों, आज मैं आपको केवल महाभारत का एक प्रसंग नहीं, बल्कि नेतृत्व और निर्णय क्षमता के साथ समय की क़ीमत समझाने वाली एक ऐसी सीख देना चाहता हूँ, जो अगर जीवन में उतर जाए, तो बहुत सी हारें जीत में बदल सकती हैं। तो चलिए शुरू करते हैं महाभारत के युद्ध के मंजर की, जहाँ 18 दिनों के भीषण युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र अब रणभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था। जहाँ कुछ दिन पहले शंखनाद गूँजता था, आज वहाँ सिर्फ़ मृत्यु की निस्तब्धता थी। टूटे रथ, गिरे हुए हाथी, और रक्त से भीगी धरती के बीच दुर्योधन अपनी टूटी जंघाओं के साथ पड़ा था। उसका शरीर हार चुका था, पर अहंकार अब भी उसके अंदर जीवित था। उसी क्षण वहाँ भगवान श्रीकृष्ण पहुँचे। उन्हें देखते ही दुर्योधन ने पीड़ा और क्रोध से कहा, “कृष्ण! तुमने छल से मुझे हराया है। यदि धर्मयुद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते!”


दुर्योधन की बात सुन श्री कृष्ण मुस्कुराए, उनकी उस मुस्कान में व्यंग्य नहीं, गहन करुणा और सत्य छुपा था। कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद वे बोले, “दुर्योधन, तुम दूसरों के ‘छल’ को देख रहे हो, लेकिन अपने ‘चयन’ की भूल नहीं देख पा रहे। तुम्हारी हार ना तो छल की वजह से हुई है, ना ही अर्जुन के तीर या भीम की गदा से, वह तो बस तुम्हारे एक गलत निर्णय से हुई है।”


दोस्तों, यही वह क्षण था, जहाँ युद्ध समाप्त होकर जीवन का पाठ शुरू हुआ। कृष्ण ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “तुम्हारी सेना में अश्वत्थामा एक ऐसा योद्धा था, जिसे सही समय पर नेतृत्व मिल जाता तो यह युद्ध 18 दिन नहीं, एक प्रहर में समाप्त हो जाता। लेकिन तुमने हीरे को छोड़कर कंकड़ चुना। तुम मित्रता के भाव में इतने उलझे हुए थे कि तुम्हें कर्ण की वीरता दिखी, पर तुम अश्वत्थामा की क्षमता को समझ नहीं पाये। यहाँ से नेतृत्व की सबसे बड़ी भूल शुरू होती है। पहले चरण में तुमने भीष्म पितामह को सेनापति बनाया, जो पांडवों से प्रेम करते थे। दूसरे चरण में तुमने गुरु द्रोणाचार्य को सेनापति बनाया, जो शिष्य-मोह से बंधे थे और तीसरे और निर्णायक क्षण में, जब गुरु द्रोण गिरे, तब भी तुम अश्वत्थामा को चुन सकते थे, उस वक्त उनका क्रोध पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था, पर तुमने भावुकता में कर्ण को चुना। कर्ण महान योद्धा थे, दानवीर थे, पर वे मारे जा सकते थे। लेकिन अश्वत्थामा में शिव का अंश था और वे अमर थे।” इतना कह श्री कृष्ण एक क्षण के लिए रुके, फिर पूरी स्पष्टता के साथ बोले, “यदि 16वें दिन अश्वत्थामा सेनापति होते, तो पांडव ही नहीं, तीनों लोकों की शक्तियाँ भी उन्हें रोक नहीं पाती।”


मृत्युशैया पर पड़े दुर्योधन को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अश्वत्थामा को अपना अंतिम सेनापति बनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ही रात में अश्वत्थामा ने वह कर दिया, जो 11 अक्षौहिणी सेना 18 दिन में न कर सकी। इसे देख सुबह दुर्योधन खूब रोया। उसके आँसू हार के नहीं, पछतावे के थे। उसके मौन में एक चीख छुपी हुई थी, जो बार-बार कह रही थी, “काश… मैंने सही व्यक्ति को सही समय पर पहचाना होता।”


दोस्तों, यह कहानी हमें एक कड़वी लेकिन अमूल्य सीख देती है, जीवन में संसाधन होना पर्याप्त नहीं है। सफलता के लिए आपको सही समय पर सही व्यक्ति को पहचानना सीखना होगा। यही सच्ची नेतृत्व क्षमता है। हम अक्सर भावनाओं, पसंद-नापसंद और पूर्वाग्रहों के कारण अपने जीवन या टीम के सबसे काबिल लोगों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और जब हमें उनकी कीमत समझ आती है, तब तक समय हाथ से निकल चुका होता है।


दोस्तों, अगर जीवन में विजेता बनना चाहते हैं तो ख़ुद से पूछिए, “कहीं मैं अपने परिवार या संगठन में किसी “अश्वत्थामा” को अनदेखा तो नहीं कर रहा हूँ?” यह प्रश्न वाक़ई बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इतिहास बताता है, ‘युद्ध हथियारों से नहीं, निर्णयों से जीते जाते हैं।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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