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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

रहें शुक्रगुज़ार उनके जिन्होंने बनाया है आपको ख़ास…

Sep 5, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, कुछ लोग पर्दे के सामने मंच पर अपना किरदार निभाते हैं, तो कुछ लोग पर्दे के पीछे। वैसे यह बात जितनी रंगमंच के लिए सटीक बैठती है, उतनी ही असल जीवन के लिए भी। जी हाँ साथियों, सफलता की कहानियों के पीछे ऐसे ही अज्ञात सेवा और प्रेम करने वाले अनेक हीरो छुपे रहते हैं, जो कभी जमाने के सामने नहीं आते हैं या ज़माना उन्हें कभी पहचान नहीं पाता है। लेकिन वे जिस किरदार को पर्दे के पीछे रहकर निखारते हैं, वह किरदार अपनी पूरी ज़िंदगी उसके प्रति कृतज्ञ रहकर जीता है। अपनी बात को मैं आपको ऐसे ही एक किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ। बात सन् १४८५ के आस-पास की है, एक गाँव में दो बहुत ही गरीब दोस्त रहा करते थे। उनकी स्थिति का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कई बार तो उनके लिए दो वक्त की रोटियाँ खाना भी मुश्किल हो जाता था। पारिस्थितिक कारणों से दोनों ही दोस्त पढ़ लिख नहीं पाए थे। लेकिन दोनों की ही रुचि चित्रकला में थी।


एक दिन दोनों दोस्तों ने शहर जाकर चित्रकला सीखने का निर्णय लिया। शहर जाने की योजना बनाते वक़्त बातों ही बातों में दोनों को एहसास हुआ कि वहाँ रहने-खाने का इंतज़ाम करने में काफ़ी पैसे लगेंगे, जो उनके पास नहीं हैं। अभी वे इस पर विचार कर ही रहे थे कि एक दोस्त ने सुझाव दिया कि क्यों ना हम दोनों में से एक चित्रकला सीखने जाए और दूसरा मेहनत-मजूरी करके पैसा कमाए, जिससे रहने-खाने का इंतज़ाम किया जा सके।


विचार अच्छा और उपयोग में लाने लायक़ था, इसलिए दोनों दोस्तों में से एक ने गुरु के चरणों में बैठकर उनके मार्गदर्शन में चित्रकारी सीखना और दूसरे ने श्रम करके स्वयं का और अपने मित्र का पेट भरने के लिये कार्य करना शुरू कर दिया। कला की साधना में कठिन परिश्रम करते हुए ऐसे ही कई वर्ष बीत गए। धीरे-धीरे अब कला जगत में इस युवक का नाम पहचाना जाने लगा और उसका भाग्योदय हो गया।


एक दिन पहले मित्र, याने जो अब चित्रकार बन गया था, को महसूस हुआ कि उसने कला की शिक्षा का पहला अध्याय पूर्ण कर लिया है और अब बारी उसके मित्र की है। वह तुरंत अपने मित्र के पास पहुँचा और उसके गले लग कर, चित्रकार बनने की अभी तक की पूरी यात्रा एक ही साँस में कह सुनाई। जब चित्रकार मित्र थोड़ा सामान्य हुआ तो उसे एहसास हुआ कि उसका मित्र तो इस दौरान उससे भी कई गुना कठिन साधना में व्यस्त था। असल में उसकी साधना उसके लक्ष्य के लिए थी याने उसके मित्र के चित्रकारी सीखने में कहीं कमी ना रह जाये, इसलिए वह रोज़, अपनी सौ प्रतिशत क्षमता के साथ मज़दूरी करने याने गड्ढे खोदने, गिट्टी फोड़ने, लकड़ी काटने, बोझा ढोने में व्यस्त था। इस साधना को करते समय वह यह भी भूल गया था कि उसे भी एक दिन चित्रकारी सीखने जाना है और आज जब कलाभ्यास याने चित्रकारी सीखने की उसकी बारी आई है तब मज़दूरी करने के कारण उसके हाथ इतने सख़्त और विकृत हो गए हैं कि उनसे चित्रकारी जैसे बारीक कार्य को करना सम्भव नहीं था। यह देख पहला मित्र जो अब ख्यात चित्रकार बन गया था, जिसे अब लोग अलब्रेख्त डुरेर के नाम से जानने लगे थे, रोने लगा, लेकिन दूसरा मित्र अभी भी आनंदित अवस्था में था। अलब्रेख्त डुरेर को रोता देख वह बोला, ‘इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है मेरे हाथ चित्र बनाते हैं या तुम्हारे? क्या तुम्हारे हाथ मेरे नहीं हैं? मेरा तो मानना यही है और आज तुम्हें इस रूप में देखकर मुझे लग रहा है कि मैं, मेरे लक्ष्य में सफल हुआ हूँ।’


दोस्तों, आज दुनिया महान चित्रकार अलब्रेख्त डुरेर को तो जानती है लेकिन उसके मित्र को नहीं जिसने अपना खून-पसीना बहाकर उसे महान चित्रकार बनाने में मदद करी। लेकिन इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है, अलब्रेख्त डुरेर तो अपने उस अज्ञात साथी के प्रेम, साधना, सेवा और सबसे बड़ी चीज, उसके सृजन को जानता था। इसलिए उसने दुनिया के लिए अज्ञात, अपने मित्र के हाथों का प्रार्थना करते हुए एक चित्र बनाया, जो आज भी नायाब है क्योंकि उन हाथों ने जैसा प्रेम, प्रार्थना और कर्म किया वैसा कर पाना संभव नहीं है।


लेकिन दोस्तों, ऐसी कई निस्पृह, त्यागी, तपस्वी पुण्यात्माएँ हम सभी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए पर्दे के पीछे रहकर प्रार्थना करती हैं, हमसे प्रेम करती हैं, हमारी दिलो-जान से सेवा करती है। ये वे धन्य लोग होते हैं जो कभी आपकी सफलता के लिए जाने नहीं जाते, लेकिन इसके बाद भी वे आप जैसी अच्छी शख़्सियत का सृजन करते हैं। हक़ीक़त में इस दुनिया में ऐसे पवित्र प्रेम और प्रार्थना करने वाले लोगों का साथ बड़े सौभाग्य से कुछ ही लोगों को मिलता है। आप ऐसे ही एक क़िस्मत वाले इंसान हैं। इसलिए आइये, आज शिक्षक दिवस पर हम हमारे ऐसे सभी शिक्षकों को नमन करते हैं और साथ ही उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि प्रेम के हाथों से की गई सेवा से बड़ी ना कोई साधना है और ना ही कोई प्रार्थना। आप सभी को शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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