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लाएँ किसी के चेहरे पर मुस्कान…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Nov 3, 2025
  • 3 min read

Nov 2, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, हर इंसान अपने जीवन में शांति, सुरक्षा और संतोष चाहता है और इसी वजह से बचपन में शिक्षा से लेकर जवानी में जीतोड़ मेहनत कर तमाम तरह के जतन करता है। लेकिन बाहरी वातावरण से कंडीशंड होने के कारण या यूँ कहूँ भौतिक चीजों की चकाचौंध के कारण, हम यह जान ही नहीं पाते हैं कि शान्ति, सुरक्षा और संतोष जैसी चीज़ें हमें बाहर से नहीं मिलती। ये तो हमारे अपने कर्मों से उत्पन्न होती हैं।


जी हाँ दोस्तों, सही सुना आपने, शान्ति, सुरक्षा और संतोष जैसे लक्ष्यों को हम सिर्फ अपने कर्मों से पा सकते हैं। भारतीय आध्यात्मिक दर्शन में जब हम किसी की मदद करते हैं, किसी का दुख बाँटते हैं, तो वो केवल एक अच्छा काम नहीं होता, बल्कि आत्मा को पवित्र करने वाला एक पुण्य बन जाता है और यही पुण्य आगे चलकर हमारे जीवन में अदृश्य कवच की तरह हमारी रक्षा करता है।


दोस्तों, गौर करके देखियेगा, जब हम किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, तो भीतर से एक सुकून महसूस होता है। यह सुकून हम किसी वस्तु या पद को पाकर नहीं पा सकते, यह तो हमें सिर्फ दुआओं से मिलता है। सामने वाला भले ही सीधे आपसे कुछ न कहे, पर उसके दिल से निकली सच्ची दुआ, ब्रह्मांड में एक सकारात्मक ऊर्जा बनकर हमारे चारों ओर घूमने लगती है। यही वह शक्ति है जो हमें कठिन समय में सम्भाल लेती है।


एक और बात जो हमारे भारतीय दर्शन में कही गई है, “पाप शांति को छीन लेते हैं, और पुण्य आत्मा को हल्का कर देते हैं।” जब आत्मा हल्की होती है, तो वह न दुख से दबती है, और ना ही भय से झुकती है। पुण्य आत्मा के लिए अमृत समान होता है, यह हमारे अंदर के अंधकार को वैसे ही दूर करता है, जैसे, आकाश में उगता हुआ सूर्य धीरे-धीरे अंधकार मिटा देता है।


दोस्तों, आज की दुनिया में नकारात्मकता, चिंता और असंतोष आपको हर जगह साफ़ नज़र आएगा। सोच कर देखियेगा, ऐसे समय में अगर हम दूसरों के जीवन में थोड़ी-सी भी रोशनी ला सकें, तो क्या यह इस दुनिया के लिए अच्छा नहीं रहेगा? मेरी नजर में तो दूसरों के जीवन में रोशनी लाना याने दूसरों के जीवन को बेहतर बनाना ही, जीवन की सबसे बड़ी साधना है। शायद इसीलिए भारतीय दर्शन में किसी गरीब को खाना खिला देना, किसी निराश व्यक्ति को प्रोत्साहन देना, किसी दुखी को सांत्वना देना आदि सब को ईश्वर की आराधना का रूप माना गया है। जब हम किसी की पीड़ा कम करते हैं, तब हम स्वयं भी ईश्वर के और निकट हो जाते हैं।


दोस्तों, एक बात और ध्यान रखियेगा, पुण्य का अर्थ दिखावे का दान या मदद नहीं है। दान का असली अर्थ निस्वार्थ भाव से किया गया अच्छा कार्य है। जब हम बिना किसी अपेक्षा के किसी के लिए कुछ अच्छा करते हैं, तो ब्रह्मांड हमारी झोली में उतनी ही कृपा डाल देता है। यही वो दुआएँ हैं, जो हमें जीवन के तूफानों से बचाती हैं। हमारी और हमारे परिवार की राह आसान करती है, हमारे घरों में सुख-शांति लाती हैं और हमारे मन को स्थिर रखती हैं।


आपने कभी ना कभी, किसी ना किसी को यह कहते हुए सुना होगा, “हमने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में चुनौतियाँ या मुश्किलें क्यों आ रही है?” इस विषय में मेरा मानना है, सिर्फ बुरा न करना ही अनावश्यक चुनौतियों या मुश्किलों से बचने के लिए पर्याप्त नहीं है। जितना जरूरी बुरे कामों से बचना है, उतना ही जरूरी अच्छा करना भी है। पाप या बुरा न करने से मन साफ होता है, पर पुण्य करने से आत्मा उज्ज्वल होती है। इसलिए, आज से यह संकल्प लें — हर दिन किसी न किसी के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाएँगे, किसी का मन हल्का करेंगे क्योंकि ये सब करना ही जीवन का सबसे बड़ा पुण्य है। याद रखियेगा, जो दूसरों के जीवन में प्रकाश लाता है, वही अपने जीवन को भी उजला बना लेता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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