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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

वक़्त कभी थमता नहीं…

Sep 7, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइये साथियों, आज के लेख की शुरुआत हमारी सोच को सकारात्मक और सही दिशा देने वाली एक कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है एक राहगीर अपनी व्यवसायिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए बाज़ार जा रहा था। रास्ते में उसे एक चौराहे पर एक रोता हुआ फ़क़ीर नज़र आया। उसे इस हाल में देख भोले-भाले राहगीर का दिल पसीज गया उसने तुरंत अपना वाहन साइड में लगाया और उस फ़क़ीर के पास जाकर, बड़े प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला, ‘बाबा, क्यों रो रहे हो? क्या किसी परेशानी में हो या भूखे हो? किसी ने आपके साथ मार-पिटाई तो नहीं करी है?’


राहगीर की बात सुनते ही फ़क़ीर एकदम गंभीर हो गये और एक पल शांत रहने के बाद उसी गंभीरता के साथ बोले, ‘बेटा, नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ है। यह सब मेरे मसले नहीं हैं।’ फ़क़ीर का जवाब सुन राहगीर दुविधा में पड़ गया और वह आश्चर्य मिश्रित चिंतित स्वर में बोला, ‘फिर क्या हुआ बाबा? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ।’ राहगीर का प्रश्न सुन फ़क़ीर उसी गंभीरता के साथ बोला, ‘बेटा, मुझे मेरी आत्मा ने आदेश दिया था कि मैं सामान्य लोगों और ईश्वर के बीच में सुलह करवा दूँ। पर लाख प्रयास करने के बाद भी मैं सफ़ल नहीं हो पा रहा हूँ।’


फ़क़ीर का जवाब राहगीर को ज़्यादा समझ तो नहीं आया फिर भी बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘तो क्या हुआ?’ फ़क़ीर बोला, ‘मेरा ईश्वर तो सुलह करने के लिए एकदम राज़ी है पर बंदे मानने के लिए राज़ी नहीं है। ईश्वर तो कह रहे हैं कि ले आ सभी बंदों को मेरी दहलीज़ पर, आस्था और भाव के एक आँसु से इनके सभी गुनाह माफ़ कर दूँगा। लेकिन इस दुनिया में लोग मेरी बात मानने के लिए राज़ी ही नहीं हैं। वे तो इस दुनिया की चकाचौंध से इतने अभिभूत हो गये हैं कि उन्हें इससे प्यारा कुछ और लगता ही नहीं। मैंने इन्हें कई बार समझाने का प्रयास करा है लेकिन ये लोग समझने के स्थान पर मुझे ही भला-बुरा कहने लगते हैं। मुझे इन्हीं लोगों की अक़्ल पर रोना आ रहा है।

फ़क़ीर की ज़्यादातर बातें राहगीर समझ नहीं पाये इसलिए वे उसे नज़रंदाज़ करते हुए आगे बढ़ गये। अगले दिन वही व्यक्ति एक क़ब्रिस्तान के पास से गुजर रहा था। उस दिन भी राहगीर को वही फ़क़ीर क़ब्रिस्तान के बाहर रोते हुए दिख गये। बाबा को यहाँ भी रोता देख राहगीर अचरज में था। वह उनके पास गया और बोला, ‘बाबा, तुम्हारी तो बड़ी अजीब स्थिति है, तुम कल बाज़ार में रो रहे थे और आज यहाँ क़ब्रिस्तान में भी रो रहे हो। आज क्या मसला है?’ फ़क़ीर पूर्णतः गंभीर भाव के साथ बोला, ‘मेरा तो आज भी कल वाला ही मसला है। कल जब मैं ज़िंदा लोगों की सुलह नहीं करा सका तो मैंने सोचा आज इन मृत लोगों और ईश्वर की सुलह करा देता हूँ।’ राहगीर अब थोड़ा पशोपेश में था उसने उलझन भरे स्वर में फ़क़ीर से पूछा, ‘तो फिर आज क्या हुआ?’ फ़क़ीर उसी गंभीरता के साथ बोला, ‘आज ये मृत लोग तो राज़ी हैं लेकिन आज मेरा ईश्वर मानने को राज़ी नहीं है।’


बात तो फ़क़ीर ने बड़ी गहरी कही है, दोस्तों। अक्सर आपने महसूस किया होगा कि हम कुछ लोगों से बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन किसी ना किसी कारण से कह नहीं पाते हैं। असल में किंतु, परंतु, लेकिन के कारण हुई देरी में ही सारा वक़्त हाथ से निकल जाता है। इसलिए साथियों, देर होने से पहले ही जिससे जो कहना हो कह लो। शायद इसी को ध्यान में रख के किसी ने क्या ख़ूब कहा है, ‘मेरे मरने के बाद मेरे यहाँ बैठने आने से बेहतर है थोड़ी देर मेरे साथ बैठ जाओ, क्योंकि अभी मैं हूँ।’ और ‘मरने के बाद तुम लोगों से मेरे बारे में बहुत सारी अच्छी-अच्छी बातें करोगे, लेकिन तब मैं उन्हें सुन नहीं पाऊँगा। इसलिए बेहतर होगा कि तुम वह बातें मुझसे आज करो क्योंकि आज मैं तुम्हारे बीच हूँ।’ यही बात दोस्तों, ग़लतियों के संदर्भ में भी बिलकुल सही बैठती है, ‘अगर तुम कहीं ग़लत हो, तो आज माफ़ी माँग लो क्योंकि कल पता नहीं यह मौक़ा हो ना हो।’ विचार कर देखियेगा ज़रूर…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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