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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

विरोधियों से मनचाहा काम करवाने का सूत्र…

Jan 13, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, कई लोगों का मानना है कि बिना चिढ़े, बिना चिल्लाए, बिना नाराज़ हुए अधीनस्थों से कार्य करवाना असंभव ही है। इसलिए वे मान कर चलते हैं कि संस्था प्रमुख या अधिकारी कभी भी कोमल स्वभाव का हो ही नहीं सकता है। जबकि मेरा मानना बिलकुल इसके उलट है। मुझे तो बल्कि ऐसा लगता है कि प्यार, सम्मान, समान भाव से हम अधीनस्थ को तो छोड़िए, विरोधियों से भी मनमाफिक कार्य करवा सकते हैं। अपनी बात को मैं आपको एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ।

बात कई साल पुरानी है, एक बार गजेंद्रपुर के राजा के सपने में एक परोपकारी साधु आया और बोला, ‘बेटा, कल अर्द्ध रात्रि को तुम्हें महल के पश्चिम द्वार के पास वाले पेड़ के तने में रहने वाला एक विषैला साँप काटेगा। जिसकी वजह से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए कल दिन में तुम अपने सभी अधूरी कार्य पूर्ण कर लो। असल में वह साँप तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।’


‘आत्मरक्षा के लिए क्या किया जाए?’ यह सोचते-सोचते कब सुबह हो गई, राजा को पता ही नहीं चला। अंत में उसने निर्णय लिया कि अगर मेरे पूर्व कर्मों का फल मुझे इस तरह मिलना है, तो उसे कोई बदल नहीं पाएगा। इसलिए व्यर्थ में इस जन्म में एक नई शत्रुता क्यों मोल ली जाए? मैंने अपने इस जन्म में पूरी तरह से जीवन मूल्यों का पालन किया है, इसलिए मैं अंत समय में कोई ऐसा कार्य नहीं करूँगा, जो मेरे पूरे जीवन की मेहनत को नुक़सान पहुँचा दे। मेरे जीवन मूल्य कहते हैं कि ‘अतिथि देवो भव!’ इसलिए मैं तो उस सर्प के साथ अतिथि समान मधुर व्यवहार करूँगा। वैसे भी कहा गया है कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर है ही नहीं।’


शाम होते-होते राजा ने सपने में परोपकारी साधु द्वारा बताए गए पेड़ की जड़ से लेकर, अपनी शय्या तक, फूलों का बिछौना बिछवा दिया। इसके पश्चात उन्होंने पूरे रास्ते में सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया और जगह-जगह मीठे दूध के कटोरे रखवा दिए। इसके पश्चात उन्होंने सेवकों को आदेश दिया कि रात को जब इस रास्ते से सर्प निकले तो कोई भी उसे किसी भी तरह से कष्ट ना पहुंचाये।


रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनंदित होता जा रहा था। शायद पहली बार किसी ने उसके आगमन को इतना मनमोहक और आरामदायक बनाया था। वह कोमल बिछौने पर मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन और जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। हर बीतते पल के साथ क्रोध का स्थान अब संतोष और प्रसन्नता का भाव लेता जा रहा था। इसी तरह चलते-चलते वह राजमहल के द्वार तक पहुँच गया। वहाँ हथियार बंद प्रहरियों को देख वह सचेत हो गया। परंतु एक भी प्रहरी या सशस्त्र द्वारपाल ने उसे हानि पहुंचाने की कोशिश नहीं करी। इस असाधारण कृत्य से साँप के मन में स्नेह उमड़ने लगा। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया था।


उसके लिए अब राजा को डसना असंभव सा होता जा रहा था। वह सोच रहा था कि जिसे मैं हानि पहुंचाने के लिए आया था वह मेरे साथ ऐसा मधुर व्यवहार कर रहा है। इस वजह से वह दुविधा में पड़ गया। राजा के पलंग तक पहुँचते-पहुँचते साँप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया था। तय समय से कुछ देरी से साँप राजा के कक्ष में पहुँचा। राजा ने तुरन्त उठकर उसे प्रणाम करा और ख़ुद को उसके समक्ष समर्पित कर दिया। राजा का व्यवहार देख साँप बोला, ‘राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया।अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूँ। मित्रता के उपहार स्वरूप मैं तुम्हें अपनी बहुमूल्य मणि दे रहा हूँ। इतना कहकर साँप ने मणि राजा को सौंपी और वहाँ से वापस चला गया।


दोस्तों, यक़ीन मानियेगा ‘ऐसा कोई होता है’ का भाव देने वाली यह कहानी असल में हम सभी के जीवन की सच्चाई है। अभी तक बस हमने इसका प्रयोग अपने जीवन में नहीं किया है इसलिए हमें यह असंभव सी लग रही है। यकीनन अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को भी सरल बनाने का उपाय रखता है। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है।

-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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