• Nirmal Bhatnagar

बच्चों को विपरीत परिस्थितियों में बढ़ाना हो आगे तो करें यह…

Updated: Aug 11

Aug 10, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, काउन्सलिंग के पिछले कुछ वर्षों के अनुभव में मैंने बच्चों की सोच में एक बड़ा परिवर्तन देखा है। आजकल बच्चे किसी भी चीज़ को पाना बहुत आसान मानते हैं। फिर चाहे वह अच्छे कॉलेज में प्रवेश पाना हो या अच्छा कैरियर बनाना हो या फिर विलासिता पूर्ण जीवन जीना हो। लक्ष्य कोई भी क्यूँ ना हो, उन्हें सब कुछ बहुत आसान लगता है। अगर आप इन्हीं बच्चों से इसे पाने की योजना के बारे में चर्चा करेंगे, तो आप पाएँगे कि वे इस विषय में भी अच्छी व सही जानकारी रखते हैं और उस योजना पर पहले से कार्य भी कर रहे हैं। यहाँ तक तो सब ठीक है दोस्तों, लेकिन इसी लक्ष्य को पाने में जब इन बच्चों के समक्ष कोई दिक़्क़त, परेशानी, विपरीत परिस्थिति या चुनौती आती है तो यह कुछ भी तर्क देकर अपना लक्ष्य बदल लेते हैं। सीधे शब्दों में कहा जाए तो विपरीत परिस्थितियों में गुजरते समय के साथ इन बच्चों के लक्ष्य बदल जाते हैं।


अगर इन लक्ष्यों को बदलने का कारण बच्चों की पसंद या नैसर्गिक प्रतिभा के विपरीत होना है, तो कोई दिक़्क़त नहीं है। लेकिन उसे मुश्किल या अत्यधिक कॉम्पिटिशन भरा मान बीच में छोड़ना कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन दोस्तों, इसमें सोचने वाली मुख्य बात यह है कि बच्चों में आए इस बदलाव के लिए ज़िम्मेदार कौन है? बच्चे या हम अर्थात् पालक या फिर शिक्षा…


मेरी नज़र में तो दोस्तों, इसके लिए निश्चित तौर पर हम और शिक्षण प्रणाली ही ज़िम्मेदार है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यूँकि हर बच्चा हमें कोरी कॉपी के रूप में मिलता है। इस कोरी कॉपी पर हम जो भी या जैसा भी लिखते हैं, वह बच्चे की सोच, व्यवहार और नज़रिए के रूप में भविष्य में हमारे सामने आता है। अगर बच्चा विपरीत परिस्थितियों से लड़ रहा है तो भी उसका श्रेय हमें जाता है और अगर बच्चा विपरीत परिस्थितियों या चुनौतियों से भाग रहा है, तो भी उसके ज़िम्मेदार हम ही हैं। अगर आप गहराई से सोचकर देखेंगे तो आप पाएँगे कि हमारा बच्चों की परवरिश का तरीक़ा और शिक्षण प्रणाली दोनों ही इस दुनिया की वास्तविकता से काफ़ी दूर या अलग है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमारी परवरिश और शिक्षा उसे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार नहीं कर पा रही है और जब उस बच्चे का सामना हक़ीक़त से होता है तो उसे उन परिस्थितियों से भागना एक आसान विकल्प के रूप में दिखता है।


दोस्तों, अगर आप इस समस्या से बच्चों को बचाना चाहते हैं तो सबसे पहले बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा और बाज़ार की हक़ीक़त या ज़रूरत को एक समान बनाने का प्रयास करना होगा। इसके साथ ही हमें बच्चों को सिखाना होगा कि जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों या चुनौतियों से कैसे निपटा जाए। वैसे इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए आप उसे अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के समान ही बच्चों को समस्याओं को पहचानने का ‘चॉप’ तरीक़ा या फ़ॉर्म्युला सिखा सकते हैं।


विपरीत परिस्थितियों या चुनौतियों के प्रकार को ‘चॉप’ तरीके से पहचान कर, दूर करने के लिए हमें पहले ‘चॉप’ याने सी॰एच॰ओ॰पी॰ के अर्थ को समझना होगा। यहाँ सी-चैलेंज, एच-हर्डल, ओ-आब्स्टकल एवं पी-प्रॉब्लम को प्रदर्शित करता है। हमें बच्चों को सिखाना होगा की जीवन में जब भी विपरीत परिस्थितियों से सामना हो सबसे पहले उन्हें चैलेंज, हर्डल, आब्स्टकल एवं प्रॉब्लम के आधार पर वर्गीकृत करें और फिर वर्गीकरण के आधार पर उसका समाधान करें। तो चलिए एक बार इन सभी को हम थोड़ा विस्तार से समझ लेते हैं-


चैलेंज - बच्चों को सिखाएँ कि शिक्षा के पहले स्तर पर हम सिर्फ़ जानकारी एकत्र करते है। जब आप इन जानकारियों को जीवन में काम में लेना शुरू करते हैं, तब आपके समक्ष विपरीत परिस्थितियाँ आती है। अगर विपरीत परिस्थिति चुनौती या चैलेंज के रूप में है तो उसे स्वीकारें क्यूँकि चुनौतियाँ आपको विकास की ओर ले जाती हैं। चुनौतियाँ आपके कौशल को सुधारने का मौक़ा देकर आपको बेहतर बनाती है। मेरी नज़र में तो ‘चुनौती’ बेहद ही सकारात्मक शब्द है। जब आप अपने अंदर चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करते हैं, तब आप अपने जीवन को नए आयाम की ओर ले जाते हैं, अपने जीवन में नयापन लाने के साथ सकारात्मक परिवर्तन कर पाते हैं।

हर्डल - कई बार विपरीत परिस्थितियाँ आपके सामने हर्डल के रूप में आती हैं। हर्डल वैसे तो एक नकारात्मक शब्द है, पर हमेशा इससे बचे रहना सम्भव नहीं है। हर्डल आपके कार्य को एक पल अर्थात् न्यूनतम समय में प्रभावित करता है और साथ ही इसका प्रभाव अस्थायी और छोटा होता है। इसलिए इससे तत्काल निपटें।


आब्स्टकल - जब भी आपके समक्ष विपरीत परिस्थितियाँ या समस्या आब्स्टकल के रूप में आए, तो सबसे पहले उसे 360 डिग्री के नज़रिए से देखें, उसके हर पहलू पर विचार करें। चूँकि आब्स्टकल नकारात्मक प्रभाव वाले होते हैं, इसलिए इन्हें तत्काल दूर करना आवश्यक होता है। जब भी आब्स्टकल आए निम्न दो उपाय काम में लें। पहला, अगर उन्हें दूर करना सम्भव है तो तत्काल उसे योजनाबद्ध तरीके से दूर करें। दूसरा, अगर आप उसे दूर करने में सक्षम नहीं है तो उन्हें दरकिनार कर जीवन में आगे बढ़ें। सामान्यतः आब्स्टकल अस्थायी होता है, जैसे, राजनैतिक हस्तक्षेप।


प्रॉब्लम - प्रॉब्लम अर्थात् समस्या मेरी नज़र में एक तटस्थ शब्द है। अर्थात् यह ना तो सकारात्मक है और ना ही नकारात्मक। जब आप प्रॉब्लम को नज़रंदाज़ करते हैं तो उसका प्रभाव अलग होता है और जब आप उस पर तत्काल काम करते हैं तब अलग। इसलिए बच्चों को प्रॉब्लम का समाधान तुरंत करना सिखाएँ। प्रॉब्लम अर्थात् समस्या का समाधान करना सामान्यतः पुरानी स्थिति को बहाल करने के समान होता है। इसके लिए बहुत ज़्यादा नवाचार या सुधार करने की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे हमारे 2/4 व्हीलर के ख़राब होने पर मैकेनिक से उसे दुरुस्त करवा कर पुरानी स्थिति को बहाल करना।


दोस्तों, जब आप शिक्षा में चॉप पद्धति जैसे तरीके या विषय सिखाना जोड़ देते हैं तो आप शिक्षा को जीवन से जोड़कर देना शुरू कर देते हैं और बच्चों को जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटकर जीवन जीने के लिए तैयार करते हैं। बच्चों की परवरिश और शिक्षा के विषय में दोस्तों एक बात हमेशा याद रखें, इसका उद्देश्य अच्छे नम्बर लाना नहीं अपितु जीवन के लिए तैयार करना है। आशा करता हूँ उपरोक्त तरीक़ों का प्रयोगकर आप बच्चों को अपना जीवन बेहतर बनाने में मदद करेंगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com


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