श्रद्धा है तो सब संभव है…
- Nirmal Bhatnagar

- Jun 19, 2025
- 3 min read
June 19, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

दोस्तों, कहते हैं, “भगवान को देखने के लिए आँखों की नहीं बल्कि, मन में श्रद्धा की जरूरत होती है।” जब मन सच्ची आस्था से जुड़ता है, तो हर वस्तु; हर मूर्ति; हर इंसान में प्रभु के दर्शन होते हैं, हर शब्द में भक्ति की शक्ति होती है। इसीलिए कहा जाता है, “भक्ति केवल तर्क या प्रमाणों से नहीं, बल्कि अटल विश्वास से जन्म लेती है।” आइए एक सच्ची श्रद्धा से भरी कहानी से हम जीवन को बदलने वाली इस सोच को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं।
कई साल पूर्व एक संत अयोध्या में राम कथा याने रामायण पर प्रवचन दे रहे थे। उनके इस प्रवचन को सुनने सैंकड़ों श्रद्धालु आया करते थे। कथा कहने का उनका लहजा इतना जीवंत होता था कि हर श्रद्धालु भक्ति रस में डूब जाया करता था। संत प्रतिदिन कथा की शुरुआत भगवान हनुमान जी के आह्वान के साथ यह कहते हुए करते थे, “आइए हनुमंत जी बिराजिए!” संत के लिए हनुमान जी को आमंत्रित करना केवल एक रीत नहीं थी, बल्कि उनकी आस्था और भावनाओं का आह्वान था।
लेकिन दोस्तों, जहाँ भक्ति होती है, वहाँ अक्सर तर्क के साथ टकराव भी होता है। एक दिन रोज़ की ही तरह कथा में आने वाले एक वकील ने संत से प्रश्न पूछते हुए कहा, “गुरुजी क्या यहाँ हनुमान जी प्रतिदिन कथा सुनने आते हैं?” संत ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “ऐसा मेरा विश्वास है!” संत का जवाब सुनते ही वकील ने उनसे प्रमाण माँग लिया। इस पर संत ने उसे प्रेम से समझाते हुए कहा, “वत्स! यह विषय प्रमाण का नहीं श्रद्धा का है। इस वक्त तुम्हारे भीतर की तर्कशील प्रवृति तुम्हारे ऊपर भारी पड़ रही है इसलिए तुम इसे समझ नहीं पा रहे हो।”
संत के इतना समझाने के बाद भी वकील नहीं माना। अंत में संत बोले, ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या…’ ऐसा करते हैं आज की कथा के पश्चात आप हनुमान जी के आसन को अपने घर ले जाना और फिर कल कथा के समय लेकर आना। फिर कथा की शुरुआत में मैं रोज़ की ही तरह हनुमान जी का आह्वान करूँगा और कथा कहना शुरू करूँगा। उस दौरान तुम उस आसन को उठाने का प्रयास करना। अगर तुम उठा पाये तो वहाँ हनुमान जी नहीं हैं और अगर वहाँ हनुमान जी होंगे तो तुम आसान को उठा ना सकोगे।”
वकील संत के इस उपाय पर तुरंत राजी हो गया और प्रवचन के पश्चात आसन घर ले गया और अगले दिन कथा पंडाल में वापस लाया। उस दिन पूरा पांडाल ;श्रद्धा की परीक्षा’ देखने के लिए भर गया। संत ने सजल नेत्रों से, रोज़ की ही तरह कहा, “आइए हनुमानजी पधारिए और आसान पर विराजिये!" उनके इतना कहते ही वातावरण भावनाओं से भर उठा और संत ने कथा कहना शुरू कर दिया।
कथा के दौरान वकील ने तीन बार आसन उठाने की कोशिश करी। लेकिन चमत्कार तो तब हुआ जब वो आसान को छू भी ना सका। ऐसा लग रहा था मानो उसके हाथ जैसे रुक गए हों। उस क्षण उसका शरीर कांपने लगा और वह पसीने से भीग गया। अंत में वकील संत के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “मैं हार गया महाराज, अब मुझे दीक्षा दीजिए।”
दोस्तों, यह घटना केवल किसी चमत्कार की कहानी नहीं है। यह बताती है कि जहां सच्चा भाव होता है, वहां ईश्वर स्वयं उपस्थित होते हैं। याद रखियेगा, श्रद्धा कोई दिखावा नहीं, बल्कि हृदय की गहराई से निकलने वाली आह्वान की शक्ति है। प्रभु मूर्ति में नहीं बसते, वे बसते हैं भक्त के मन में, उसकी सच्ची पुकार में। तो मित्रों, यदि आप जीवन में प्रभु को पाना चाहते हैं, तो तर्क से नहीं, विश्वास से रास्ता बनाइए। आस्था के दीपक जलाइए, और देखिए कैसे हर गद्दी पर प्रभु पधारते हैं क्योंकि श्रद्धा है तो सब संभव है और मानो तो देव है और ना मानो तो पत्थर।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




Comments