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संतुलित इच्छाओं के साथ जिएँ और ख़ुश रहें!!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Feb 2, 2025
  • 3 min read

Feb 2, 2025

दोस्तों, आज मैं आपसे थोड़ा अलग विषय पर चर्चा करना चाह रहा हूँ, जो शुरू में आपको थोड़ा मजाकिया या फालतू का विषय लग सकता है। लेकिन यकीन मानियेगा यह विषय हक़ीक़त में जीवन के गहरे सवालों की ओर इशारा करता है। आप इस दुनिया में किसी से भी बात करके देख लीजिए हर इंसान आपको धनी बनने की होड़ में नजर आएगा। तो फिर क्या इसका अर्थ यह है कि अभी सब लोग दरिद्र हैं? शायद नहीं! तो फिर इस संसार में दरिद्र कौन है और धनवान कौन?


दोस्तों, उपरोक्त प्रश्न एक ऐसा प्रश्न है, जो सुनने में सीधा लगता है, लेकिन इसका उत्तर बहुत गहरा है। इसे समझने के लिए हमें अपने भीतर झाँकना होगा और जीवन के मूल तत्वों पर विचार करना होगा। जहाँ तक मेरी समझ बोलती है, दरिद्रता और धनी होने का संबंध कहीं भी धन-दौलत से नहीं है। मेरी नजर में तो यह दोनों स्थितियां मानसिक हैं। चलिए, प्रश्नों या संकेतों में बात करने के स्थान पर सीधे-सीधे विषय पर चर्चा करते हैं।


दोस्तों, दरिद्रता का अर्थ सिर्फ धन की कमी नहीं है। असली दरिद्र वही व्यक्ति है, जिसकी इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ इतनी अधिक होती हैं कि वह कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। उसकी इच्छाएँ इतनी विशाल होती हैं कि यदि उसे पूरा समुद्र भी दे दिया जाए, तो भी वह कहेगा, ‘मुझे और चाहिए।’ इसके विपरीत जो व्यक्ति जो है उसमें संतुष्ट हो जाता है, वही धनी है। सहमत ना हो, तो किसी भी अति महत्वाकांक्षी और इच्छाओं से भरे व्यक्ति की तुलना उस व्यक्ति से करके देख लीजिएगा, जो अपने मन में संतोष रखता है। यकीनन साथियों, जो व्यक्ति संतुष्ट रहना जानता है, वह कभी यह सोचता ही नहीं कि कौन धनवान है और कौन निर्धन। वह अपनी मस्ती में जीता है और अपने जीवन को सुखी मानता है।


यकीन मानियेगा दोस्तों, इस दुनिया में वास्तव में हमारी आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। लेकिन इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ ऐसी चीजें हैं, जो कभी पूरी हो ही नहीं सकती। यहाँ तक कि उस राजा की भी जो पूरी दुनिया पर राज करता हो। याने जिस राजा के पास या जिसके पास पूरा संसार हो, वह भी शांति का अनुभव नहीं कर सकता। उसे भी कुछ और पाने की इच्छा बनी ही रहती है। इसलिए यह माना जाता है कि महत्वाकांक्षाएँ जितनी अधिक होती हैं, दरिद्रता उतनी ही बढ़ती जाती है। जहां संतोष होता है, वहां सुख और शांति का वास होता है। लेकिन जहां इच्छाएँ और लालच होते हैं, वहां अशांति और दरिद्रता का जन्म होता है।

अब सवाल यह उठता है कि इस दरिद्रता से बचा कैसे जाए? इसका उत्तर है, आप ज्ञान और संतोष के साथ इससे बच सकते हैं। जीवन का ज्ञान हमें सिखायेगा कि अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना ही, असली सुख है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर काबू पाना शुरू कर देता है, वह दुनिया में सबसे सुखी व्यक्ति बन जाता है। लेकिन इसके विपरीत अगर आपके मन में अत्यधिक इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ हैं, तो कोई भी आपका साथ नहीं दे सकता याने कोई भी आपको शांति और संतुष्टि नहीं दे सकता। इसलिए ही मैंने पूर्व में कहा था कि ज्यादा महत्वाकांक्षाएँ दरिद्रता की सबसे बड़ी निशानी हैं।


दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य, अपने जीवन को सच्चे अर्थों में समृद्ध बनाना है, तो मेरा सुझाव है कि अपनी इच्छाओं को सीमित करें; उन पर लगाम लगाएँ और अपने जीवन में संतोष को अपनाएँ। याद रखियेगा साथियों, जीवन का असली सुख न तो धन में है और न ही भौतिक वस्तुओं में। असली सुख उस शांति में है, जो केवल संतोष और संतुलित इच्छाओं से प्राप्त होती है। इसलिए ही कहा जाता है, 'संतोषी सदा सुखी!!!'


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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