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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

संबंधों को बनाना हो मज़बूत तो अपनाएँ यह सूत्र…

Feb 13, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, जीवन में कई घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो कई बार हमारे मन में ईश्वर की योजना के प्रति संशय पैदा करती हैं। हमारे मन में प्रश्न पैदा करती है कि आख़िर ईश्वर ने हमारे लिए इसमें क्या अच्छा देखा होगा? लेकिन दोस्तों यही वह समय होता है जब आप जीवन की हक़ीक़त को समझ पाते हैं; जीवन की सच्चाइयों को क़रीब से देख पाते हैं। इस बात का एहसास मुझे रिश्तेदारी में घटी एक घटना के दौरान उस वक़्त हुआ, जब मैंने एक ही परिवार के दो सदस्यों को उस वक़्त लड़ते-झगड़ते या विवाद करते हुए देखा जब उन्हें एक -दूसरे का सहारा बनकर, एक साथ खड़े रहना चाहिये था।


एक ओर वहाँ मौजूद लोग इसे ‘जीवन की सच्चाई’ कहकर बात ख़त्म कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर मेरे मन में रिश्तों को नुक़सान पहुँचाने वाली बातों की सूची तैयार हो रही थी। काफ़ी मंथन करने के बाद मुझे सबसे मुख्य रूप से एक ही बात समझ आई, जब तक विश्वास है, तभी तक रिश्ता है। जिस दिन विश्वास ख़त्म, रिश्ता ख़त्म। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि विश्वास आपसी प्रेम को खंडित करता है, जिसके कारण मज़बूत से मज़बूत परस्पर संबंधों की दीवार में भी दरार आ जाती है।

इसीलिए दोस्तों, मैंने मज़बूत आपसी संबंधों के लिए आपसी विश्वास को प्रथम और महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया है। विश्वास की ईंट जितनी मज़बूत होगी, आपसी संबंधों की दीवार भी उतनी ही मज़बूत और टिकाऊ बन पाएगी। इस आधार पर कहा जाए तो विश्वास ही संबंधों को प्रेमपूर्ण बनाता है।


दोस्तों, अब मुख्य सवाल आता है कि आख़िर यह आपसी विश्वास, जो पहले था, अचानक ही किस वजह से कम हो गया? अब आप सोच रहे होंगे कि मुझे कैसे मालूम पड़ा कि पहले रिश्तों में आपसी विश्वास था, तो मैं सबसे पहले यही दोहराऊँगा कि विश्वास के बिना तो रिश्ता बन ही नहीं सकता है और यह टूटना उस वक़्त प्रारंभ होता है जब आप ‘क्या सही है’ के स्थान पर ‘मेरे लिये क्या सही है’ के आधार पर निर्णय लेना शुरू कर देते हो। अर्थात् जब आपस में होने वाली हर बात या घटना का मूल्यांकन स्वयं की दृष्टि से करने लगते हैं और सामने वाले के नज़रिए को बार-बार नज़रंदाज़ करने लगते हैं तो वहाँ अविश्वास उत्पन्न होने लगता है।


इस आधार पर कहा जाए तो आपसी विश्वास को बचाने और रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए, सर्वप्रथम हमें यह स्वीकारना होगा कि यह ना तो आवश्यक है और ना ही संभव है कि हमारे द्वारा किया गया मूल्यांकन और उसे करने के लिए अपनाया गया नज़रिया हर बार सही हो। इसलिए संबंधों की मधुरता को बनाये रखने या उसे और प्रगाढ़ बनाने के लिए हमें अपने दृष्टिकोण याने नज़रिए के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं और उसके दृष्टिकोण याने नज़रिए को समझने का गुण अपने अंदर विकसित करना होगा।


संबंधों को मज़बूत बनाये रखने के लिए हमें एक और बात हमेशा याद रखना चाहिये, एक दूसरे के बारे में बात करने के स्थान पर एक दूसरे से बात करो। साथ ही एक और बात हमेशा याद रखो कि संबंधों को जोड़ना महत्वपूर्ण नहीं है अपितु संबंधों को निभाना महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधों का जुड़ना एक बार को संयोग हो सकता है, लेकिन संबंधों को जीवन भर बनाए रखना नहीं। उसके लिए तो आपको स्वीकारना होगा कि संबंधों को निभाना जीवन की एक साधना ही है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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