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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग!

Apr 25, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, खुद को ज्ञानी, समझदार और सही सिद्ध करने के लिए बार-बार प्रतिक्रिया देना एक ऐसी आदत है जो हर हाल में सिर्फ़ और सिर्फ़ आपका नुक़सान करती है। यह स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब आप बार-बार प्रतिक्रिया देने वाले इंसान की बातों पर प्रतिक्रिया देने लग जाते हैं। याद रखिएगा, इस दुनिया में तो जितने लोग हैं उतने ही मुँह है, ऐसे में सबकी सुन कर प्रतिक्रिया देने या जीवन जीने लग जाएँगे तो इस जीवन का सही लुत्फ़ उठा ही नहीं पाएँगे। इसीलिए कहा गया है, ‘सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग!’


मेरा तो मानना है, आप कुछ भी क्यूँ ना कहिए या करिए , कोई ना कोई कहीं ना कहीं होगा ही, जो उसका विरोध करेगा। ठीक इसी तरह कोई ना कोई कहीं ना कहीं ऐसा भी होगा जो उसका समर्थन करेगा। दोनों ही स्थितियों में सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि उपरोक्त दोनों में से कोई भी ना तो आपको सफल बना पाएगा और ना ही आपकी सफलता को आपसे छीन पाएगा। इसका अर्थ हुआ, आपकी सफलता या असफलता अथवा सुख या दुःख, लोगों की आपके बारे में दी हुई प्रतिक्रियाओं का नतीजा नहीं अपितु आपके किए गए कर्मों का परिणाम होते है।


दूसरी नज़र से देखा जाए तो एक बात तो निश्चित तौर पर कही जा सकती है, स्वयं को सुखी और सफल बनाने के लिए खुद को ज्ञानी, समझदार और सही बताने या सिद्ध करने के लिए शब्द नहीं, कर्म याने काम करने की आवश्यकता है और हर परिस्थिति में कार्य तब ही किया जा सकता है जब आपकी मनःस्थिति अच्छी हो। वैसे भी सही मनःस्थिति जीवन को लेकर आपकी कई धारणाओं को ध्वस्त करती है। जैसे सुख-दुःख या सफलता-असफलता का अमीरी-ग़रीबी से कोई लेना नहीं है क्योंकि अगर मनःस्थिति अच्छी नहीं होगी तो पैसा या सफलता होने और महलों में रहने के बाद भी आप दुखी हो सकते हो; रोते हुए अपना जीवन जी सकते हो और इसके ठीक विपरीत आप शांत चित्त याने अच्छी मनःस्थिति में हैं तो आप ग़रीबी के साथ झोपड़ी में रहते हुए भी सुखी और खुश रह सकते है याने हँसते हुए अपना जीवन जी सकते हैं।


इसलिए दोस्तों तर्कों के आधार पर प्रतिक्रिया देने और दूसरे पर प्रतिक्रियात्मक विजय प्राप्त करने से तात्कालिक ख़ुशी, शांति और सुख तो मिल सकता है। लेकिन आपका पूरा जीवन सुख, शांति और चैन से नहीं बीत सकता। इसलिए अगर आपका लक्ष्य पूरे जीवन को सुख, शांति और चैन से बिताते हुए सफल होना है तो तर्क, वितर्क और कुतर्क के आधार पर प्रतिक्रियाओं में उलझने के स्थान पर लोगों को उनकी कमियों के साथ स्वीकारना सीखिए और अच्छे और सच्चे दिल के रिश्ते बनाइए।


हो सकता है आपमें से कुछ लोगों को मेरी बात असम्भव या व्यवहारिक ना लग रही हो, तो मैं आपको आगे बढ़ने से पहले ही बता दूँ कि यह थोड़ा मुश्किल ज़रूर हो सकता है, लेकिन असम्भव नहीं है क्यूंकि ऐसा करने के लिए आपको अपनी सोच, अपने नज़रिए, अपने काम करने के तरीके में परिवर्तन लाना होगा। वैसे भी साथियों, इस दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं है। असम्भव शब्द तो केवल कायरों के लिए बना है, ज्ञानी और समझदार व्यक्ति तो हर हाल, हर परिस्थिति में अपने जीवन को बेहतर बनाने का रास्ता तलाश ही लेते हैं।


तो आईए दोस्तों, आज से कौन, कब, कहाँ और कैसे बदल गया सोचने और उस पर प्रतिक्रिया देने के स्थान पर सोचना शुरू करते हैं कि वो हमको क्या दे गया और क्या सिखा गया। इसके लिए हमको इंसान को इंसान की नज़र से देखना और तोलना होगा और साथ ही कम ही सही लेकिन दो शब्द प्यार से बोलना होगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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