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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

समय सदा एक सा नहीं रहता…

Jan 31, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, समय सदा किसी का भी एक सा नहीं रहता। यह एक ऐसा सत्य है जिसे जितनी जल्दी स्वीकार लिया जाए; अच्छा है। अन्यथा यह आपके अंदर अहम् या अहंकार को जन्म दे सकता है। उक्त बात मुझे इस रविवार उस वक़्त याद आई, जब मैं अपने एक बहुत पुराने परिचित से लंबे समय बाद मिला जो अब एक सफल और बड़ा अधिकारी बन चुका था। उसकी सफलता की कहानी वाक़ई अद्भुत थी क्योंकि उसने तमाम विषमताओं और पारिवारिक विपरीत स्थितियों में इसे पाया था। अपनी बात को मैं आपको उसी युवा की कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ।


बात लगभग ३० वर्ष पुरानी याने उस समय की है जब मैंने शिक्षा के साथ अपना व्यवसाय शुरू ही किया था। एक दिन मेरे पास उपरोक्त अधिकारी जो उस वक़्त युवा छात्र था, आया और बोला, ‘निर्मल भैया, कोई जॉब या काम मिल सकता है क्या?’ उसका प्रश्न सुन मैं आश्चर्यचकित था क्योंकि उसके पिता एक प्रतिष्ठित सरकारी अधिकारी थे और उनका हमारे आस-पास के इलाक़े में काफ़ी मान-सम्मान था। जब मैंने उसे इस विषय में विस्तार से बताने के लिए कहा तो वह थोड़े संकोच के साथ मुझसे बोला, ‘भैया, मेरा सिलेक्शन इंजीनियरिंग के लिए हो गया है। लेकिन पिताजी ने फ़ीस भरने से यह कहते हुए मना कर दिया है कि ‘मैं इतनी फ़ीस भरने में सक्षम नहीं हूँ और दूसरी बात लोग बिना शिक्षा लिए भी जीवन में सफल हो जाते हैं। अगर तुम में दम होगा तो तुम भी बिना इंजीनियरिंग करे सफल हो जाओगे और अगर मेरी बात से सहमत नहीं हो, तो ख़ुद के बल पर करके दिखाओ।’


उनके पिता का जवाब सुन मैं आश्चर्यचकित था क्योंकि उनकी लाइफ़स्टाइल और आमदनी को देख कोई भी अंदाज़ा लगा सकता था कि वे बच्चे की फ़ीस आराम से भर सकते थे। अपनी ओर से सहायता करने के पश्चात जब मैंने इस विषय को गहराई से समझने का प्रयास किया तो मुझे पता चला कि उन्होंने बच्चे की फ़ीस ना भरने का निर्णय सिर्फ़ इसलिए लिया था ताकि वे परिवार के अन्य सदस्यों को यह जता सकें कि उनके बिना उनके परिवार का काम नहीं चल सकता है। दरअसल उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं था कि वे झूठे अभिमान की आड़ में अपनी ज़िम्मेदारियों और बच्चे के भविष्य को नज़रंदाज़ कर रहे हैं; उसके साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।


चूँकि मैं उस परिवार के काफ़ी नज़दीक था अर्थात् उस परिवार के साथ अच्छा रिश्ता साझा करता था, इसलिए एक दिन मौक़ा पाकर मैंने उस बच्चे के पिता से इस विषय में अलग से चर्चा करी और उन्हें बताया कि उनका बेटा अब पढ़ाई के साथ पैसे कमाने के लिए काम भी कर रहा है। मेरी बात सुन वे एकदम उत्तेजित हो गये और थोड़ा थोड़ा ग़ुस्से में बोले, ‘मैं दिनभर कमाकर जो पैसे लाता हूँ, उसी से घर चलता है और यह लोग ऐश करते हैं। मेरे बिना इनका भूखे मरना तय है। अभी चार दिन में अक़्ल ठिकाने आ जाएगी।’ हालाँकि मैं उम्र में उनसे काफ़ी छोटा था, पर उनके अभिमान को अहम् या अहंकार में परिवर्तित होता देख अनायास ही बोल पड़ा, ‘दुनिया में किसी के बिना, किसी का काम नहीं रुकता। यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।’ मेरी बात सुन वे भड़क गए और नाराज़ होकर वहाँ से चले गए।


इस घटना के कुछ ही दिनों बाद उनका ट्रांसफ़र दूसरे शहर में हो गया और परिवार दो हिस्सों में बँट गया। पिता अपने अहंकार में मस्त थे इसलिए अपने परिवार को अधर में छोड़ अकेले ही नये शहर में बस गये और माँ ने विपरीत परिस्थितियों में दूसरों के कपड़े सिलकर, साड़ी में फॉल-पिको लगाने का कार्य कर, अपनी ज़िम्मेदारी निभाना शुरू कर दिया।


बदलते वक़्त के साथ आज बच्चा तो अपनी मेहनत के बल पर अधिकारी बन गया था और अपनी माँ और बहन का अच्छे से ख़्याल रख रहा था और दूसरी ओर पिता अब रिटायर होकर सबके बीच में होने के बाद भी अकेलेपन के बीच अपना बुढ़ापा काट रहे थे। जब मैं उनसे उनके घर जाकर मिला तो उन्होंने रुँधे हुए गले से अपनी स्थिति एक ही साँस में कह सुनाई। जब मैंने उनके बेटे याने उस युवा अधिकारी से इस विषय में बात करी तो उसका कहना था, ‘भैया मैंने उन्हें कम से कम अकेला तो नहीं छोड़ा है। मैं अपनी ज़िम्मेदारी तो अच्छे से निभा रहा हूँ। कृपया आप इस विषय में मुझे कुछ मत बोलिए।’


दोस्तों, निश्चित तौर पर उन सज्जन का सारा अभिमान या यूँ कहूँ अहंकार और अहम् बच्चे की बात सुन चूर-चूर हो गया होगा। आज वे भी सोच रहे होंगे कि यह संसार या समय कभी भी किसी के लिए नहीं रुकता। यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। जगत को चलाने की हुंकार भरने वाले बडे बडे सम्राट; मिट्टी हो गए और जगत उनके बिना भी चला है। इसलिए अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है और सेवा सर्वोपरी है। इसलिए साथियों, अभिमान हो या अहम् या फिर अहंकार सभी को त्याग कर जीना ही लाभप्रद है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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