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समस्याओं को नज़रंदाज़ ना करें…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Oct 2, 2022
  • 3 min read

Oct 02, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आईए आज के शो की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। दस वर्षीय राज रोज़ अपने पिता के साथ सुबह सैर पर ज़ाया करता था। एक दिन राज ने अपने पिता से कहा, ‘पिताजी क्यों ना हम आज रेस लगाएँ, जो पहले पहाड़ की चोटी पर पहुँचेगा वही विजेता होगा। पिता ने मुस्कुराते हुए राज की चुनौती को स्वीकार कर लिया।


दूरी और पहाड़ी चढ़ाई को देख शुरुआत में दोनों ने धीरे-धीरे दौड़ना प्रारम्भ किया। कुछ देर तक दौड़ने के बाद पिता के अचानक रुकने पर राजू बोला, ‘क्या हुआ पिताजी, आप रुक क्यों गए? क्या आप अभी से थक गए हैं या आपने हार मान ली है।’ पिता पूरी ऊर्जा के साथ बोले, ‘नहीं बेटा, दोनों ही बातें सही नहीं हैं। लगातार दौड़ने की वजह से मेरे जूतों में कुछ कंकड़ आ गए थे, बस उन्हें निकालने के लिए रुका हूँ। पिता की बात सुन राज बोला, ‘पिताजी, कंकड़ तो मेरे जूतों में भी हैं, पर मैं रुकूँगा नहीं, क्यूँकि इस रेस को मुझे हर हाल में जीतना है।’; और यह कहता हुआ वह और तेज़ दौड़ने लगता है।


पिता जब तक कंकड़ निकाल कर फिर से दौड़ना शुरू करते हैं, तब तक राज काफ़ी आगे निकल जाता है। पिताजी कंकड़ निकाल कर एक बार फिर आगे बढ़ते हैं। दूसरी ओर जूतों में कंकड़ होने के कारण राज को पैरों में दर्द का एहसास होने लगता है और उसकी दौड़ने की गति कम होने लगती है। बीतते समय के साथ पिता धीरे-धीर राज के पास आने लगते हैं। जब वे राज को दुखते पैरों के साथ दौड़ता देखते हैं तो पीछे से चिल्ला कर कहते हैं, ‘बेटा, तुम भी अपने जूतों में से कंकड़ को निकाल लो।’ राज दौड़ते-दौड़ते ही जवाब देता है, ‘नहीं पिताजी, मेरे पास इसके लिए समय नहीं है। मुझे यह रेस जीतना है।’ कुछ ही देर में पिता राज से आगे निकल जाते हैं।


चुभते कंकड़ों की वजह से राज के पैरों की तकलीफ़ अब तक बहुत बढ़ गई थी। उसके लिए अब दौड़ना तो छोड़, चलना भी मुश्किल हो गया था, वह पीछे से चिल्लाते हुए बोलता है, ‘पिताजी मैं हार मानता हूँ, अब मैं और नहीं दौड़ सकता हूँ।’ पिताजी उसी पल दौड़ते हुए वापस राज के पास आते हैं और उसके जूते खोलकर पैरों को देखते हैं। उस वक्त राज के दोनों पैरों में से खून निकल रहा था। पिता ने पहले दोनों पैरों के घाव को साफ़ करा और लोगों की मदद से उसे वापस घर ले आए।


दोस्तों, मैं इस कहानी को यहीं विराम देता हूँ और आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ, ‘राज, इस रेस को क्यों पूर्ण नहीं कर पाया? आपका जवाब होगा, ‘पैरों में लगी चोट की वजह से, अगर वह कंकड़ निकाल कर दौड़ता तो वह निश्चित तौर पर जीत जाता।’ सही है ना… तो फिर यही सलाह मैं आपको भी देना चाहूँगा, ज़िंदगी की रेस अगर जीतना चाहते हो तो कंकड़ निकाल कर दौड़ना शुरू करो। शायद आप मेरी बात समझ नहीं पाए… चलिए, अपनी बात को मैं आपको विस्तार से समझाने का प्रयास करता हूँ।


सामान्यतः जीवन की रेस में अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हम लोग रोज़ दौड़ते हैं और उसे पाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। लक्ष्यों को पाने की हमारी ललक इतनी ज़्यादा होती है कि हम रोज़मर्रा में आनेवाली समस्याओं को नज़रंदाज़ करते जाते हैं। कुछ ही समय में यह समस्याएँ गंभीर रूप ले लेती हैं और अंत में आप ना तो अपना लक्ष्य पा पाते हैं और ना ही जीवन को आराम से जी पाते हैं।


छोटी-छोटी कंकड़ रूपी यह समस्याएँ कई बार आर्थिक परेशानी, रिश्तों में कड़वाहट, कभी कामकाजी साथियों के साथ मनमुटाव या फिर स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौती के रूप में हो सकती है। अक्सर हम तात्कालिक फ़ायदों के लिए इन्हें ‘अभी समय नहीं है’ या ‘इस पर अभी समय लगाना उचित नहीं है’ कहकर टाल देते हैं। जबकि इन छोटी समस्याओं का समाधान हम बहुत थोड़ी सी ऊर्जा, समय और संसाधन लगाकर आराम से कर सकते थे। जैसे, उधार लेकर अथवा निवेश को तोड़कर आर्थिक परेशानी से उबरना, माफ़ी माँगकर या बातचीत के द्वारा रिश्तों को बचाना अथवा एक छोटी सी मीटिंग कर कामकाजी राजनीति से बचना या आपसी भ्रम की स्थिति को खत्म करना, आदि।


याद रखिएगा साथियों, शुरुआत में समस्याएँ बहुत छोटी होकर चुनौती के रूप में हमारे सामने आती हैं और जब हम इन्हें नज़रंदाज़ करते जाते है, तो यह गम्भीर रूप ले लेती हैं और अगर इस स्थिति में भी ध्यान ना दिया जाए तो यह क्राइसिस बन जाती है और हमारे जीवन को बर्बाद करने लगती हैं। तो आइए दोस्तों, आज से समस्याओं को तब पकड़ना शुरू करते हैं जब वह कंकड़ के माफ़िक़ होती हैं अन्यथा वह हमें चोट पहुँचाकर लक्ष्य से दूर कर सकती हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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