समस्या से भागिए मत…
- Nirmal Bhatnagar

- Jun 19
- 3 min read
June 19, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, ईश्वर द्वारा दिए गए जीवन रूपी सर्वोत्तम उपहार से जुड़ा एक सत्य यह भी है—जहाँ जीवन है, वहाँ चुनौतियाँ हैं। जी हाँ इस जहां में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसके जीवन में कभी समस्या न आई हो। इसलिए यह सोचना ही ग़लत है कि जीवन बिना कठिनाइयों और संघर्ष के, हमारे मन के अनुसार चलेगा तो ही हम सबसे अधिक सुखी रहेंगे। कुछ लोग समस्याओं को देखकर घबरा जाते हैं और कुछ लोग उन्हें जीवन का शिक्षक मानकर आगे बढ़ते हैं।
दोस्तों, प्रकृति का नियम और जीवन की पहचान ही परिवर्तन है। जिस प्रकार दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, उसी प्रकार जीवन में अनुकूलता के बाद प्रतिकूलता और प्रतिकूलता के बाद अनुकूलता भी स्वाभाविक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि जीवन में सदैव सब कुछ अनुकूल रहेगा, वास्तविकता से दूर भागने जैसा है। इसलिए दोस्तों, जीवन में समस्याएँ आयेंगी या नहीं; यह सोचने के स्थान पर यह सोचना बेहतर है कि समस्याओं के आने पर जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या होगा।
दोस्तों, जिस तरह आँखें बंद कर लेने से अंधेरा समाप्त नहीं होता, ठीक वैसे ही समस्या से मुँह मोड़ लेने से समस्या समाप्त नहीं होती। जीवन में किसी भी समस्या का समाधान भागने से नहीं, बल्कि उसका सामना करने से निकलता है। अधिकांश मामलों में समस्या उतनी बड़ी नहीं होती जितना बड़ा उसका डर हमारे मन में बन जाता है। इतना ही नहीं कई बार तो हम समस्या के आने से पहले ही उससे भयभीत हो जाते हैं और संभावित असफलताओं की कल्पना करने लगते हैं। मन ही मन सबसे बुरे परिणामों का चित्र बना लेते हैं और यही भय धीरे-धीरे हमारे विवेक को कमजोर कर देता है। दोस्तों, जब मन भय से भर जाता है, तब निर्णय लेने की क्षमता कम हो जाती है। आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और व्यक्ति समस्या से अधिक अपने डर से हारने लगता है। इसलिए याद रखें, जिम्मेदारियों से बचने से परिस्थितियाँ नहीं बदलती।
दोस्तों, समस्या से पहले डर आना स्वाभाविक है, लेकिन डर के कारण रुक जाना उचित नहीं है। दुनिया का कोई भी लक्ष्य मनुष्य के दृढ़ संकल्प से बड़ा नहीं होता। इतिहास उन लोगों की कहानियों से भरा पड़ा है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी। उनकी सफलता का कारण यह नहीं था कि उन्हें समस्याएँ नहीं मिलीं। उनकी सफलता का कारण यह था कि उन्होंने समस्याओं को अपनी मंज़िल के रास्ते का अंत नहीं माना। उन्होंने हर चुनौती में एक अवसर खोजा। उन्होंने हर असफलता में एक सीख देखी और उन्होंने हर गिरावट को फिर से उठने का निमंत्रण समझा।
इसलिए ही मैं कहता हूँ, प्रतिकूलताएँ हमारे मार्ग में उतनी बाधा नहीं बनतीं जितनी हम स्वयं बन जाते हैं। हमारी शंकाएँ, हमारा भय, टालमटोल की हमारी आदत, आत्मविश्वास की कमी, आदि हमें बाहरी परिस्थितियों से अधिक नुकसान पहुँचाते हैं। जब हम स्वयं पर विश्वास करना शुरू कर देते हैं, तब कठिन रास्ते भी आसान लगने लगते हैं। जब हम समाधान पर ध्यान देते हैं, तब समस्या का आकार छोटा होने लगता है और जब हम प्रसन्नतापूर्वक परिस्थितियों का सामना करते हैं, तब भीतर एक नई शक्ति जन्म लेती है। इसलिए जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, स्वयं से एक बात अवश्य कहिए, “मैं समस्या से बड़ा हूँ।”, “मैं परिस्थिति का सामना कर सकता हूँ।”, “समाधान कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर भी मौजूद है।”
इसलिए दोस्तों, नजरिया बदलो और समस्याओं को जीवन का अंत नहीं, परीक्षा मानो और ख़ुद को याद दिलाओ कि वे तो जीवन में सिर्फ़ यह देखने आती हैं कि हम परिस्थितियों के सामने झुकते हैं या उनसे ऊपर उठते हैं। इसलिए ही कहा गया है समस्या मुकरने से नहीं, मुकाबला करने से दूर होती है और जिन कठिनाइयाँ से हम सबसे अधिक डरते हैं, आगे चलकर वो ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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