सम्मान, समर्पण और उत्कृष्टता से करें कार्य...
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 6, 2025
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Aug 6, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

यकीन मानियेगा दोस्तों, सम्मान, समर्पण और कंपनी हित को प्राथमिकता में रख उत्कृष्टता से किया गया काम ना सिर्फ कंपनी की सफलता की कहानी लिखता है, बल्कि आपके नाम को भी कंपनी का पर्याय बनाकर अमर कर देता है। उदाहरण के लिए आप स्टीव जॉब्स और ऍपल, मार्क और फ़ेसबुक, बिल गेट्स और माइक्रोसॉफ्ट, नारायण मूर्ति और इन्फ़ोसिस, अजीम प्रेमजी और विप्रो, जेआरडी या रतन टाटा और टाटा संस आदि किसी के भी उदाहरण से देख सकते हो।
दोस्तों, उपरोक्त कथन जितना संस्थापक याने फ़ाउंडर्स के लिए सही है, उतना ही कंपनी में कार्य कर रहे कर्मचारी के लिए भी सही है। अपनी बात को मैं आपको टाटा कार्स से जुड़े एक किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ। यह कहानी उस वक्त की है जब टाटा वर्ष 1988-90 के बीच अपनी नई एसयूवी कार को बाजार में उतारने की रणनीति पर काम कर रहा था। काफ़ी सोच विचार करने के बाद इस गाड़ी का नाम ‘सुमो’ रखा गया। जी हाँ, वही सुमो जो भारत की सड़कों पर वर्षों तक एक भरोसेमंद साथी रही, फिर चाहे आप उसे सेना के क़ाफ़िले या परिवार की यात्रा हो या फिर पहाड़ों पर चलती कठिन राहों पर आँक कर देख लो।
दोस्तों, अक्सर किसी भी प्रोडक्ट को नाम देने की इस प्रक्रिया को ब्रांडिंग से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन 'सुमो' केवल जापानी कुश्ती से प्रेरित एक गाड़ी का नाम नहीं था, यह तो एक विचार था, जिसके पीछे संवेदना और ग्रेटीट्यूड का भाव छिपा हुआ था। जी हाँ दोस्तों, इस गाड़ी का नामकरण श्री सुमंत मुळगांवकर नाम के एक ऐसे व्यक्ति के सम्मान में हुआ, जिन्होंने टाटा मोटर्स की नींव को मजबूती दी थी।
सुमंत मुळगांवकर टाटा मोटर्स के प्रबंध निदेशक थे। वे उन विरले नेताओं में से थे जिन्होंने सिर्फ़ फ़ाइलों पर नहीं, ज़मीन पर जाकर काम किया। उन्हें ग्राहक की ज़रूरत समझने में रुचि थी, और वे नवाचार को अपनाने में जरा भी हिचकते नहीं थे। वे सिर्फ़ एक प्रबंधक नहीं, बल्कि एक द्रष्टा थे। अक्सर वे हाइवे पर स्थित ढाबों पर जाते थे और ट्रक चालकों से सीधे संवाद करते थे; उनके अनुभव सुनते थे और उसके आधार पर टाटा के ट्रक को बेहतर बनाने की कोशिश करते थे। यह व्यवहार आज की कॉरपोरेट संस्कृति के लिए भी एक मॉडल ऑफ़ लीडरशिप है।
जब रतन टाटा ने टाटा सुमो को बाज़ार में उतारने का निर्णय लिया, तो उन्होंने अपनी नई गाड़ी का नाम तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के नाम से करने का निर्णय लिया, जो टाटा मोटर्स को ऊंचाइयों तक ले गया था। इसलिए उन्होंने सुमंत मुळगांवकर के पहले नाम में से Sumant में से SU और उपनाम Moolgaonkar में से MO लिया और अपनी नई एसयूवी का नाम ‘सुमो’ रख दिया।
इस आधार पर कहा जाए तो ‘सुमो’ नाम एक सम्मान, एक श्रद्धांजलि, एक विचारधारा का प्रतीक है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो ‘सुमो’ सिर्फ़ एक गाड़ी नहीं थी, बल्कि यह उस नेतृत्व, ईमानदारी और दूरदर्शिता का प्रतीक थी जिसे मुळगांवकर जी ने जिया था। याने यह नाम सिर्फ़ दो अक्षरों का मेल नहीं था, बल्कि यह उन मूल्यों का प्रतीक है जो टाटा समूह को अद्वितीय बनाते हैं। जैसे -
1) ग्राहक के प्रति प्रतिबद्धता
2) फ़ील्ड में उतरकर सीखने की तत्परता
3) सम्मान देने की संस्कृति
4) नाम के पीछे विचार और दर्शन
दोस्तों, आज के समय में जहाँ कंपनियाँ सिर्फ़ मुनाफ़े पर ध्यान देती हैं, तब टाटा समूह का यह उदाहरण हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रेरणा मूल्यों से आती है, न कि केवल उत्पाद से।
उपरोक्त किस्से से हम कई बातें सीख सकते हैं। जैसे-
1) सम्मान देना सीखिये: जब हम दूसरों के योगदान को पहचानते हैं, तो हम केवल रिश्ते नहीं, भविष्य भी बनाते हैं।
2) लीडर वही जो सबसे पहले सुनने जाए: मुळगांवकर जी की तरह, जो नेतृत्व ज़मीन से जुड़ा हो, वही टिकाऊ होता है।
3) हर नाम के पीछे कहानी होती है: यदि गहराई से देखें, तो हर नाम, हर चीज़ हमें कुछ सिखा सकती है।
अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तों कि ‘सुमो’ केवल एक गाड़ी का नाम नहीं बल्कि एक फ़िलासफ़ी है जो हमें याद दिलाती है कि सफलता केवल निर्माण में नहीं, सम्मान में भी होती है। जब किसी कंपनी का नेतृत्व अपने पूर्वजों या अपने पूर्व कर्मचारियों के मूल्यों और सिद्धांतों को इस तरह जीवित रखता है, तब न केवल एक अच्छा उत्पाद बनता है, बल्कि लोगों में विश्वास भी पैदा होता है। दोस्तों, सुमो की कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो नेतृत्व को केवल पद नहीं, सेवा समझता है और इसी बात को याद दिलाने के लिए संभवतः टाटा वर्ष 2025 में एक बार फिर सुमो को बाजार में उतार रहा है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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