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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

सहनशीलता, समर्पण और मौन से बनाएँ अपने जीवन को बेहतर !!!

May 9, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, एक आँकड़ा बताता है कि साल दर साल भारत में पारिवारिक रिश्तों में तनाव बढ़ता जा रहा है और इसी वजह से संयुक्त परिवारों की संख्या में भी तेजी से कमी आ रही है।। मेरी नज़र में इसकी मुख्य वजह समर्पण, सहनशीलता, स्वीकार्यता आदि जैसे गुणों में आई कमी है। पहले कौन और क्या सही है, से पहले रिश्ता आता था और आज रिश्ते के सही रहने से ज़्यादा ज़रूरी खुद को सही सिद्ध करना हो गया है। जी हाँ साथियों, रिश्ता कैसा भी क्यों ना हो आजकल ज़्यादातर लोगों के लिए ‘मैं’ याने अहम् सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। वे किसी भी हाल में ‘मैं’ के आगे जाकर स्थितियों को देखना ही नहीं चाहते हैं। वैसे यह स्थिति सिर्फ़ व्यक्तिगत सम्बन्धों में ही नहीं अपितु व्यवसायिक और सामाजिक परिवेश में भी देखने को मिल रही है।


जी हाँ दोस्तों, आज लोग खुद के मूल्य और उपयोगिता को बढ़ाने वाले मौन, समर्पण और सहनशीलता को ‘मैं’ के आगे भूलते जा रहे हैं। किसी ने ज़रा सा ज़ोर से कुछ कहा या कटु वचन का प्रयोग किया तो लोग तत्काल उससे ज़्यादा कटु तरीके या वचनों के साथ जवाब देने के लिए तैयार रहते है। यही स्थिति कमोबेश यथोचित सम्मान ना मिलने या मनोनुकूल कार्य ना होने पर भी बनती है। असल में हममें से ज़्यादातर लोग शायद यह भूल गए हैं कि किसी के कहे कटु वचन को सहना या यथोचित सम्मान ना मिलने पर सामने वाले को माफ कर सकना या फिर मनोनुकूल कार्य न होने पर भी स्थितियों को स्वीकार कर जीवन में सकारात्मक रवैए के साथ आगे बढ़ने का नाम ही सहनशीलता है।


असल में दोस्तों, हममें से ज़्यादातर लोग यह भूलते जा रहे हैं कि मूर्तिकार की चोटों से ही पत्थर, भगवान का रूप धारण कर पाता है। आप स्वयं सोच कर देखिए अगर पत्थर का ‘मैं’ जाग जाता और वह मूर्तिकार के द्वारा छेनी-हथौड़ी से दी जाने वाली चोटों को सहन करने से इनकार कर देता तो क्या होता? क्या वह कभी सुंदर मूर्ति या ईश्वर का रूप ले पाता? क्या उस मूर्तिकार समेत अन्य लोग उसकी पूजा करते? बिलकुल नहीं, असल में बिना विरोध करे, बिना परेशान हुए, मूर्तिकार की रजा में राज़ी रहते हुए पत्थर का आघातों को सहना ही समर्पण कहलाता है। जी हाँ मूर्तिकार के प्रति पत्थर का समर्पण ही उसे सुंदर मूर्त या भगवान बनाता है। समर्पण का यही भाव अपने पारिवारिक सदस्यों, गुरुओं या क़रीबियों के प्रति रखना, आपको बेहतर इंसान बनाता है।


ठीक इसी तरह, बिना किसी ठोस वजह के अकारण वाद-विवाद से दूर रहना। हर मौक़े या बात-बात पर अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने का प्रयास ना करना, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू ना बनना और धैर्य पूर्वक सबकी बातों को ध्यान से सुनना एवं अत्यधिक आवश्यक होने पर समयानुसार बोलना या सम्यक् वाणी बोलना ही मौन कहलाता है। जी हाँ, सामान्य गृहस्थ या सामाजिक जीवन में मौन का मतलब ‘मौन’ धारण करना नहीं अपितु उपरोक्त नियमों का पालन करना है।


दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य सादा जीवन जीते हुए महान बनाना है या आज के इस उथल-पुथल युग में शांत रहते हुए गुणवत्ता पूर्ण, सकारात्मक जीवन जीना है तो उपरोक्त तीन गुण आपके लिए ही हैं। याने अगर आप जीवन में सहनशीलता, समर्पण और मौन को अपनी जीवन चर्या का हिस्सा बना लेते हैं अर्थात् इन गुणों को जीवन का आधार बना लेते हैं तो आप निश्चित तौर पर सामान्य जीवन जीते हुए महान बन जाते हैं। तो आशा करता हूँ दोस्तों, पूर्ण स्वीकार्यता के साथ आप आज से ही सहनशीलता, समर्पण और मौन को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर; अपने जीवन को बेहतर बनाएँगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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