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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

सही ज्ञान और अथक परिश्रम दिलाएगा मनचाहा फल…

Mar 4, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, सफलता को चाहना और सफलता को पाना, दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं। ‘चाहना’, एक और जहाँ सिर्फ़ सोच का विषय है, वहीं ‘पाना’, सीधे-सीधे परिश्रम का और शायद यही बात हम आज के युवाओं को नहीं सीखा पा रहे हैं। ऐसा मैं अपने पिछले कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। असल में दोस्तों, काउंसलिंग के दौरान जब मैं बच्चों से उनके लक्ष्यों के विषय में पूछता हूँ, तो मुझे सभी बच्चों से लगभग एक समान ही उत्तर मिलता है, ‘हम ढेर सारा पैसा कमाना चाहते हैं। जिससे हम लक्ज़री लाईफ़ और आरामदायक जीवन जी सकें।’ लेकिन जब मैंने इन बच्चों से इस लक्ष्य को पाने की योजना के विषय में पूछो, तो वे हवा में बातें करते नज़र आए। इतना ही नहीं, जब मैंने इन्हें सपने सच करने का सही रास्ता याने योजना और उसे अमल में लाने के लिए किए जाने वाले कार्यों के विषय में बताया, तो इनमें से ज़्यादातर लोग मेहनत से दूर भागते नज़र आए।


अपनी बात को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। हाल ही में एक संस्था के लिए किए गए कैंपस इंटरव्यू के दौरान मैंने देखा था कि हर बच्चे को अच्छा वेतन और पद तो चाहिये, लेकिन वह उसके लिए आवश्यक परिश्रम नहीं करना चाहता है। इसका अंदाज़ा मुझे बच्चों के इस सवाल से हुआ, ‘ऑफिस की छुट्टी कितने बजे होती है?’ जी हाँ दोस्तों, इंटरव्यू के दौरान प्रश्न पूछने का मौक़ा दिया जाने पर मुझसे किसी भी छात्र ने संस्था की अपेक्षाओं याने जॉब रेस्पोंसिबिलिटी के विषय में नहीं पूछा और ना ही उन्होंने कार्यालय शुरू होने के समय के बारे में बात की। वे तो बस छुट्टी कितने बजे होगी और तनख़्वाह कितनी मिलेगी, यह जानना चाहते थे।


वैसे इस सोच के लिये युवा पीढ़ी को दोष देना उचित नहीं है। वे जिन परिस्थितियों में बड़े हुए हैं; जिस तरह उनका लालन-पालन हुआ है; जिस तरह के विचार उनके मन में बोए गए हैं, यह उसका परिणाम है। जी हाँ साथियों, सुविधाओं से भरा, चुनौती रहित बचपन, शिक्षा, लाड़-प्यार, इंटरनेट के कारण बदलती दुनिया की सटीक जानकारी आदि के कारण बच्चों को यह तो पता है कि वे कैसी ज़िंदगी जीना चाहते हैं?, लेकिन वे यह नहीं जानते कि इसे हक़ीक़त में बदलने के लिए उन्हें ना सिर्फ़ परिश्रम करना होगा, बल्कि कई बार छोटी-बड़ी असफलताओं का स्वाद भी चखना होगा।


वैसे दोस्तों, सिर्फ़ युवा ही नहीं अपितु आज की दुनिया में ज़्यादातर लोग सफलता और नाम, कमाना तो चाहते हैं, पर बिना काम किये। इसकी मुख्य वजह कहीं ना कहीं मनुष्य की कमजोर इच्छाशक्ति, अत्यधिक सोचने की आदत और असफल हो जाने का डर है। इन तीनों बातों के अभाव के कारण वह ठोस योजना नहीं बना पाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ, तो योजना का अभाव और अस्पष्ट सोच उसे अकर्मण्य बना देती है।


याद रखना, जो व्यक्ति अपने अंदर से ही असफल है, वह बाहर भी सफल नहीं हो पायेगा। इससे बचने का मेरी नज़र में तो एक ही सूत्र है। हमें इन सभी को गीता जी का यह महत्वपूर्ण पाठ याद दिलाना होगा कि अपने भाग्य से तुम्हें स्वयं ही लड़ना होगा और पुरुषार्थ के बल पर प्रारब्ध को बदलना होगा। दूसरे शब्दों में कहूँ, तो हमें भगवान श्री कृष्ण के ‘कर्म प्रधानता’ के सूत्र को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाना होगा। इसलिए दोस्तों, अगर सफलता चाहते हो तो ठोकरों से घबराओ मत, वो तुम्हें गिराकर आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रही हैं। याद रखिए, जो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते हैं, वो कभी भी सफलता का आलिंगन नहीं कर पाते हैं। लेकिन जिसे परिस्थितियों से लड़ना आता है, वह आगे बढ़ना भी जानता है।


इसलिए दोस्तों, सफलता चाहिये तो चींटी की तरह बनो जो सौ बार गिरकर या असफल होकर भी अपना मनोबल ऊँचा रखते हुए निरंतर प्रयास करती है और अंततः सफल हो जाती है। अगर हम भी चींटी की तरह असफलता को नज़रंदाज़ कर परिश्रम करना शुरू कर दें, तो यकीनन एक न एक दिन अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे। इसीलिए सफलता को परिणाम की चिंता किए बग़ैर सही दिशा में, सही ज्ञान के साथ किए अथक परिश्रम का फल माना गया है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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